विपणन एवं विक्रय में अन्तर-
1. प्रक्रिया का भाग बनाम व्यापक अर्थविपणन विक्रय से कहीं अधिक व्यापक है। इसमें कई क्रियाएँ सम्मिलित हैं, जैसे-ग्राहकों की आवश्यकताओं की पहचान करना, इनकी पूर्ति के लिए उत्पाद को विकसित करना, मूल्यों का निर्धारण करना तथा सम्भावित क्रेताओं को इनके क्रय के लिए तैयार करना, जबकि विक्रय विपणन प्रक्रिया का एक अंग मात्र है तथा इसमें वस्तुओं का अधिग्रहण एवं स्वामित्व विक्रेता से क्रेता को हस्तान्तरित होता है।
2. स्वामित्व/अधिकार हस्तान्तरण बनाम ग्राहकों की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि-विपणन का अत्यधिक जोर ग्राहकों की इच्छाओं एवं आवश्यकताओं की अधिकतम सन्तुष्टि पर होता है, जबकि विक्रय का अत्यधिक जोर मुख्यतः वस्तुओं का स्वामित्व/अधिकार एवं अधिग्रहण का विक्रेता से उपभोक्ता एवं उपयोगकर्ता को हस्तान्तरण करने पर होता है।।
3. लाभ बनाम ग्राहक सन्तुष्टि-विपणन में ग्राहक की सन्तुष्टि तथा उसके माध्यम से लम्बी अवधि में लाभ में वृद्धि पर ध्यान दिया जाता है, जबकि विक्रय का अधिकतम जोर अधिकतम विक्रय के द्वारा अधिकतम लाभ अर्जित करना होता है। इस प्रकार विपणन संगठन ग्राहक सन्तुष्टि के माध्यम से अधिक लाभ प्राप्त करने को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानता है, जबकि विक्रय की सभी क्रियाएँ अधिकतम विक्रय द्वारा अधिकतम लाभ कमाने को महत्त्वपूर्ण मानती हैं।
4. प्रारम्भ एवं अन्त-विपणन की क्रियाएँ वस्तु के उत्पादन से काफी पहले प्रारम्भ हो जाती हैं तथा वस्तुओं के विक्रय के पश्चात् भी चलती रहती हैं, जबकि विक्रय क्रियाएँ उत्पाद के विकसित कर लेने के पश्चात् प्रारम्भ होती हैं।