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Question 15 Marks
भारत में भू-संसाधनों का उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है? समझाइये।
Answer
भारत में भू-संसाधनों का उपयोग निम्नलिखित उद्देश्यों से किया जाता है-
वन।
कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि- (i) बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि (ii) गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि-जैसे इमारतें, सड़क, उद्योग इत्यादि।
परती भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि- (i) स्थायी चरागाहें तथा अन्य गोचर भूमि (ii) विविध वृक्षों, वृक्ष फसलों, तथा उपवनों के अधीन भूमि (जो शुद्ध बोए गए क्षेत्र में शामिल नहीं है) (iii) कृषि योग्य बंजर भूमि जहाँ पाँच से अधिक वर्षों से खेती न की गई हो।
परती भूमि- (i) वर्तमान परती (जहाँ एक कृषि वर्ष या उससे कम समय से खेती न की गई हो) (ii) वर्तमान परती भूमि के अतिरिक्त अन्य परती भूमि या पुरातन परती (जहाँ 1 से 5 कृषि वर्ष से खेती न की गई हो)।
शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र- एक कृषि वर्ष के एक बार से अधिक बोए गए क्षेत्र को शुद्ध (निवल) बोए गए क्षेत्र में जोड़ दिया जाए तो वह सकल कृषित क्षेत्र कहलाता है।
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Question 25 Marks
विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए।
Answer
विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों को निम्न प्रकारों में बाँटा जा सकता है
(1) संभावी संसाधन-वे संसाधन जो किसी प्रदेश में विद्यमान होते हैं परन्तु इनका उपयोग नहीं किया गया है, संभावी संसाधन कहलाते हैं। जैसे-भारत के पश्चिमी भाग, विशेषकर राजस्थान और गुजरात में पवन और सौर ऊर्जा संसाधनों की अपार संभावना है, परन्तु इनका अभी तक सही ढंग से उपयोग नहीं हुआ है।
(2) विकसित संसाधन-यह वे संसाधन होते हैं जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है और उनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा भी निर्धारित की जा चुकी है। विकसित संसाधन प्रौद्योगिकी और उनकी संभाव्यता के स्तर पर निर्भर करते हैं।
(3) भण्डार-पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं परन्तु उनकी प्राप्ति की कोई उपयुक्त प्रौद्योगिकी अभी उपलब्ध नहीं है, भण्डार में शामिल हैं। जैसे-जल दो ज्वलनशील गैसों, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का यौगिक है तथा यह ऊर्जा का मुख्य स्रोत बन सकता है। परन्तु इस उद्देश्य से, इनका प्रयोग करने के लिए हमारे पास आवश्यक तकनीकी ज्ञान नहीं है।
(4) संचित कोष-भंडार का वह हिस्सा, जिन्हें उपलब्ध तकनीकी ज्ञान की सहायता से प्रयोग में लाया जा सकता है, परन्तु इनका उपयोग अभी आरम्भ नहीं हुआ है, संचित कोष कहलाता है। इनका उपयोग भविष्य में आवश्यकता पूर्ति के लिए किया जा सकता है। नदी जल, बाँधों में जल, वन आदि संचित कोष हैं जिनका भविष्य में अधिकाधिक उपयोग किया जा सकता है।
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Question 35 Marks
मृदा अपरदन और संरक्षण पर एक भौगोलिक लेख लिखिए।
Answer
मृदा अपरदन का अर्थ- मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहा जाता है। मृदा अपरदन के प्रकार-मृदा अपरदन के प्रकार निम्नलिखित हैं-
उत्खात भूमि-प्रवाहित जल मृत्तिकायुक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ बनाता है जिनको अवनलिकाएँ कहते हैं। इस प्रकार की भूमि जुताई के अयोग्य हो जाती है जिसे उत्खात भूमि के नाम से जाना जाता है।
चादर अपरदन-अनेक बार जल विस्तृत क्षेत्र को ढके हुए ढाल के साथ नीचे की तरफ प्रवाहित होता है, जिससे उस क्षेत्र की ऊपरी मृदा घुलकर जल के साथ बह जाती है, इसे चादर अपरदन कहते हैं।
पवन अपरदन-पवन द्वारा मैदान अथवा ढालू क्षेत्र से मृदा को उड़ा ले जाने की प्रक्रिया को पवन अपरदन कहा जाता है।
कृषि के गलत तरीके अपनाना- कृषि के गलत तरीकों से भी मृदा अपरदन होता है।
मृदा संरक्षण-मृदा संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए-
