प्रबन्ध एक कला है
सामान्यतः किसी भी कार्य को सर्वोत्तम ढंग से करने की क्रिया को कला कहते हैं । कला व्यक्तिगत होती है, यह इच्छित परिणामों की प्राप्ति के लिए चातुर्य, ज्ञान, अध्ययन एवं सिद्धान्तों का व्यावहारिक उपयोग बतलाती है। कला की सफलता व्यक्तिगत योग्यता, दक्षता, अनुभव एवं अभ्यास, लगन तथा चातुर्य पर निर्भर करती है। इसे संचय करना सम्भव नहीं है, यह व्यावहारिक ज्ञान है तो सृजनात्मक भी है। कला की उक्त विशेषताओं को प्रबन्ध के सन्दर्भ में देखें तो यह कहा जा सकता है कि प्रबन्ध करना भी एक कला है। कला की भाँति ही प्रबन्ध में अग्रलिखित विशेषताएँ होती हैं
1. एक सफल प्रबन्धक, प्रबन्ध कला का उद्यम के दिन-प्रतिदिन के प्रबन्ध में उपयोग करता है जो कि अध्ययन, अवलोकन एवं अनुभव पर आधारित होती है।
2. कला की भाँति ही प्रबन्ध के विभिन्न सिद्धान्त हैं जिनका प्रतिपादन कई प्रबन्ध विचारकों ने किया है तथा जो कुछ सर्वव्यापी सिद्धान्तों को अधिकृत करते हैं। एक अच्छा प्रबन्धक वह है जो व्यवहार, रचनात्मकता, कल्पना शक्ति, पहल क्षमता आदि को मिलाकर कार्य करता है। एक कलाकार की भाँति प्रबन्धक भी एक लम्बे अभ्यास एवं अनुभव के पश्चात् सम्पूर्णता को प्राप्त करता है।
3. एक प्रबन्धक प्राप्त ज्ञान का परिस्थितिजन्य वास्तविकता के परिदृश्य में व्यक्तिनुसार एवं दक्षतानुसार उपयोग करता है। वह परिस्थितियों का अध्ययन करता है एवं अपने सिद्धान्तों को दी गई परिस्थितियों के अनुसार उपयोग में लाता है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रबन्ध एक कला है।