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Question 15 Marks
वन एवं वन्य जीवों के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए तथा प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन के संरक्षण को स्पष्ट कीजिए। 
Answer
वन एवं वन्य जीवों का महत्त्व-वन तथा वन्य जीवों के महत्त्व को निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है- 1.वन तथा वन्य जीव पारितंत्र के सन्तुलन को बनाए रखने में मदद करते हैं।
वन में वन्य जीवों को आश्रय मिलता है। वनों से हमें इमारती लकड़ी, फल, रबर, कागज, गोंद आदि उत्पाद प्राप्त होते हैं।
वनों से उद्योगों हेतु कई प्रकार का कच्चा माल प्राप्त होता है।
वन मृदा अपरदन को रोकने में मदद करते हैं।
वन वर्षा को आकर्षित करते हैं जिससे भूमिगत जल का स्तर बना रहता है।
वनों से हमें कई प्रकार की औषधियाँ मिलती हैं।
वन्य जीवों से हमें मांस, खाल, ऊन आदि उत्पाद प्राप्त होते हैं।
2.प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवों का संरक्षण-जनसंख्या की बढ़ती मांग से प्राकृतिक वनस्पति तथा वन्य जीवों पर संकट उत्पन्न हो गया है अतः प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवों के संरक्षण हेतु अनेक उपाय किए गए हैं, जो निम्न प्रकार हैं-
प्राकृतिक वनस्पति तथा वन्य जीवों के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य जीव अभयारण्यों की स्थापना की गई है।
वन्यजीवों के शिकार पर प्रतिबन्ध लगाया गया है।
वनों में मानवीय गतिविधियों पर नियन्त्रण लगाने के प्रयास किए गए हैं।
प्रादेशिक और सामुदायिक स्तर पर वन एवं वन्य जीवों के प्रति जागरूकता हेतु अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
वन्य वनस्पति तथा वन्य जीवों की सुरक्षा हेतु अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की स्थापना की गई है।
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Question 25 Marks
प्राकृतिक वनस्पति के वितरण का वर्णन कीजिये।
Answer
विश्व में प्राकृतिक वनस्पति का वितरण तापमान और आर्द्रता पर निर्भर करता है। इन्हीं कारकों पर वनस्पति की वृद्धि निर्भर करती है। इस आधार पर विश्व की वनस्पति के मुख्य प्रकारों को निम्न चार वर्गों में रखा जा सकता है-
वन-भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में विशाल वृक्ष उग सकते हैं। इस प्रकार वन प्रचुर जल आपूर्ति वाले क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। जैसे-जैसे आर्द्रता कम होती है वैसे-वैसे वृक्षों का आकार और उनकी सघनता कम हो जाती है।
घास स्थल-सामान्य वर्षा वाले क्षेत्रों में छोटे आकार वाले वृक्ष और घास उगती है जिससे विश्व के घास स्थलों का निर्माण होता है।
गुल्म-कम वर्षा वाले शुष्क प्रदेशों में कँटीली झाड़ियाँ एवं गुल्म उगते हैं। इस प्रकार के क्षेत्रों में पौधों की जड़ें गहरी होती हैं। वाष्पोत्सर्जन से होने वाली आर्द्रता की हानि को घटाने के लिए इन पेड़ों की पत्तियाँ काँटेदार और मोमी सतह वाली होती हैं।
टुंड्रा वनस्पति-यह शीत ध्रुवीय प्रदेशों में पाई जाती है। टुंड्रा वनस्पति में मॉस और लाइकेन सम्मिलित हैं।
