लिवरवर्ट तथा मॉस में अन्तर - लिवरवर्ट का पादपकाय थैलासाभ होता है। थैलस पृष्ठाधार होते हैं तथा अधः स्तर से चिपके रहते हैं। कुछ सदस्यों में तना व पत्तियाँ अवश्य होती हैं परन्तु वे भी अधः स्तर पर पड़े रहते हैं। इनमें कायिक जनन विशिष्ट रचनाओं या पुराने भागों के गलने से पृथक् हुये खण्डों द्वारा होता है। थैलस से निकले मूलाभास एककोशिकीय व अशाखित होते हैं। स्पोरोफाइट के कैप्स्यूल से निकले अगुणित बीजाणु अंकुरित होकर मुक्तजीवी युग्मकोद्भिद् बनाते हैं। उदाहरण - मारकैंशिया, रिक्सिया आदि।
मॉस के पौधों में दो अवस्थायें होती हैं। स्पोर का अंकुरण होने पर सर्वप्रथम एक विसर्पी, हरा, शाखित, तंतुमयी प्रथम तंतु बनता है, यह पहली अवस्था होती है। प्रथम तंतु से पशर्वीय कली के रूप में द्वितीय अवस्था बनती है। द्वितीय अवस्था में एक सीधा, ऊर्ध्व, पतला तना - सा होता है जिस पर सर्पिल रूप से पत्तियाँ लगी रहती हैं। तने के आधारीय भाग से बहुकोशिकीय तथा शाखित मूलाभास निकलते हैं। मॉस में कायिक जनन द्वितीयक प्रथम तंतु के विखण्डन तथा मुकलन द्वारा होता है। मॉस में स्पोर विकिरण की बहुत विस्तृत प्रणाली होती है। उदाहरण - फ्यूनेरिया, स्फेग्नम तथा पोलिट्राइकम ।