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गद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दें। [10M] [TEXT]

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Question 110 Marks
रामपुर नवाब के महल में भी नाचा हूँ नेपाल महाराज के यहाँ भी नाचा हूँ और जमींदारों के यहाँ भी नाचा हूँ जहाँ का मैं अक्सर तमाशा सुनाता रहता हूँ कि जहाँ महफिल भी लगी है कि लड़का नाचेगा जरा चारों तरफ थोड़ा खिसककर जगह बनाओ तो सब खिसक जायें तो नीचे गलीचा गलीचे पर चांदनी और चाँदनी गलीचे के नीचे जमीन पर कहीं पर गड्ढे हैं कहीं पर खाँचा है मतलब यह सब नहीं कौन परवाह करे। आजकल हमारे नये डांसर हैं कि स्टेज बड़ा खराब है बड़ा टेढ़ा है बड़ा गड्ढा है। हम लोगों को यह सब सोचने का कहाँ मौका मिलता था। अब गर्मी के दिनों में जरा सोचो न एयरकंडीशन; न कुछ वो बड़े-बड़े पंखे लेकर जो नौकर-चाकर थे, वो हाँकते रहते थे। उनसे भी हाथ बचाना पड़ता था। नाचने में उससे न लड़ जायें कहीं। दूसरे कि गैस लाइट जल रही है उसकी भी गर्मी।
(i) बिरजूजी का नृत्य कहाँ-कहाँ हुआ है ?
(ii) उस समय स्टेज की व्यवस्था कैसे होती थी?
(iii) पहले और आज के नर्तकों में क्या अन्तर है ?
(iv) सफल नर्तक की क्या पहचान है?
(v) लेखक ने अपने नाचने के अनुभवों में किन कठिनाइयों का सामना किया और वे कैसे उनसे निपटते थे?
Answer
(i) बिरजूजी का नृत्य रामपुर नवाब के महल में, नेपाल महाराज के भवन में, अनेक जमींदारों आदि के यहाँ हुआ है।
(ii) उस समय स्टेज की व्यवस्था अजीबोगरीब होती थी। न समुचित रोशनी की व्यवस्था होती और न ही समतल फर्श आदि की होती थी। नृत्य हो इसके लिए साधारण रूप से व्यवस्था कर दी जाती थी।
(iii) पहले के नर्तक अपनी कला को प्रदर्शन करना जानते थे। उन्हें वाद्य-संयंत्रों, बिजली आदि की व्यवस्था से उतना संबंध नहीं रहता था। जो था उसी पर वे अपनी कला प्रदर्शित कर देते थे। आज के नर्तक कला, प्रदर्शन नहीं बाह्य आडंबर प्रदर्शित करते हैं। आज के लिए उन्हें चकाचौंध स्टेज, परिपूर्ण वाद्य-यंत्र चाहिए।
(iv) सफल नर्तक रंगमंच से प्रभावित नहीं होता है। बल्कि अपनी कला का आत्मसात करना * चाहता है। कला प्रदर्शन की क्षमता ही सफल नर्तक की पहचान है।
(v) लेखक ने रामपुर नवाब के महल, नेपाल महाराज और जमींदारों के यहाँ नाचते समय खराब स्टेज, गड्ढे और खाँचे जैसी असुविधाओं का सामना किया। साथ ही गर्मी, गैस लाइट की गर्माहट और पंखों के कारण भी परेशानियां थीं, लेकिन वे इन सब कठिनाइयों को अनदेखा कर अपनी कला में पूरी मेहनत से लगे रहते थे।
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Question 210 Marks
बि.म:-अम्माजी का बहुत बड़ा हाथ है। अम्माजी ने तो शुरू से उन बुजुर्गों की तारीफ कर करके मेरे सामने हरदम कि, बेटा वो ऐसे थे, उनको कम-से-कम इतना नाम तो याद था उन बुजुर्गों का। अभी आप दूसरे किसी से पूछे घर में तो उन्हें नाम भी नहीं मालूम था कि कौन थे। चाची (शंभू महाराज की पत्नी) से आप पूछे महाराज बिन्दादीन के बाद पहले और कौन थे तो उनको नहीं मालूम। तुमरियाँ भी मैंने उनसे सीखीं। मेरी वाकई में गुरुवाइन थी; वो माँ तो थीं ही। गुरुवाइन भी। और जब भी मैं नाचता था तो सबसे बड़ा एक्जामिनर या जज अम्मा को समझता था। जब भी वो नाच देखती थीं तो मैं कहता था उनसे कि मैं कहीं गलत तो नहीं कर रहा हूँ। मतलब बाबूजी वाला ढंग है ना कहीं गड़बड़ी तो नहीं हो रही। तो कही नहीं बेटा नहीं। उन्हीं की तस्वीर हो। पर बैले वैले यह तो मेरा भैया क्रियेशन है। वो हरदम ऐसे ही कहती रहीं और लखनऊ के जो बुजुर्ग थे उनसे भी, गवाही ली मैंने। चेंज तो नहीं लग रहा है। “नहीं बेटा वही ढंग है। और तुम्हारा शरीर वगैरह टोटल ढंग वैसा ही है। बैठने का, उठने का, बात करने का। मतलब जैसा था उनका।
(i) बिरजू ने अपनी माँ को गुरुवाइन क्यों कहा है ?
(ii) नृत्य करते समय बिरजू अपना जज किसे मानते थे? और क्यों ?
(iii) बिरजू को गवाही लेने के लिए क्या करना पड़ता था ?
(iv) अम्माजी ने लेखक के सामने बुजुर्गों की तारीफ किस तरह की और इसका लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा?
(v) लेखक नाचते समय अम्माजी को सबसे बड़ा जज क्यों मानता था और इससे उसकी कला में क्या सुधार हुआ?
Answer
(i) बिरजू की माँ अक्सर पूर्वजों का गुणगान कर उनमें हौसला भरा करती थीं। किसी का नाम पूछने पर झट से बता देती थीं। नृत्य में, गलत होने पर समझा देती थीं। अपनी माँ को गुरुवाइन कहा है।
(ii) जज का काम न्याय करना होता है। न्याय के मंच पर बैठा हुआ व्यक्ति अपना-पराया नहीं देखता है। बिरजूजी की मां नृत्य करते समय अच्छे-बुरे की ताकीद किया करती थीं। अच्छा होने पर ही वह अच्छा कहती थीं।
(iii) नृत्य अच्छा हुआ या नहीं इसके लिए बिरजू महाराज अपनी माँ को नियुक्त करते थे। गायन और नृत्य में कहीं अन्तर तो नहीं हुआ इसके लिए माँ से पूर्वजों का उदाहरण लिया करते थे। इतना ही नहीं लखनऊवासियों से भी हामी भरवाते थे।
(iv) अम्माजी ने लेखक के सामने बुजुर्गों की खूब तारीफ की और बताया कि वे बुजुर्ग कलाकारों का नाम और उनके ढंग को भली-भांति जानते थे, जबकि दूसरे लोग उन्हें नहीं जानते थे। इससे लेखक को अपनी विरासत और परंपरा की गहराई का एहसास हुआ और उसने बुजुर्गों से सीखने और उनकी परंपरा को निभाने का संकल्प लिया।
(v) लेखक अम्माजी को सबसे बड़ा जज इसलिए मानता था क्योंकि उनकी निगाह में उसकी हरकतें परखती थीं और वे उसे सही मार्ग दिखाती थीं। इससे लेखक को अपनी गलतियों का पता चलता और वह अपनी नृत्य कला को सही ढंग से सुधार पाता था।
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