Question
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सैनिक शिक्षा

Answer

1. प्रस्तावना - वर्णाश्रम व्यवस्था भारतीय संस्कृति की एक उदात्त परम्परा थी। उसमें सामाजिक व्यवस्था जाति, वर्ण एवं कर्म के अनुसार थी। सैनिक शिक्षा केवल राजकुमारों और क्षत्रियों तक ही सीमित थी। यही समझा जाता था कि देश की सुरक्षा का भार केवल उन्हीं के कन्धों पर है। सैनिक प्रशिक्षण के लिए सभी छोटे - छोटे राज्यों में सैनिक य और आचार्य सुनिश्चित थे, प्रशिक्षण का समय नियत रहता था और उसके बाद एक युवा सक्षम सैनिक योद्धा बन जाता था। 

2. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सैनिक शिक्षा की आवश्यकता - सैनिक शिक्षा कई दृष्टियों से उपयोगी और जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण होती है। इससे लोगों में अनुशासन आता है। इससे सेवा, त्याग, बलिदान और निष्ठा जैसे महान गुणों को बढ़ावा मिलता है और साथ ही आवश्यकता पड़ने पर देश को विदेशी हमलों से बचाने के लिए प्रशिक्षित सैनिक उपलब्ध हो जाते हैं। वर्तमान आणविक युग में व्यक्ति एवं राष्ट्र दोनों के लिए सैनिक शिक्षा अत्यावश्यक है। 

(क) राष्ट्र - स्वतन्त्र प्रभुसत्ता - सम्पन्न राष्ट्र की दृष्टि से भारतवर्ष में सैनिक शिक्षा की अनिवार्यता आवश्यक है। यदि हम चाहते हैं कि कॉलेज और विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त नगरों और ग्रामों में भी सैनिक प्रशिक्षण केन्द्र खोल दिए जायें, ताकि आवश्यकता होने पर प्रशिक्षित युवा सेना की पूरी सहायता कर सकें। 

(ख) व्यक्ति - व्यक्ति की दृष्टि से भी अनिवार्य सैनिक शिक्षा की योजना एक महत्त्वपूर्ण योजना है। इससे नागरिकों का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा और वे देश के प्रति अपने उत्तरदायित्व का भली - भाँति निर्वाह कर सकेंगे। 

3. सैनिक शिक्षा का प्रसार - स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने इस दिशा में विशेष ध्यान दिया है। स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में छात्रों को सैनिक प्रशिक्षण दिया जाता है। उच्च माध्यमिक कक्षाओं के लिए ए.सी.सी. तथा स्नातक स्तर कक्षाओं के लिए सीनियर एन.सी.सी. के कोर्स सुनिश्चित कर दिये गये हैं। परन्तु यह विषय अनिवार्य होना चाहिए, ताकि इससे सभी छात्र लाभान्वित हो सकें। इसलिए देश के प्रत्येक नगर और प्रत्येक ग्राम में सैनिक प्रशिक्षण केन्द्र होने चाहिए। इससे युवाओं में राष्ट्र की रक्षा के लिए त्याग और बलिदान की भावना प्रखर बन जायेगी। 

4. उपसंहार - राष्ट्र की आन्तरिक और बाह्य आक्रमणों से रक्षा के साथ ही नागरिकों की व्यक्तिगत शारीरिक, मानसिक एवं नैतिक उन्नति के लिए सैनिक शिक्षा आवश्यक है। यह शिक्षा साहसी, कर्तव्यनिष्ठ, पराक्रमी, उद्यमी, परिश्रमी तथा स्वावलम्बी बनने में भी उपयोगी रहती है। सीमाओं की सुरक्षा के साथ ही आतंकवादियों के दमन हेतु अनिवार्य सैनिक शिक्षा का प्रसार अपेक्षित है।

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