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Question 35 Marks
जल उपलब्धता की समस्या को स्पष्ट करते हुए जल संसाधनों के संरक्षण के उपायों को स्पष्ट कीजिए। 
Answer
जल उपलब्धता की समस्या-जल एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है तथा पृथ्वी के लगभग तीन-चौथाई भाग पर जल उपलब्ध है किन्तु इसमें से अधिकांश जल लवणीय है, जो मनुष्य के उपयोग में नहीं आता। पृथ्वी पर केवल 2.7 प्रतिशत जल ही अलवणीय है जिसमें से भी लगभग 70 प्रतिशत भाग बर्फ की चादरों तथा हिमानियों के रूप में अंटार्कटिका, ग्रीनलैण्ड और पर्वतीय प्रदेशों में पाया जाता है अतः मनुष्य के लिए मात्र एक प्रतिशत अलवणीय जल ही उपलब्ध हो पाता है। किन्तु अत्यधिक उपयोग एवं जल प्रदूषकों के कारण कई देशों में जल का संकट उत्पन्न हो गया है। जल स्रोतों के सूखने अथवा जल प्रदूषण के कारण अलवणीय जल की आपूर्ति की कमी के मुख्य कारक बढ़ती जनसंख्या, भोजन एवं नकदी फसलों की बढ़ती मांग, बढ़ता नगरीकरण और बेहतर होता जीवनस्तर है। आज विश्व के अनेक देश जल संकट से गुजर रहे हैं। जल संसाधनों का संरक्षण-वर्तमान में विश्व में शुद्ध एवं पर्याप्त जल स्त्रोतों की उपलब्धता बड़ा संकट बनता जा रहा है। अतः जल संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है। जल संसाधनों के संरक्षण हेतु निम्न उपाय किए जा सकते हैं-
अशोधित या आंशिक रूप से शोधित वाहित मल, कृषि रसायनों का विसर्जन और जल निकायों में औद्योगिक बहिःस्राव जल के प्रमुख प्रदूषक हैं। इनसे शुद्ध जल का बचाव करना चाहिए।
प्रदूषित जल को विभिन्न विधियों द्वारा शोधित कर पुनः प्रयोग में लेना चाहिए।
वन और अन्य वनस्पति आवरण धरातलीय प्रवाह को मंद करते हैं तथा वर्षा को भी आकर्षित करते हैं अतः वनों का विस्तार किया जाना चाहिए।
जल रिसाव को कम करने के लिए खेतों को सिंचित करने वाली नहरों को ठीक से पक्का करना चाहिए।
रिसाव और वाष्पीकरण से होने वाली जल क्षति को रोकने हेतु स्प्रिंकलरों से खेतों की सिंचाई करनी चाहिए।
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Question 45 Marks
मृदा से आप क्या समझते हैं? मृदा के निम्नीकरण को रोकने तथा संरक्षण के उपायों को स्पष्ट कीजिए। 
Answer
मृदा-पृथ्वी के धरातल पर दानेदार कणों के आवरण की पतली परत मृदा कहलाती है। मृदा का प्रकार स्थल स्वरूप द्वारा निर्धारित होता है तथा मृदा का निर्माण चट्टानों से प्राप्त खनिजों एवं जैव पदार्थ तथा भूमि पर पाए जाने वाले खनिजों से होता है। अपक्षय की प्रक्रिया द्वारा मृदा का निर्माण होता है। मृदा निम्नीकरण रोकने तथा संरक्षण के उपाय-मानवीय तथा प्राकृतिक दोनों कारणों से मृदा का निम्नीकरण हो रहा हैं। मृदा के निम्नीकरण हेतु जिम्मेदार कारकों में वनोन्मूलन, अतिचारण, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, वर्षादोहन, भूस्खलन, बाढ़ आदि प्रमुख हैं। मृदा संरक्षण की प्रमुख विधियाँ निम्न प्रकार हैं-
मल्च बनाना-इस विधि के अन्तर्गत पौधों के बीच अनावरित भूमि जैव पदार्थ जैसे प्रवाल से ढक दी जाती है। इस विधि से मृदा की आर्द्रता रुकी रहती है।
