आचार्य भर्तृहरि ने नीतिशतक में पण्डित जनों की पहचान बताते हुए कहा है कि जिसके कार्य शीत, उष्ण, भय, रति (प्रेम) समृद्धि, असमृद्धि (गरीबी) में नहीं रुकते अर्थात् व्यवधानवश गतिहीन नहीं होते वैसे मानव को पण्डित कहा जा सकता है।
साथ ही तत्त्वों को जानने वाला, सभी प्राणियों के योग क्षेत्र को जानकर उसके निमित्त कार्य करना भी मानव को पण्डित कहे जाने योग्य बनाता है।