तोड़ो - यह एक उद्बोधनपरक कविता है। कवि हमें प्रेरित करता है कि कुछ नया सृजन करने के लिए हमें चट्टानों, ऊसरों एवं बंजरों को तोड़ना पड़ेगा। परती एवं ऊसर जमीन को अपने परिश्रम से खेती करने के लायक बनाना होगा व सृजन की पृष्ठभूमि तैयार करनी होगी। यहाँ कवि सृजन की प्रेरणा देता है, विध्वंस की नहीं। कविता का ऊपरी ढाँचा सरल प्रतीत होता है परन्तु प्रकृति से मन की तुलना करते हुए कवि ने इस कविता को अर्थ के नए आयामों से जोड़ दिया है।
बंजर केवल प्रकृति में ही नहीं है, हमारे मन में भी है। मन में व्याप्त ऊब, खीझ भी तो उसी बंजर की तरह है। अतः इन्हें भी तोड़ने की तथा इनसे उबरने की जरूरत है तभी मन उर्वर बनेगा और सृजनशील हो सकेगा। मन के भीतर की ऊब सृजन में बाधक है अतः उससे उबरना आवश्यक है तभी हम रचनाशीलता की ओर अग्रसर हो सकेंगे। कवि मन के बारे में प्रश्न उठाकर आगे बढ़ जाता है, इससे कविता का अर्थ विस्तार हुआ है।