Question 15 Marks
| स्तंभ 1 | स्तंभ 2 |
| 1. रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय । टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय ।। |
A. सज्जन परहित के लिए ही संपत्ति संचित करते हैं। |
| 2. कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत । बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत।। |
B. सच्चे मित्र विपत्ति या विपदा में भी साथ रहते हैं। |
| 3. तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान। कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।। |
C. प्रेम या रिश्तों को सहेजकर रखना चाहिए। |
Answer
View full question & answer→(1. → C) (2. → B) (3. → A)