विज्ञापन का अर्थ-विज्ञापन प्रवर्तन के लिए सबसे सामान्य रूप से उपयोग में लायी जाने वाली तकनीक मानी जाती है। यह अवैयक्तिक सम्प्रेषण होते हैं जिसका भुगतान विपणनकर्ता (प्रायोजक) वस्तु एवं सेवाओं के प्रवर्तन के लिए करते हैं। दूसरे शब्दों में, विज्ञापन से आशय ऐसे दृश्य, लिखित या मौखिक अवैयक्तिक सन्देशों से है जो जनता को क्रय के लिए प्रेरित करने हेतु संचार माध्यमों द्वारा जनसामान्य को प्रसारित किये जाते हैं। विज्ञापन के सर्वसाधारण माध्यम समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, रेडियो एवं टेलीविजन आदि हैं।
विज्ञापन की प्रमख विशेषताएँ-विज्ञापन की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं, जो इसके अर्थ को और अधिक स्पष्ट करती हैं-
भुगतान स्वरूप-विज्ञापन संप्रेषण का वह स्वरूप है जिसमें उसके लिए भुगतान किया जाता है अर्थात् विज्ञापनकर्ता जनता के साथ सम्प्रेषण की लागत को वहन करता है।
अवैयक्तिक-व्यक्ति एवं विज्ञापनकर्ता प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे के सम्पर्क में नहीं आते हैं। इसीलिए इसे प्रवर्तन की अवैयक्तिक पद्धति कहते हैं।
चिह्नित विज्ञापनदाता-विज्ञापन निश्चित व्यक्ति करते हैं अथवा कम्पनियाँ करती हैं जो विज्ञापन में श्रम करती हैं तथा इसकी लागत को भी वहन करती हैं।
सन्देश विनयपूर्वक-विज्ञापन में विज्ञापक सन्देश विनयपूर्वक आग्रह के रूप में प्रस्तुत करता है न कि एक आदेश के रूप में।
अन्य-(1) विज्ञापन विज्ञापक या प्रायोजक के पक्ष को प्रस्तुत करता है। (2) विज्ञापन निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है। (3) विज्ञापन का क्षेत्र व्यापक है। (4) विज्ञापन सार्वभौमिक है।
विज्ञापन के लाभ-विज्ञापन के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं-
बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचना-विज्ञापन एक ऐसा माध्यम है जिसके माध्यम से दूर-दूर फैले बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। उदाहरणार्थ, राष्ट्रीय दैनिक में दिया गया विज्ञापन, इसके लाखों पाठकों तक पहुँचता है।
ग्राहक सन्तुष्टि-विज्ञापन उत्पाद की गुणवत्ता को सुनिश्चित करता है इसीलिए ग्राहक अधिक सन्तुष्टि अनुभव करते हैं।
विश्वास में वृद्धि-विज्ञापन का एक प्रमुख लाभ यह है कि इसके माध्यम से ग्राहक अधिक सहजता का अनुभव करता है क्योंकि विज्ञापन उन्हें कई प्रकार की जानकारियाँ उपलब्ध कराता है।
स्पष्टता-कला, कम्प्यूटर, डिजाइन एवं ग्राफिक्स में विकास के साथ विज्ञापन सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम के रूप में विकसित हो चुका है। विशेष प्रभावोत्पादन के कारण सरल उत्पाद एवं सन्देश भी बहुत . आकर्षक लगने लगते हैं।
मितव्ययता-विज्ञापन बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचने के लिए कम व खर्चीला सम्प्रेषण का साधन है। व्यापकता के कारण विज्ञापन का कुल खर्च सम्प्रेषण द्वारा बनाये सम्बन्धों में बाँट दिया जाता है। फलतः प्रति इकाई लागत कम हो जाती है।
विज्ञापन की सीमाएँ-विज्ञापन की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित बतलायी जा सकती हैं-
1. कम सशक्त-विज्ञापन सम्प्रेषण का एक अवैयक्तिक स्वरूप होता है। यह वैयक्तिक विक्रय की तुलना में कम प्रभावी व कम सशक्त माध्यम है क्योंकि लोगों पर ध्यान देने के लिए इसमें किसी भी प्रकार का दबाव नहीं होता है।
2. प्रतिपोषण में कमी-विज्ञापन का सन्देश जो जनता को दिया जाता है उसका प्रभाव जनता पर कितना पड़ा, इसका मूल्यांकन करना कठिन होता है क्योंकि इसमें प्रसारित सन्देश की तुरन्त एवं सही प्रतिपोषण की कोई व्यवस्था नहीं है।
3. लोचपूर्णता का अभाव-विज्ञापन में सन्देश क्योंकि निर्धारित मानक का हो जाता है एवं विभिन्न ग्राहक समूहों की आवश्यकता के अनुसार नहीं ढाला जा सकता इसलिए विज्ञापन में लोच का अभाव होता है।
4. कम प्रभावी-जैसे-जैसे विज्ञापनों की संख्या में वृद्धि होती जाती है वैसे-वैसे यह कठिन हो जाता है कि लक्षित लोग विज्ञापन के सन्देश को ग्रहण करें ही। अतः । इससे विज्ञापन की प्रभावोत्पादकता प्रभावित होती जाती है। इसके साथ ही एक ही प्रकार की वस्तु के कई निर्माता होते हैं अतः उन सबके द्वारा अपनी वस्तु का किया गया विज्ञापन भी जनता पर कम प्रभाव डालता है।