पर्यावरण का मनुष्य के जीवन से गहरा संबंध है। मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति तथा शांत और सुखी जीवन के लिए स्वच्छ वातावरण आवश्यक है। पर्यावरण हमें प्रकृति से मिलता है। नदियाँ, सागर, वन, पहाड़, हरे-भरे मैदान, स्वच्छ वायुमंडल प्रकृति के अंग और उपहार हैं। हमारे शरीर की रचना हमें प्राप्त पर्यावरण के अनुसार होती है।
स्वस्थ शरीर के लिए स्वच्छ पर्यावरण आवश्यक है। संतुलित पर्यावरण में मनुष्य का जीवन सुंदर और सुखी होता है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज विभिन्न कारणों से पर्यावरण का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है। हमारी अनेक समस्याओं का कारण बिगड़ा हुआ पर्यावरण संतुलन ही है। पर्यावरण के असंतुलन के अनेक कारण है।
इसका मूल कारण जनसंख्या में तेजी से हुई वृद्धि है। इससे लोगों की आवश्यकताएँ बढ़ी हैं। इसकी पूर्ति के लिए जंगलों की अंधाधुंध कटाई हुई है। पहाड़ों को तोड़कर सड़कें बनाई गई हैं। वन्य प्राणियों का निर्ममतापूर्वक शिकार किया गया है। नदियों के किनारे बड़े-बड़े कारखाने खड़े किए गए हैं। इससे वनों की हरियाली और शुद्ध वायु
गायब हो गई। नदियों में कारखानों का दूषित जल छोड़े जाने से नदियों का जल प्रदूषित हो गया है। नदियों में पाए जाने वाले जीवों का विनाश हो रहा है। नदियों के दूषित पानी से समुद्र में भी प्रदूषण बढ़ रहा है। कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला विषैला धुआँ वायुमंडल को प्रदूषित कर रहा है। मशीनों, वाहनों तथा लाउडस्पीकरों की कर्कश ध्वनि से वायु प्रदूषण में वृद्धि हुई है। रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के अंधाधुध छिड़काव से खेती की मिट्टी विषैली तथा जमीन से उत्पन्न होने वाला अनाज अस्वास्थ्यकर हो गया है।
इन सबका जिम्मेदार कोई दूसरा नहीं बल्कि मानव स्वयं है। इसका कुप्रभाव भी उसी को भोगना पड़ रहा है। कहीं अतिवृष्टि, कहीं सूखा, कहाँ अत्यधिक गर्मी, कहीं अत्यधिक सर्दी तथा तरह-तरह की भयानक बीमारियाँ पर्यावरण असंतुलन का ही परिणाम हैं।
हमें इस बात को समझना चाहिए कि पर्यावरण का संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। इसी से ही हमें अच्छा स्वास्थ्य और सुखी जीवन जीने का सौभाग्य मिल सकता है।