वेदिका फार्म-इस विधि में चौड़े, समतल सोपान अथवा वेदिका तीव्र ढालों पर बनाए जाते हैं ताकि सपाट सतह फसल उगाने के लिए उपलब्ध हो जाए। इनसे पृष्ठीय प्रवाह और मृदा अपरदन कम होता है।
समोच्चरेखीय जुताई-मृदा अपरदन रोकने की इस विधि में एक पहाड़ी ढाल पर समोच्च रेखाओं के समान्तर जुताई ढाल से नीचे बहते जल के लिए एक प्राकृतिक अवरोध का निर्माण करती है।
रक्षक मेखलाएँ-मृदा संरक्षण की इस विधि में तटीय प्रदेशों और शुष्क प्रदेशों में पवन गति रोकने के लिए वृक्ष कतारों में लगाए जाते हैं ताकि मृदा आवरण को बचाया जा सके। समोच्चरेखीय रोधिकाएँ-समोच्च रेखाओं पर रोधिकाएँ बनाने के लिए पत्थरों, घास, मृदा का उपयोग किया जाता है। रोधिकाओं के सामने जल एकत्र करने के लिए खाइयाँ बनाई जाती हैं।
चट्टान बाँध-यह जल के प्रवाह को कम करने में मदद करते हैं। यह नालियों की रक्षा करते हैं तथा मृदा की क्षति को रोकते हैं।
बीच की फसल उगाना-इस विधि के अन्तर्गत वर्षा दोहन से मृदा को सुरक्षित रखने के लिए अलग-अलग समय पर भिन्न-भिन्न फसलें एकांतर कतारों में उगाई जाती हैं।
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Question 55 Marks
प्राकृतिक संसाधन के रूप में भूमि के उपयोग को स्पष्ट कीजिए। भूमि के संरक्षण की आवश्यकता एवं तरीकों को स्पष्ट कीजिए।
Answer
भूमि का उपयोग-भूमि एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। विश्व के कुल भूपृष्ठ के कुल क्षेत्रफल के लगभग 30 प्रतिशत भाग पर भूमि है। भूमि का उपयोग विभिन्न कार्यों में किया जाता है; जैसे-कृषि करना, वानिकी, आवास निर्माण, सड़क निर्माण, खनन, उद्योगों की स्थापना आदि। भूमि का उपयोग मुख्य रूप से स्थलाकृति, मृदा, जलवायु, खनिज, जल उपलब्धता, जनसंख्या, प्रौद्योगिकी आदि तत्त्वों पर निर्भर करता है। विश्व में भूमि का उपयोग निजी भूमि एवं सामुदायिक भूमि दोनों के रूप में किया जाता है।  भूमि के संरक्षण की आवश्यकता-भूमि की उपलब्धता सीमित है, इसे बढ़ाया नहीं जा सकता है। जबकि विश्व की जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। इस कारण लोग आवास एवं कृषि हेतु वनों को नष्ट करते जा रहे हैं जिससे पारितंत्र में असन्तुलन उत्पन्न हो रहा है। नगरीकरण एवं बढ़ते उद्योगों के कारण सामुदायिक भूमि पर अनधिकृत हस्तक्षेप निरन्तर बढ़ता जा रहा है। वर्तमान में कृर्षि और निर्माण सम्बन्धी गतिविधियों के प्रसार के कारण निम्नीकरण, भूस्खलन, मृदा अपरदन, मरुस्थलीकरण पर्यावरण के लिए खतरा बन गए हैं। इन सभी कारणों से भूमि का संरक्षण आवश्यक है।
भूमि संरक्षण के तरीके-बढ़ती जनसंख्या एवं बढ़ती भूमि के कारण विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों के विनाश का खतरा उत्पन्न हो गया है, अतः इसे रोकना आवश्यक है। वनरोपण, भूमि उद्धार, रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के विनियमित उपयोग तथा अतिचारण पर रोक आदि भूमि संरक्षण के लिए अपनाए जाने वाले सामान्य तरीके हैं।
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