सहज प्रतिरक्षा - सहज प्रतिरक्षा एक प्रकार की अविशिष्ट रक्षा है जो जन्म के समय मौजूद होती है। यह प्रतिरक्षा हमारे शरीर में बाह्य कारकों के प्रवेश के सामने विभिन्न प्रकार के रोध खड़ा करने से हासिल होती है। सहज प्रतिरक्षा में चार प्रकार के रोध होते हैं। ये रोध हैं-
(i) शारीरिक रोध - हमारे शरीर पर त्वचा मुख्य रोध है जो सूक्ष्मजीवों के प्रवेश को रोकता है। श्वसन, जठरांत्र (गैस्ट्रोइंटेटाहनल) और जननमूत्र पथ को आस्तरित करने वाली एपिथीलियम का श्लेष्मा आलेप भी शरीर में घुसने वाले रोगाणुओं को रोकने में - सहायता करता है।
(ii) कार्यिकीय रोध- आमाशय में अम्ल, मुँह में लार, आँखों के आँसू, ये सभी रोगाणीय वृद्धि को रोकते हैं।
(iii) कोशिकीय रोध - हमारे शरीर के रक्त - में बहुरूप केन्द्रक श्वेताणु उदासीनरंजी, जैसे-कुछ प्रकार के श्वेताणु और एककेन्द्रकाणु तथा प्राकृतिक, मारक लिंफोसाइट्स के प्रकार एवं ऊतकों में वृहत् रोगाणुओं का भक्षण करते और नष्ट करते हैं।
(iv) साइटोकाइन रोध - विषाणु संक्रमित कोशिकाएँ इंटरफेरॉन नामक प्रोटीनों का स्त्रावण करती हैं जो असंक्रमित कोशिकाओं को और आगे विषाणु संक्रमण से बचाती हैं।