प्रायद्वीपीय पठार प्रायद्वीपीय पठार की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन अग्र प्रकार है-
(1) स्थिति, आकृति एवं निर्माण-प्रायद्वीपीय पठार उत्तर के मैदान के दक्षिण में स्थित है। यह एक मेज की आकृति वाला स्थल है जो पुराने क्रिस्टलीय, आग्नेय तथा रूपान्तरित शैलों से बना है। यह बहुत प्राचीनतम भूभाग है। यह गोंडवानालैण्ड के टूटने एवं अपवाह के कारण बना था। इस पठारी भाग में चौड़ी तथा छिछली घाटियाँ एवं गोलाकार पहाड़ियाँ हैं।
(2) मुख्य भाग-प्रायद्वीपीय पठार को निम्न दो मुख्य भागों में बाँटा जा सकता है-
(i) मध्य उच्च भूमि-नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित प्रायद्वीपीय पठार का भू-भाग मध्य उच्च भूमि कहलाता है। इसके अन्तर्गत मालवा का पठार, बुन्देलखण्ड का पठार तथा छोटा नागपुर पठार शामिल हैं। अरावली श्रेणी तथा विन्ध्य श्रेणी इस भाग की मुख्य पर्वत श्रेणियाँ हैं। इस क्षेत्र की प्रमुख नदियाँ चम्बल, सिंध, बेतवा तथा केन हैं जो दक्षिण पश्चिम से उत्तर-पूर्व की तरफ बहती हैं।
(ii) दक्षिण का पठार-दक्षिण का पठार की आकृति त्रिभुजाकार है। यह नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित है। प्रायद्वीपीय पठार का यह भाग ज्यादा बड़ा है।
मुख्य पहाड़ियाँ एवं श्रृंखलाएँ-उत्तर में इसके चौड़े आधार पर सतपुड़ा की श्रृंखला है। अन्य शृंखलाओं में महादेव, कैमूर की पहाड़ी तथा मैकाल श्रृंखला मुख्य हैं। इस पठार का एक भाग उत्तर-पूर्व में भी देखा जा सकता है, जिसे स्थानीय रूप से मेघालय, कार्बी एंगलौंग पठार तथा उत्तर कचार पहाड़ी के नाम से जाना जाता है। इस हिस्से में पश्चिम से पूर्व की ओर तीन महत्त्वपूर्ण श्रृंखलाएँ गारो, खासी तथा जयन्तिया हैं।
प्रमुख नदियाँ एवं ढाल-महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, ताप्ती आदि इस प्रदेश की प्रमुख नदियाँ हैं। दक्षिण के पठार का ढाल पूर्व की तरफ है, इसी कारण इस क्षेत्र की अधिकतर नदियाँ यथा-महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि पूर्व दिशा में प्रवाहित होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, केवल नर्मदा व ताप्ती नदियाँ ही पश्चिम में अरब सागर में गिरती हैं।
(3) घाट-दक्षिण के पठार के पश्चिमी तथा पूर्वी सिरे पर क्रमशः पश्चिमी तथा पूर्वी घाट हैं।
(i) पश्चिमी घाट-दक्षिण के पठार का पश्चिम की तरफ उठा हुआ किनारा पश्चिमी घाट के नाम से जाना जाता है। यह पश्चिमी तट के समानान्तर स्थित है। ये लगातार हैं तथा केवल दरों के द्वारा ही इनमें से आया-जाया जा सकता है। इनकी ऊँचाई 900 से 1600 मी. है। पश्चिमी घाट में पर्वतीय वर्षा होती है। यह वर्षा घाट के पश्चिमी ढाल पर आर्द्र हवा के टकराकर ऊपर उठने से होती है। इस घाट की ऊँचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती जाती है। अनाईमुडी (2695 मी.) तथा डोडा बेटा (2633 मी.) इस भाग के प्रमुख ऊँचे शिखर हैं।
(ii) पूर्वी घाट-पूर्वी घाट दक्षिण के पठार के पूर्वी किनारे पर स्थित है। पूर्वी घाट की औसत ऊँचाई 600 मी. है। इनका विस्तार महानदी घाटी से दक्षिण में नीलगिरी तक है। ये अनियमित हैं। बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों ने इनको जगह-जगह पर काट दिया है। शिखर महेन्द्रगिरी (1500 मी.) पूर्वी घाट का सबसे ऊँचा शिखर है। पूर्वी घाट के दक्षिण-पश्चिम में शेवराय तथा जावेडी की पहाड़ियाँ स्थित हैं।
(4) उपजाऊ मृदा-प्रायद्वीपीय पठार में लावा निर्मित उपजाऊ काली मृदा पाई जाती है। इसे 'दक्कन ट्रैप' के नाम से भी जाना जाता है।
(5) खनिज सम्पदा-प्रायद्वीपीय पठार में आग्नेय चट्टानों की उपस्थिति पाई जाती है। प्राचीनतम चट्टानों से निर्मित होने के कारण इसमें विपुल खनिज सम्पदा के भण्डार पाये जाते हैं।