प्रबन्ध के सिद्धान्तों के विकास की गति
प्रबन्ध के सिद्धान्तों के विकास की गति को हम निम्न चरणों में विभक्त कर समझा सकते हैं-
1. प्रारम्भिक स्वरूप-सर्वप्रथम प्रबन्ध के सिद्धान्तों सम्बन्धी विचारों को 3000-4000 ई. पू. में दर्ज किया गया। मिस्र के शासक क्योपास को 2900 ई. पू. में एक पिरामिड के निर्माण के लिए 1 लाख आदमियों ने 20 वर्ष तक कार्य किया। पिरामिडों के निर्माण के लिए पत्थर की शिलाओं को हजारों किलोमीटर दूर से लाया जाता था। किंवदंती यह है कि इन पिरामिडों के आस-पास के गाँवों में हथोड़े तक की आवाज नहीं सुनायी देती थी। ऐसे यादगार कार्य को बिना सफल प्रबन्ध सिद्धान्तों का अनुसरण किये पूरा करना सम्भव नहीं था।
2. क्लासिकी प्रबन्ध सिद्धान्त-क्लासिकी प्रबन्ध सिद्धान्त चरण की मुख्य विशेषता विवेकशील आर्थिक विचार, वैज्ञानिक प्रबन्ध, प्रशासनिक सिद्धान्त, अफसरशाही संगठन है। विवेकशील आर्थिक विचार की धारणा थी कि लोग मूलतः आर्थिक लाभों से प्रोत्साहित होते हैं। टेलर एवं अन्य प्रबन्धशास्त्रियों का वैज्ञानिक प्रबन्ध उत्पादन आदि के लिए कार्य करने के एक सर्वोत्तम ढंग पर जोर देता है। हेनरी फेयोल के समान व्यक्तित्व वाले प्रशासनिक सिद्धान्तवेत्ताओं ने पद एवं व्यक्तियों को एक सक्षम संगठन में परिवर्तित करने के लिए सर्वोत्तम मार्ग ढूँढ़ा। अफसरशाही संगठन के सिद्धान्तवेत्ता, जिनमें अग्रणी मैक्स वेबर थे, ने अधिकारों के गलत प्रयोग, जिससे प्रभावशीलता समाप्त होती थी, के कारण प्रबन्धकीय अनियमितताओं को समाप्त करने के मार्ग की खोज की। यह औद्योगिक क्रान्ति एवं उत्पादन की कारखाना प्रणाली का युग था। संगठनबद्ध उत्पादन को शासित करने वाले सिद्धान्तों का अनुसरण किये बिना बड़े पैमाने पर उत्पादन सम्भव नहीं था। ये सिद्धान्त श्रम-विभाजन एवं विशिष्टीकरण, मानव एवं मशीन के बीच पारस्परिक सम्बन्ध, लोगों का प्रबन्धन आदि पर आधारित थे।
3. नवक्लासिकी सिद्धान्त-मानवीय सम्बन्ध मार्ग-नवक्लासिकी सिद्धान्त विचारधारा 1920 से 1950 के बीच विकसित हुई। इस विचारधारा का मानना था कि कर्मचारी मात्र नियम, अधिकार, श्रृंखला एवं आर्थिक प्रलोभन के कारण ही विवेक से कार्य नहीं करते बल्कि वे सामाजिक आवश्यकताओं, प्रेरणाओं एवं दृष्टिकोण से भी निर्देशित होते हैं। जी.ई.सी. आदि पर 'हॉथोर्न' अध्ययन किया गया। मानवीय तत्त्व पर ध्यान देना इस विचारधारा का एक विशिष्ट पहलू था।
4. व्यावहारिक विज्ञान मार्ग-संगठनात्मक मानवतावाद-क्रिस आर्गरिस, डगलस मैक्ग्रेगर, अब्राहम मैसलो एवं फ्रेडरिक हर्जबर्ग आदि प्रबन्धशास्त्रियों ने संगठनात्मक मानवतावाद के मार्ग को विकसित करने के लिए मनोविज्ञानशास्त्र, समाजशास्त्र एवं मानवशास्त्र के ज्ञान का उपयोग किया। संगठनात्मक मानवतावाद का दर्शन है जिसमें व्यक्तियों को कार्यस्थल परं एवं घर पर अपनी सभी योग्यताओं एवं रचनात्मक कौशल का उपयोग करना होता है।
5. प्रबन्ध विज्ञान/परिचालनात्मक अनुसन्धानयह प्रबन्धकों को निर्णय लेने में सहायतार्थ परिणाम सम्बन्धी तकनीक के उपयोग प्रचालन एवं अनुसन्धान में जोर देता है।
6. आधुनिक प्रबन्ध-आधुनिक प्रबन्ध आधुनिक संगठनों को एक जटिल प्रणाली के रूप में देखता है तथा संगठनात्मक एवं मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए आकस्मिक घटना के रूप में आधुनिक तकनीक का प्रयोग करता है।