पर्वत से निकलकर कल-कल ध्वनि करती बहती पर्वतराज हिमालय की पुत्री में गंगा नदी हूँ। लोग मुझे अत्यंत पावन मानते हैं। बाल्यकाल में में बहुत नटखट थी। मेरा बचपन पर्वत के घने जंगलों तथा हरी-भरी घाटियों में बीता। वहीं में बड़ी हुई चैन से बैठना मेरा स्वभाव ही नहीं है। नए-नए स्थान देखने का मेरा शौक मुझे अपने पिता की प्यार भरी गोद से दूर मैदानों में ले आया। उस समय मेरा जल दर्पण के समान स्वच्छ था।
पर्वत से नीचे उतरकर अथाह जलराशि के कारण मेरा विस्तार बढ़ा, परंतु मेरी गति धीमी हो गई। धीरे-धीरे समय बीतता गया, मेरे किनारों पर गाँव और नगर बसने लगे। प्रयागराज, वाराणसी, कोलकाता आदि नगर मेरे कारण ही विशेष माने जाते हैं। लोग मेरा जल पीने, खाना बनाने, नहाने धोने और खेतों की सिंचाई आदि विभिन्न कामों में लाते हैं। पशु-पक्षी भी मुझसे जल प्राप्त करते हैं। समय के साथ-साथ गाँवों और नगरों की उन्नति हुई। वहाँ अनेक परिवर्तन हुए। मेरे तटों पर घाट बनाए गए नए-नए उद्योग-धंधे विकसित होने लगे। मुझ पर बाँध बाँधे गए। मुझसे नहरें निकाली गई।
लोक कल्याण करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है। परंतु जब कभी बहुत अधिक वर्षा होती है, तब मेरा जल स्तर बढ़ जाने से मुझमें बाढ़ आ जाती है। मेरे किनारे बसे हुए गाँव और नगर, और पशु सब बाद में वह जाते हैं। मुझे तब बहुत दुख होता है। परंतु प्रकृति के आगे में विवश हूँ।
मेरी जलधारा सदैव बहती रहती है। प्रत्येक जीव-जंतु को सुखी बनाती हुई, मैदानों को
उपजाऊ बनाते हुए, हजारों, लाखों लोगों को एकता के सूत्र में बाँधकर लगभग ढाई हजार किलोमीटर की यात्रा करके अंत में में सागर में विलीन हो जाती हूँ।