2. लोकगीत का स्वरूप और विशेषताएँ - साहित्यिक गीतों और लोकगीतों में अन्तर होता है। साहित्यिक मुक्तक एवं गीति - काव्य की समस्त विशेषताएँ रहती हैं, वहाँ लोकगीतों में लोक - जीवन के हार्दिक भावों की ही प्रखरता रहती है। लोकगीतों की भाषा साहित्यिक गीतों की भाँति अधिक व्यवस्थित, अधिक परिष्कृत नहीं होती है। लोकगीत पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक चलते रहते हैं। उनमें कुछ न कुछ परिवर्तन होता रहता है।
उनके रचयिता का पता लगाना कठिन और प्रायः असम्भव होता है। राजस्थानी लोकगीतों में ढोला मारू रा दूहा, बीसलदे रास, माधवानल कामकन्दला आदि प्रसिद्ध हैं। 'हरजी - रो ब्यावलो' और 'नरसी जी - रो माहेरो' राजस्थानी जनता में बहुत लोकप्रिय हैं। लोक - साहित्य में 'हेड़ाऊ मेरो का ख्याल' भी प्रसिद्ध है। 'जीण - माता' का गीत करुण रस की रचना है। 'डूंगजी जवारजी' का गीत वीर रस का उदाहरण है। पाबूजी, रामदेवजी, गोगाजी, जांभोजी, तेजाजी से सम्बन्धित गीत काफी प्रसिद्ध हैं।
3. प्रमुख लोकगीतों का परिचय - राजस्थान में विवाह, नामकरण, धार्मिक आस्था आदि अनेक विषयों से सम्बन्धित गीतों का वर्गीकरण निम्न प्रकार है परिवार सम्बन्धी गीत - परिवार के मांगलिक कार्यों के अवसर पर, विवाह आदि में भावपूर्ण लोकगीत गाये जाते धार्मिक गीत - देवी - देवताओं की पूजा, गृह - पूजन, जागरण, उपवास आदि के अवसरों पर धार्मिक आस्था के गीत गाये जाते हैं। प्रकृति सम्बन्धी गीत - अलग - अलग ऋतुओं पर लोकगीत गाये जाते हैं।
विशेषकर वर्षा एवं वसन्त ऋतु पर राजस्थान में अनेक लोकगीत प्रचलित हैं। त्योहार - पर्व से सम्बन्धी गीत - गणगौर, शीतलाष्टमी, गोपाष्टमी, होली, दीपावली आदि पर त्योहार - पर्व की महिमा से सम्बन्धित लोकगीत गाये जाते हैं। अन्य गीत - राजस्थान में और भी अनेक प्रकार के गीत प्रचलित हैं। अमरसिंह राठौड़, गोरबन्द, रतनराणा, लाखा, मूमल, घुड़लो, नींदड़ली, घूमर, भैंरू आदि से सम्बन्धित बहुत प्रकार के लोकगीत प्रदेश के विभिन्न भागों में प्रचलित.
4. उपसंहार - अपनी सांस्कृतिक विशेषता के समान ही लोकगीतों की दृष्टि से राजस्थान का विशेष महत्त्व है। यहाँ के लोकगीतों में हृदयगत भावों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। इनमें जो भावुकता और जो वेदना रहती है।
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