समोच्च जुताई-ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानान्तर हल चलाने से ढाल के साथ जल बहाव की गति घटती जाती हैं।
सीढ़ीदार कृषि-ढाल वाली भूमि पर सोपान बनाए जा सकते हैं। सोपान कृषि अपरदन को नियंत्रित करती है। पश्चिमी और मध्य हिमालय में सोपान अथवा सीढ़ीदार कृषि काफी विकसित है। पट्टी कृषि-बड़े खेतों को पट्टियों में विभाजित किया जाता है। फसलों के बीच में घास की पट्टियाँ उगाई जाती हैं। ये पवनों के द्वारा जनित बल को कमजोर करती हैं। इस तरीके को पट्टी कृषि कहते हैं।
पेड़ों को कतारों में लगाना-पेड़ों को कतारों में लगा कर रक्षक मेखला बनाना भी पवनों की गति कम करता है। इन रक्षक पट्टियों का पश्चिमी भारत में रेत के टीलों के स्थायीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।
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Question 45 Marks
भारत में भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी कारक तथा इसे नियंत्रित करने के उपाय बताइये।
Answer
भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी कारक-भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी कारक निम्नलिखित हैं-
खनन-खनन के उपरान्त खदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है; वनों को काटा जाता है जिससे भूमि का अपकर्षण होता है।
अति पशुचारण- चरागाहों में पशुओं की निरन्तर चराई के कारण भूमि का ह्रास होता है। अत्यधिक सिंचाई- भूमि की अत्यधिक सिंचाई से जल भराव होता है। अत्यधिक सिंचाई के कारण उत्पन्न जलाक्रान्तता के फलस्वरूप भूमि की लवणता अथवा क्षारीयता बढ़ जाती है जिससे भूमि कृषि के अयोग्य हो जाती है।
खनिज प्रक्रियाएँ-सीमेण्ट उद्योग में चूना पत्थर को पीसना तथा मृदा उद्योग में खड़िया मृदा और सेलखड़ी के प्रयोग से बहुत अधिक मात्रा में वायुमण्डल में धूल विसर्जित होती है। जब इसकी परत भूमि पर जम जाती है तो मृदा की जल सोखने की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है। इससे भूमि का निम्नीकरण हो रहा है। औद्योगिक अपशिष्ट-विगत कुछ वर्षों से देश के विभिन्न भागों में औद्योगिक जल निकास से बाहर आने वाला अपशिष्ट पदार्थ भूमि और जल प्रदूषण का मुख्य स्रोत है।
भूमि निम्नीकरण को नियंत्रित करने के उपाय-
वनारोपण और चरागाहों का उचित प्रबंधन किया जाना।
पेड़ों की रक्षक मेखला, पशुचारण नियंत्रण और रेतीले टीलों को काँटेदार झाड़ियाँ लगाकर स्थिर बनाना।
बंजर भूमि का उचित प्रबंधन किया जाए।
औद्योगिक जल को परिष्करण के उपरान्त विसर्जित करके जल और भूमि प्रदूषण को कम करना।
खनन के क्रियाकलापों को नियंत्रित किया जाए।
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Question 55 Marks
लेटराइट मृदा किन क्षेत्रों में पाई जाती है? इनकी प्रमुख विशेषताएँ बतलाइए।
Answer
लेटराइट मृदा के क्षेत्र-लेटराइट मृदा अधिकतर दक्षिणी राज्यों, महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्रों ओडिशा, पश्चिम बंगाल के कुछ भागों तथा उत्तर-पूर्वी प्रदेशों में पाई जाती है।
लेटराइट मृदा की विशेषताएँ-
लेटराइट मृदा का निर्माण उष्णकटिबंधीय तथा उपोषण कटिबंधीय जलवायु क्षेत्रों में आर्द्र तथा शुष्क ऋतुओं के एक के बाद एक आने के कारण होता है।
यह भारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन (leaching) का परिणाम है।
लेटराइट मृदा अधिकतर गहरी तथा अम्लीय (pH < 6.0) होती है।
इसमें सामान्यतः पौधों के पोषक तत्वों की कमी होती है।
जहाँ इस मिट्टी में पर्णपाती और सदाबहार वन मिलते हैं, वहाँ इसमें ह्यूमस पर्याप्त रूप में पाया जाता है, लेकिन विरल वनस्पति और अर्ध शुष्क पर्यावरण में इसमें ह्यूमस की मात्रा कम पाई जाती है।
स्थलरूपों पर उनकी स्थिति के अनुसार उनमें अपरदन तथा भूमि-निम्नीकरण की संभावना होती है।
मृदा संरक्षण की उचित तकनीक अपना कर इन मृदाओं पर कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में चाय और कॉफी उगाई जाती हैं। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल की लाल लेटराइट मृदाएँ काजू की फसल के लिए अधिक उपयुक्त हैं।
