2. समाज में नारी के विविध क्षेत्र - प्राचीनकाल में नारी का सामाजिक जीवन में सीमित कार्य - क्षेत्र था, परन्तु मानव - सभ्यता के विकास के साथ ही नारी की स्थिति अधिक व्यापक बनती गई। आधुनिक युग में नारी एक कुशल प्रशासनिक अधिकारी, मंत्री, शिक्षिका, डॉक्टर, व्यवसायी, वकील, नर्स, पुलिसकर्मी आदि रूपों में अपने कार्य - क्षेत्र का विस्तार कर रही है। वह अब उद्योग - व्यवसाय से लेकर हवाई जहाज का संचालन करने तक अपना वर्चस्व स्थापित कर रही है। आज नारी एक ओर अपनी सन्तान को सुसंस्कारित करने में विशेष ध्यान रखती है, तो दूसरी ओर अपने परिवार के आर्थिक विकास तथा भौतिक समुन्नति में पति का पूरा साथ देती है। इस तरह आधुनिक काल में समाज - निर्माण की दृष्टि से नारी का योगदान विशिष्ट मान्य है।
3. समाज - निर्माण में नारी की भूमिका - नारी को पुरुष का आधा अंग माना जाता है, परन्तु समाज में उसे पुरुष के समान सभी अधिकार प्राप्त नहीं हैं। हमारे देश में अब नारी - समाज के उन्नयन का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। अब समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और साक्षरता या सर्वशिक्षा अभियान आदि के प्रचलन से ग्रामीण नारी - समाज में भी जागृति आ रही है। इस तरह अब नारी अपने व्यवहार तथा परम्परागत संस्कारों से समाज को नयी दिशा देने में सक्षम है।
वह अपने अधिकारों का स्वतंत्रता से उपयोग कर सकती है तथा पुरुष वर्ग की प्रेरणा बनकर मंगलमय सामाजिक जीवन का निर्माण कर सकती है। समाज का रहन - सहन, आचरण, संस्कार, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक आदर्श आदि सभी का प्रसार कर नारी सामाजिक जीवन के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
4. उपसंहार - नारी सुख - सम्पन्न घर की लक्ष्मी, पति की प्रेरणा - शक्ति दुर्गा और सन्तान को सुशिक्षा देने वाली सरस्वती स्वरूपा है। इसी विशेषता को लक्ष्य कर छायावादी कवि 'प्रसाद' ने कहा है, "नारी तुम केवल श्रद्धा हो" इत्यादि। अपने परिवार के साथ समाज के निर्माण और विकास में नारी का विशिष्ट योगदान माना जाता है।
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