बस्तर का विद्रोह-बस्तर के विद्रोह का वर्णन निम्न शीर्षकों में किया जा सकता है-
1. विद्रोह के कारण-
औपनिवेशिक सरकार ने 1905 में, वनों का दो-तिहाई हिस्सा आरक्षित करने का प्रस्ताव रखा।
घुमंतू कृषि पर प्रतिबंध लगाया।
शिकार करने तथा वन उत्पादों को एकत्र करने पर प्रतिबंध लगाया।
गाँवों के लोगों को बगैर किसी सूचना या मुआवजे के गाँवों से हटा दिया गया।
लोग बढे हए लगान. औपनिवेशिक अफसरों के हाथों बेगार तथा चीजों की निरन्तर मांग से त्रस्त थे।
इन सब कदमों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए स्थानीय लोगों को मजबूर किया।
2. विद्रोह का विकास-
लोगों ने बाजारों तथा त्यौहारों के मौके पर अथवा जहाँ कहीं भी कई गाँवों के मुखिया व पुजारी इकट्ठे होते थे, इन सब विषयों पर चर्चा करनी आरम्भ कर दी। कांगेर वनों के धुरवा समुदाय द्वारा इस सम्बन्ध में पहल की गई, जहाँ सबसे पहले आरक्षण लागू हुआ। इस विद्रोह का मुख्य नेता नेथानार गाँव का गुंडा धूर था।
1910 में, गाँवों में आम की टहनियों, मिट्टी के ढेलों, मिर्ची तथा तीर- कमानों को घुमाना आरम्भ हुआ। वास्तव में, ये ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बगावत करने के लिए, ग्रामीणों को आमंत्रित करने के संदेश थे।
प्रत्येक गाँव ने बगावत के खर्चे के लिए कुछ योगदान दिया।
बाजारों को लूटा गया, अधिकारियों तथा व्यापारियों के घरों, स्कूलों तथा पुलिस स्टेशनों को जलाया गया तथा अनाज बाँटा गया। जिन पर आक्रमण किया गया, उनमें से अधिकतर औपनिवेशिक शासन तथा दमन के कानूनों से सम्बन्ध रखते थे।
3. विद्रोह का दमन-अंग्रेजों ने बगावत को दबाने के लिए सेना भेजी। आदिवासी नेताओं ने समझौता करने का प्रयास किया, परन्तु अंग्रेजों ने उनके शिविरों को घेर कर उन पर गोली चलाई। इसके बाद उन्होंने गाँव की ओर मार्च किया तथा बगावत में भाग लेने वालों को सजा दी। अधिकतर गाँव खाली हो गए क्योंकि लोग जंगलों में भाग गए। अंग्रेजों को फिर से नियंत्रण करने के लिए तीन महीने (फरवरी-मई) लग गए, परन्तु वे गुंडा धूर को कभी पकड़ न पाए।
4. बगावत के परिणाम-(i) आरक्षण पर कार्य कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया। (ii) आरक्षित करने वाला क्षेत्र 1910 से पहले की योजना से लगभग आधा रह गया। (iii) इस विद्रोह ने अन्य कबीले के लोगों को भी ब्रिटिश सरकार की अन्यायपूर्ण नीतियों के विरुद्ध बगावत करने के लिए प्रोत्साहित किया।