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Question 65 Marks
भारत में पाई जाने वाली मृदाओं का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिये।
Answer
मदाओं का वर्गीकरण
भारत में अनेक प्रकार के उच्चावच, भू-आकृतियाँ, जलवायु और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप निम्नलिखित मृदाएँ पाई जाती हैं-
(1) जलोढ़ मृदा- यह देश की महत्त्वपूर्ण मृदा है जो कि विस्तृत रूप से फैली हुई है। सम्पूर्ण उत्तरी मैदान जलोढ़ मृदा से बना है। जलोढ़ मृदाएँ हिमालय के तीन महत्त्वपूर्ण नदी तंत्रों यथा-सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए जमावों से बनी हैं। एक संकरे गलियारे द्वारा ये मृदाएँ राजस्थान और गुजरात तक फैली हैं। पूर्वी तटीय मैदान, विशेषकर महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदियों के डेल्टे भी जलोढ़ मृदा से बने हैं। इसके दो प्रकार हैं(i) बांगर और (ii) खादर।
(2) काली मृदा- इन मृदाओं का काला रंग होता है तथा इनको 'रेगर' मृदाओं के नाम से भी जाना जाता है। काली मृदा कपास की खेती के लिए उत्तम होती है तथा इनको 'काली कपास मृदा' के नाम से भी जाना जाता है।
काली मृदाएँ महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार पर पाई जाती हैं तथा दक्षिणी-पूर्वी दिशा में गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटियों तक फैली हैं।
(3) लाल और पीली मृदा- लाल मृदा दक्कन के पठार के पूर्वी और दक्षिणी भागों में रवेदार आग्नेय चट्टानों पर कम वर्षा वाले भागों में विकसित हुई है। लाल और पीली मृदाएँ उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी छोर पर और पश्चिमी घाट में पहाड़ी पद पर पाई जाती हैं।
(4) लेटराइट- लेटराइट मृदा उच्च तापमान और अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है। यह भारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन का परिणाम है। इस मृदा में ह्यूमस की मात्रा कम पाई जाती है। लेटराइट मृदा पर अधिक मात्रा में खाद और रासायनिक उर्वरक का प्रयोग करके ही खेती की जा सकती है।
लेटराइट मृदाएँ मुख्य रूप से कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, उड़ीसा तथा असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
(5) मरुस्थली मृदा- मरुस्थली मृदाओं का रंग लाल और भूरा होता है। ये मृदाएँ आमतौर पर रेतीली और लवणीय होती हैं। कुछ क्षेत्रों में नमक की मात्रा इतनी अधिक होती है कि झीलों से जल वाष्पीकृत करके खाने का नमक भी बनाया जाता है। इस मृदा में ह्यूमस और नमी की मात्रा कम होती है।
(6) वन मृदा-इस प्रकार की मृदाएँ मुख्य रूप से उन पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं, जिन क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा-वन उपलब्ध हैं।
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Question 75 Marks
संसाधनों के नियोजन से आप क्या समझते हैं? संसाधनों के संरक्षण करने के उपाय सुझाइए।
Answer
संसाधन नियोजन का अर्थ- संसाधन नियोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जो संसाधनों के उपयोग, संरक्षण एवं संवर्धन हेतु अपनाई जाती है। अतः संसाधनों को लम्बे समय तक उपयोग करने, विनिष्टता से बचाने और प्रदूषण रहित रखने और उनके संवर्द्धन हेतु नीति एवं विधि निर्धारित करने की कला संसाधन नियोजन कहलाती है।
संसाधन संरक्षण के उपाय- किसी भी तरह के विकास में संसाधनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। परन्तु संसाधनों का अविवेकपूर्ण उपयोग तथा अति उपयोग के कारण कई सामाजिक-आर्थिक तथा पर्यावरणीय समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। इन समस्याओं से बचने के लिए विभिन्न स्तरों पर संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है। संसाधन संरक्षण के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं-
जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण किया जाये, जिससे संसाधनों पर बढ़ता दबाव कम किया जा सके।
संसाधन उपयोग की नवीन प्रौद्योगिकी का उपयोग हो किन्तु शोषणात्मक प्रवृत्ति न हो। अपशिष्टियों में कमी तथा प्रदूषण पर नियंत्रण किया जाये।
