Question
वित्तीय निर्णय के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालिए।

Answer

वित्तीय निर्णय
वित्तीय सन्दर्भ में वित्तीय निर्णय से तात्पर्य सर्वोत्तम वित्तीय विकल्प अथवा सर्वोत्तम विनियोग विकल्प के सम्बन्ध में निर्णय लेने से है। वित्तीय निर्णय लेने का अर्थ निम्न प्रकार के निर्णयों के लेने से है-
1. निवेश सम्बन्धी निर्णय-निवेश सम्बन्धी निर्णय का सम्बन्ध इस बात से होता है कि व्यावसायिक संस्था के कोषों की विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों में कैसे विनियोजित किया जाये ताकि वे अपने निवेशकों को अधिकतम लाभ उपार्जित करवा सकें। निवेश निर्णय दीर्घकालीन अथवा अल्पकालीन हो सकता है। दीर्घकालीन निवेश निर्णय को पूँजी बजटीय निर्णय भी कहा जाता है। किसी भी व्यवसाय के लिए ऐसे निर्णय बड़े महत्त्वपूर्ण होते हैं क्योंकि ये दीर्घकाल में संस्था की लाभदायकता को प्रभावित करते हैं। सम्पत्तियों का आकार, लाभदायकता तथा तुलनात्मकता सभी पूँजी बजटिंग निर्णयों से प्रभावित होती हैं। ये सभी निर्णय सामान्यतः निवेश की भारी मात्रा की राशि को सम्मिलित किये हुए होते हैं तथा इनको एक बड़ी भारी लागत में अतिरिक्त परिवर्तित भी नहीं किया जा सकता है। ऐसे निर्णयों को लेते समय अत्यधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है क्योंकि इनके सम्बन्ध में यदि गलत निर्णय ले लिया जाता है तो यह व्यवसाय की कार्यक्षमता को तो ङ्केनुकसान पहुंचाता ही है, भविष्य में भी वित्तीय हानि होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
पूँजी बजटिंग निर्णय को परियोजना का रोकड़ प्रवाह, आय की दर, निवेश कसौटी अन्तर्भावितता तथा अल्पकालीन निवेश निर्णय आदि प्रभावित करते हैं।
2. वित्तीयन सम्बन्धी निर्णय-वित्तीयन सम्बन्धी निर्णय दीर्घकालीन स्रोतों से धन प्राप्त करके वित्त के उचित उपयोग के सम्बन्ध में लिया जाता है। इसके अन्तर्गत पूँजी के विभिन्न उपलब्ध स्रोतों की पहचान की जाती है।
सामान्यतः या व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा दीर्घकालीन वित्त प्राप्ति के लिए अंशधारी कोष तथा उधार निधियों को अपनाया जाता है। अंशधारी कोष से तात्पर्य समता पूँजी तथा प्रतिधारित उपार्जन से होता है। उधार निधियों से तात्पर्य उस वित्त से होता है जिसका प्रबन्ध ऋणपत्रों के निर्गमन या कोई अन्य रूप में लिये हुए ऋण से है। व्यावसायिक संस्था द्वारा समता पूँजी निधि तथा उधार निधियों का अनुपात कितना रखा जायेगा यह उसके अपने स्वयं के आधारभूत लक्षणों पर निर्भर करता है। उधार निधियों पर एक तो कम्पनी को पूर्व निश्चित दर से ब्याज देना पड़ता है, साथ ही पुनर्भुगतान भी एक निश्चित समय के उपरान्त करना पड़ता है। भुगतान न करने की चूक को वित्तीय जोखिम कहा जाता है जिसे कम्पनी के पास पर्याप्त मात्रा में लाभ का न होना भी कहा जाता है; क्योंकि निश्चित समय पर कम्पनी के पास भुगतान करने के लिए पर्याप्त मात्रा में लाभ नहीं होता है। दूसरी तरफ अंशधारियों की निधि की ओर से कोई इस प्रकार की वचनबद्धता नहीं होती है कि वे प्रति लाभ या पँजी का पुनर्भुगतान करेंगे। अत: एक व्यावसायिक संस्था को वित्तीय निर्णय लेने में विवेकसंगत होना चाहिए ताकि ऋण तथा समता का अनुपात उचित हो। इन वित्तीय निर्णयों में ऋण या समता तथा पूर्वाधिकार अंशपूँजी तथा प्रतिधारित उपार्जन हो सकते हैं।
प्रत्येक प्रकार के वित्त की लागत का अनुमान लगाया जाता है। कुछ स्रोत दूसरों की अपेक्षा सस्ते हो सकते हैं। प्रत्येक प्रकार के स्रोत के लिए सहयोगी जोखिम भी पृथक् ही है। यह वित्तीय जोखिम कुल पूँजी में ऋण के अनुपात पर भी निर्भर करती है। सामान्यतया वित्तीय निर्णय को लागत, जोखिम, प्रवर्तन लागत, रोकड़ प्रवाह स्थिति, स्थायी संचालन लागत का स्वर, नियन्त्रण प्रतिफल तथा पूँजी बाजार की स्थिति आदि प्रभावित करते हैं।
3. लाभांश से सम्बन्धित निर्णय-लाभांश से सम्बन्धित निर्णय में यह निश्चित किया जाता है कि अर्जित लाभ (कर का भुगतान न करने के पश्चात्) का कितना लाभ अंशधारियों में लाभ के रूप में वितरित कर दिया जाये तथा लगभग कितना भाग संस्था में अर्जित लाभ को पुनः विनियोजनार्थ रखा जाये ताकि विनियोग की आवश्यकता को पूरा किया जा सके। यद्यपि लाभांश वर्तमान आय का द्योतक है तो अर्जित लाभ का पुनर्विनियोजन संस्था की भविष्य में आय में वृद्धि करने में सहायक होता है। अर्जित आय की सीमा संस्था के वित्तीय निर्णय को प्रभावित करती है। जब संस्था को प्रतिधारित उपार्जन के पुनर्निवेश की उतनी आवश्यकता नहीं होती है जितना कि प्रतिधारित उपार्जन की मात्रा कम्पनी में उपलब्ध है तो लाभांश के वितरण से सम्बन्धित निर्णय करते समय अंशधारियों की सम्पत्ति को उच्चतम सीमा तक बढ़ाने के उद्देश्य को ध्यान में रख कर लेना चाहिए।
लाभांश निर्णय को उपार्जन, उपार्जन का स्थायित्व, लाभांश का स्थायित्व, संवृद्धि सुयोग, रोकड़ प्रवाह स्थिति, पूर्वाधिकारी अंशधारी, करारोपण नीति, शेयर बाजार प्रतिक्रिया, पूँजी बाजार तक पहुँच, कानूनी बाध्यता तथा संविदात्मक प्रतिबन्ध आदि कारक प्रभावित करते

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