विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंध के सतर्क पंध हों सभी।
तभी समर्थ भाव हे कि तारता हुआ तरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
(i) अभीष्ट-मार्ग से क्या तात्पर्य है?
(क) परंपरागत मार्ग
(ख) दूसरों द्वारा बताया गया मार्ग
(ग) योग्यता के अनुसार मार्ग
(घ) इचित मार्ग
(ii) विघ्न-बाधाएँ आने पर क्या करना चाहिए?
(क) डर जाना चाहिए
(ख) डटकर मुकाबला करना चाहिए
(ग) पीछे हंट जाना चाहिए
(घ) सहर्ष मार्ग बदल लेना चाहिए
(iii) समर्थ भाव क्या है?
(क) दूसरों की निंदा कर स्वयं की प्रशंसा करना
(ख) दूसरों को हराकर जीत प्राप्त करना
(ग) दूसरों को सफलता दिलाकर स्वयं सफलता प्राप्त करना
(घ) दूसरों को धमकाकर समथ बनना
(iv) कवि परस्पर मेल-जोल बढ़ाने का परामर्श क्यों दे रहा है?
(क) एक ही स्थान पर रहने के लिए
(ख) प्रेम से रहने के लिए
(ग) सभी विकल्प सही हैं
(घ) भेद-भाव न बढ़ने देने के लिए
(v) 'तारता हुआ तरे - पंक्ति का क्या आशय है ?
(क) स्वयं तेरते हुए दूसरे को तेराना
(ख) दूसरों की उन्नति में सहायक होते हुए अपनी उन्नति करना
(ग) विपत्ति में घबराना
(घ) दूसरों की अवनति करते हुए स्वयं की उन्नति करना