नेतृत्व का अर्थ
नेतृत्व दूसरों के व्यवहार को प्रभावित करने की एक ऐसी शक्ति है जिससे कि उन्हें सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में स्वेच्छा से आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया जा सके। यह एक ऐसी कला है जिसमें अनुयायी अपने पूर्वाग्रहों, पूर्व निर्धारित सोच तथा कार्य करने के ढंग को त्याग कर नेतृत्व द्वारा बतलाये गये पथ पर चलते हुए अपना सर्वोत्तम योगदान संस्था को देकर, इसके लक्ष्यों की प्राप्ति को संभव बनाते हैं।
वस्तुतः नेतृत्व एक व्यावहारिक गुण या व्यवहार है जिसके द्वारा एक नेता दूसरे व्यक्तियों को स्वेच्छा से अपनी संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु कार्य करने के लिए मार्गदर्शन एवं प्रेरणा देता है।
जार्ज आर. टेरी के अनुसार, "नेतृत्व एक क्रिया है व्यक्तियों को प्रभावित करने की, जिससे वे स्वेच्छा से सामूहिक उद्देश्यों के लिए प्रतिस्पर्धी हो सकें।"
हैरोल्ड कून्ट्ज एवं हिंज वैहरिच के अनुसार, "नेतृत्व व्यक्तियों को प्रभावित करने की कला अथवा प्रक्रिया है जिससे वे अपनी इच्छा तथा उत्साह से सामूहिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रतिस्पर्धी हो सकें।"
ग्लूएक के अनुसार, "नेतृत्व पारस्परिक व्यवहारों का एक समूह है जिसकी रूपरेखा कर्मचारियों को उद्देश्यों की प्राप्ति में सहयोग को प्रभावित करने के लिए बनायी जाती है।"
गे तथा स्ट्रेक के अनुसार, "नेतृत्व एक प्रक्रिया तथा सम्पत्ति दोनों ही है। नेतृत्व की प्रक्रिया बिना किसी दबाव के एक संगठित समूह के सदस्यों की क्रियाओं को प्रभावित तथा निर्देशित करती है जिसका उद्देश्य सामूहिक उद्देश्यों को प्राप्त करना है। एक सम्पत्ति के रूप में, नेतृत्व उन व्यक्तियों के गुणों तथा विशेषताओं का समूह है जो ऐसा समझा जाता है कि वे इस प्रकार का प्रभाव सफलतापूर्वक नियोजित कर सकते हैं।"
इस प्रकार स्पष्ट है कि नेतृत्व वह गुण है जिसके द्वारा अनुयायियों के समूह से इच्छित कार्य स्वेच्छापूर्वक अथवा बिना किसी दबाव के करवाये जाते हैं।
नेतृत्व की प्रकृति/विशेषताएँ
नेतृत्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं जो उसकी प्रकृति को भी स्पष्ट करती हैं-
दूसरों को प्रभावित करने की योग्यता-नेतृत्व किसी व्यक्ति की दूसरों को प्रभावित करने की योग्यता को दर्शाता है।
व्यवहार में परिवर्तन-नेतृत्व दूसरे के व्यवहार में परिवर्तन लाने का प्रयास करता है।
अनुयायी होना-नेतृत्व की कल्पना बिना उसके अनुयायियों के नहीं की जा सकती है। जिनके अनुयायी नहीं होते हैं वे नेता भी नहीं माने जाते हैं। यथार्थ में अनुयायी ही नेतृत्व को पूर्णता प्रदान करते हैं।
अभिप्रेरित करने की क्रिया-नेतृत्व अपने अनुयायियों को हाँकता नहीं है, वह उनसे जोरजबरदस्ती कार्य नहीं लेता वरन् उन्हें स्वेच्छा से कार्य करने के लिए अभिप्रेरित करता है।
सतत प्रक्रिया-नेतृत्व एक निरन्तर जारी रहने वाली प्रक्रिया है। एक नेता अपने समूह के सदस्यों के व्यवहार को प्रभावित करने हेतु निरन्तर प्रयत्न करता रहता है।
नेतृत्व कार्य करने पर निर्भर करता है-नेतृत्व कार्य करने पर निर्भर करता है, किन्तु जब तक नेतृत्व कुछ करता नहीं है तब तक नेतृत्व के गुण का कोई लाभ नहीं होता है।
आपसी सम्बन्धों पर आधारित-नेतृत्व आपसी सम्बन्धों की स्थिति में ही जन्म लेता है तथा विकसित होता है। ये आपसी सम्बन्ध अनुयायियों तथा नेता के बीच तथा अनुयायियों एवं अनुयायियों के बीच होना आवश्यक है।
सामूहिक हित या हितों की एकता-कुशल नेतृत्व के उद्देश्यों में संगठन, नेता तथा अनुयायियों तीनों के ही हित निहित होते हैं। कुशल नेतृत्व तीनों के ही हितों की पूर्ति के लिए प्रयास करता है।
गतिशील शक्ति या कला-नेतृत्व के सभी तरीकों, विधियों, शैलियों को सभी परिस्थितियों में समान रूप से लागू नहीं किया जाता है। समय और परिस्थितियों के अनुरूप चातुर्य का उपयोग करते हुए नेतृत्व शैली का उपयोग किया जा सकता है।
औपचारिक एवं अनौपचारिक-नेतृत्व की एक विशेषता यह है कि नेतृत्व औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों ही रूपों में पाया जाता है।
लक्ष्य प्रधान नेतृत्व लक्ष्य प्रधान होता है। प्रत्येक नेता सामूहिक एवं व्यक्तिगत उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ही अपने अनुयायियों या अधीनस्थों के व्यवहार को प्रभावित करता है अथवा उनका मार्गदर्शन करता है।
सकारात्मक एवं नकारात्मक-नेतृत्व सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों ही प्रकार का हो सकता है।
अनुकरणीय आचरण-नेतृत्व की सफलता नेता के आचरण पर निर्भर करती है। नेता का आचरण ऐसा होना चाहिए जिसे उसके अनुयायी अपना सकें।