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प्रश्नों के उत्तर सविस्तार लिखिए : ( 4 गुण )

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Question 14 Marks
हैरो का मुख्य कार्य एवं इसके प्रकार के बारे में चर्चा करें ।
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स्वप्रयत्न
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Question 24 Marks
कृषि में काम आने वाले यंत्रों का वर्गीकरण करें ।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 34 Marks
कृषि यंत्रीकरण के लाभ एवं हानियों के बारे में लिखे ।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 44 Marks
बैल चलित यंत्रों का वर्णन करें ।
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स्वप्रयत्न
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Question 54 Marks
थ्रेसर की कार्य प्रणाली का सचित्र वर्णन करें ।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 64 Marks
कम्बाइन क्या है? इसके प्रकार, लाभ तथा हानियों के बारेमें विस्तार से लिखिए ।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 74 Marks
डिस्क हल एवं डिस्क हैरो में क्या अन्तर होता है? लिखिए ।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 84 Marks
कम्बाइन की प्रमुख इकाइयों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
Answer
कम्बाइन की प्रमुख इकाइयाँ (Main Units of Combine) अथवा कम्बाइन की बनावट (Structure of Combine)
कम्बाइन एक ऐसी मशीन है जो गेहूँ और धान की खड़ी फसल की कटाई, मड़ाई और सफाई तीनों कार्य एक साथ करती है। इसके लिए इसमें अनेक इकाइयाँ लगी होती हैं। कम्बाइन की प्रमुख इकाइयों का वर्णन निम्न प्रकार है-
(1) कटाई इकाई (Cutting Unit) - यह इसकी प्रथम इकाई है। यह मोअर के सिद्धान्त पर कार्य करती है जिसमें कटाई दण्ड (मुख्यतः लम्बाई 1 से 7 मीटर) के ऊपर रील (इसका व्यास 50 सेमी.) लगी होती है जिसका कार्य चालू स्थिति में फसल को कटाई दण्ड के ऊपर लाना होता है ताकि फसल सुगमता से काटी जा सके।
(2) भरण तथा उत्थापन इकाई (Feeding and Elevating Unit) - कटी हुई फसल एक बेदी पर गिरती है जो या तो किरमिच की बनी होती है या ऑगर होता है। इस इकाई का कार्य कटी फसल को गहाई इकाई में पहुँचाना है।
(3) गहाई इकाई (Threshing Unit) - इस इकाई के दो भाग होते हैं जिन्हें बेलन (खूंटीदार या रेतीदार) और अवतल पृष्ठ कहते हैं। बेलन द्वारा दाने डंठल तथा बालियों से अलग हो जाते हैं। बेलन व अवतल पृष्ठ की दूरी घटाई-बढ़ाई जा सकती है जो फलानुसार तथा उसकी नमी की मात्रा पर निर्भर करती है।
(4) पृथक्कारी इकाई (Seperating Unit) - पृथक्कारी इकाई द्वारा भूसे से दाने अलग करने का कार्य किया जाता है। गहाई के बाद दाने भूसे से भारी होने के कारण गिर जाते हैं। कुछ दाने जो भूसे के साथ उलझे होते हैं एक हिस्से पर पहुँचते हैं जिनको स्ट्राटेक या स्ट्रावाकर कहते हैं। जब भूसा मिश्रित दाना स्ट्राटेक पर आता है तो दाने स्ट्राटेक की प्रत्यागामी गति के साथ भूसे से अलग होकर स्ट्राटेक के छिद्रों से नीचे गिर जाते हैं। स्ट्रावर की चाल भी निश्चित (इष्टतम) होनी चाहिए। यदि स्ट्रावर की चाल इष्टतम चाल से अधिक होती है तो दाने भूसे के साथ खेते में गिर जाते हैं। यदि उसकी चाल इष्टतम स्तर से कम होती है तो दाने भूसे से अलग नहीं हो पाते तथा भूसे के साथ खेते में गिर जाते हैं।
