संस्कत में एक उक्ति है 'यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते।' अर्थात कवि को जैसा रुचता है. वह उसी प्रकार के विश्व की रचना अपनी सृष्टि (काव्य संसार) में कर लेता है। यह आवश्यक नहीं है कि संसार जैसा है कवि उसको अपनी कृति में वैसा ही दिखाये। वह इस विश्व को अपनी इच्छा के अनुसार बदल देता है।
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