समन्वित पर्यावरण तंत्र प्रबंधन अपनाया जाये। आम लोगों की संसाधन उपयोग की प्रवृत्ति में परिवर्तन किया जाये।
शिक्षा का विकास, विस्तार एवं प्रचार किया जाये।
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Question 85 Marks
किसी क्षेत्र के विकास हेतु संसाधनों की उपलब्धता के साथ-साथ प्रौद्योगिकी विकास एवं संस्थागत परिवर्तन भी आवश्यक हैं। स्पष्ट कीजिये।
Answer
इसे निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) किसी क्षेत्र के विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता एक आवश्यक शर्त है परंतु प्रौद्योगिकी और संस्थाओं में तदनुरूपी परिवर्तनों के अभाव में मात्र संसाधनों की उपलब्धता से ही विकास संभव नहीं है।
(2) देश में बहुत से क्षेत्र हैं जो संसाधन समृद्ध होते हुए भी आर्थिक रूप से पिछड़े प्रदेशों की गिनती में आते हैं क्योंकि वहाँ प्रौद्योगिकी तथा तदनुरूप संस्थाओं का अभाव है। इसके विपरीत कुछ ऐसे प्रदेश भी हैं जो संसाधनों की कमी होते हुए भी उन्नत प्रौद्योगिकी विकास के कारण आर्थिक रूप से विकसित हैं।
(3) उपनिवेशन का इतिहास हमें बताता है कि उपनिवेशकारी देशों ने बेहतर प्रौद्योगिकी के सहारे उपनिवेशों के संसाधनों का शोषण किया तथा उन पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।
अतः संसाधन किसी प्रदेश के विकास में तभी योगदान दे सकते हैं, जब वहाँ उपयुक्त प्रौद्योगिकी विकास और संस्थागत परिवर्तन किए जाएँ। उपनिवेशन के विभिन्न चरणों में भारत ने भी इन सबका अनुभव किया है। अतः विकास सामान्यतः तथा संसाधन विकास लोगों के मुख्यतः संसाधनों की उपलब्धता पर ही आधारित नहीं होता बल्कि इसमें प्रौद्योगिकी, मानव संसाधन की गुणवत्ता और ऐतिहासिक अनुभव का भी योगदान रहता है।
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Question 95 Marks
संसाधन किसे कहते हैं? स्वामित्व के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण कीजिये।
Answer
संसाधन का अर्थ-पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो कि मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसको बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है एवं जो कि आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, संसाधन कहलाती है।
स्वामित्व के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण
स्वामित्व के आधार पर संसाधनों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जाता है-
(i) व्यक्तिगत संसाधन- वे संसाधन जो कि निजी व्यक्तियों के स्वामित्व में होते हैं, व्यक्तिगत संसाधन कहलाते हैं। गाँवों में अनेक लोग भूमि के स्वामी होते हैं। शहरों में भी लोग भूखंड, मकानों एवं अन्य जायदाद के स्वामी होते हैं । बाग, चरागाह, तालाब और कुओं का जल आदि संसाधनों के निजी स्वामित्व के कुछ उदाहरण हैं।
(ii) सामुदायिक स्वामित्व वाले संसाधन- वे संसाधन जो कि समुदाय के सभी सदस्यों को उपलब्ध होते हैं, सामुदायिक स्वामित्व वाले संसाधन होते हैं। गाँव में चारण भूमि, श्मशान भूमि, तालाब तथा नगरीय क्षेत्रों में सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल और खेल के मैदान, सामुदायिक स्वामित्व वाले संसाधन हैं।
(iii) राष्ट्रीय संसाधन- तकनीकी रूप से देश में पाए जाने वाले समस्त संसाधन राष्ट्रीय संसाधन हैं। देश की सरकार को कानूनी अधिकार होता है कि वह व्यक्तिगत संसाधनों को भी आम जनता के हित में अधिग्रहित कर सकती है। इसीलिए सड़कें, नहरें और रेल लाइनें व्यक्तिगत स्वामित्व वाले खेतों में भी बनी हुई होती हैं।
(iv) अन्तर्राष्ट्रीय संसाधन- कुछ अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ संसाधनों को नियंत्रित करती हैं। तट रेखा से 200 समुद्री मील की दूरी से परे खुले महासागरीय संसाधनों पर किसी देश का अधिकार नहीं है। इन संसाधनों को अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति के बिना उपयोग नहीं किया जा सकता है। ये अन्तर्राष्ट्रीय संसाधन होते हैं।
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