(5) सफाई इकाई (Cleaning Unit) - यह इकाई सफाई का कार्य करती है। भूसे से अलग होने पर दाने एक चलनी में जाते हैं। चलनी छिद्रों का आकार फसलानुसार बदल दिया जाता है। अभी तक दानों के साथ भूसे के डंठल व खरपतवार के बीज साथ रहते हैं। चलनी के बाद पंखे की हवा से विजातीय बीज उड़कर बाहर निकलने लगते हैं तथा शुद्ध दाने छलनी से छनकर एलीवेटर (उत्थापक) के द्वारा बोरे में भरने के लिए टंकियों में भेज दिया जाता है।
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Question 94 Marks
प्लान्टर किस काम आता है ? इसका सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer
प्लान्टर (पौध रोपण यंत्र) (Planter)
वर्तमान में प्लान्टर भी एक प्रमुख कृषि यंत्र है। नर्सरी में तैयार पौधे (धान, गन्ना, सब्जियों आदि) तथा कंद वर्गीय फसलों (आलू, शकरकंद आदि) का एक समान दूरी व गहराई पर रोपण का कार्य आजकल दक्षता से कम लागत में प्लान्टर (Planter) से किया जा रहा है।

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फसलों की आवश्यकतानुसार अलग-अलग प्लान्टर प्रचलित हैं, जैसे-
(i) आलू बोने की मशीन (Potato Planter)
(ii) गन्ने बोने की मशीन (Sugarcane Planter)
(iii) धान बोने की मशीन (Rice Planter)
(iv) सब्जी बोने की मशीन (Vegetable Planter)
प्लान्टर के प्रकार तथा कार्यविधि-प्लान्टर मुख्यतः निम्न तीन प्रकार के होते हैं-
(1) ऑटोमेटिक (Automatic)प्लान्टर - इस प्लान्टर में एक पिकिंग व्हील होती है जिसमें 3-12 तक पिकर आर्म (भुजाएँ) होती हैं। पिकर आर्म्स पिकर हेड द्वारा पिकिंग कक्ष (बीज बॉक्स-हॉपर) से जुड़ी रहती हैं। प्रत्येक पिकर हेड में तेज नुकीले पिकर बिन्दु लगे होते हैं जो पौध/बीज का एक-एक टुकड़ा उठा लेते हैं। जब पिकर आर्म इसके नीचे आती है तब इसे छोड़ देता है जो स्पाउट में गिरता है जिसके द्वारा यह कुंड में पहुँचता है। पिकर व्हील के चक्करों की संख्या को बदलकर बीज से बीज की दूरी को घटा-बढ़ा सकते हैं। पिकिंग कक्ष में बीज/पौध की मात्रा का बहाव स्वतः नियंत्रित होता है।
(2) उच्च गति ऑटोमेटिक (High Speed Automatic) प्लान्टर - इस प्लान्टर में दो पिकर व्हील होती हैं। प्रत्येक में आठ-आठ पिकर भुजाएँ होती हैं। उच्च गति की बुआई साधारण गति की दुगुनी गति पर चलती है परन्तु पिकर आर्म्स (भुजाएँ) ऑटोमेटिक मशीन से तेज नहीं चलती हैं।
(3) अर्द्ध ऑटोमेटिक (Semi Automatic) प्लान्टर - इसकी बीज गिरने की प्रणाली उपरोक्त दोनों प्लान्टरों से अलग है। इसमें बीज/पौध एलीवेटर (उत्थापक) व्हील से फीड स्पाउट से घूमती हुई क्षैतिज फीडरिंग में गिरती है। जहाँ से कुंड में गिरता/रोपित होता रहता है। प्लान्टर पर बैठे आदमी की जिम्मेदारी है कि यह पॉकेट में पौध बीज रखता रहे जिससे रोपण चलता रहे।
आजकल आलू के प्लान्टर के साथ पौध का रोपण भी खेत में मशीनों से किया जाता है जिन्हें ट्रांसप्लान्टर कहते हैं। इसको धान व गन्ना जैसी धान्य फसलों के साथ सब्जी वर्गीय फसलों के खेत में पौध रोपण में काम में लेते हैं।
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Question 104 Marks
कल्टीवेटर का सचित्र वर्णन कीजिये।
Answer
कल्टीवेटर (Cultivator)
कल्टीवेटर भी एक प्रमुख कृषि यंत्र है। यह मुख्यतः द्वितीय भूपरिष्करण यंत्र है। यह पशुशक्ति व ट्रेक्टर से चालित होता है। कल्टीवेटर लाइन में बोई गई फसलों में निराई-गुड़ाई व आलू जैसी फसल की खुदाई में प्रयुक्त किया जाता है। भारतवर्ष में प्रयोग होने वाले कल्टीवेटर में कार्मिक कानपुर, शाबास, वाह-वाह, आर.एस. आदि प्रकार के साथ ट्रेक्टर चालित कल्टीवेटर प्रचलन में हैं।
उपयोग - इस यंत्र के प्रयोग का मुख्य उद्देश्य खरपतवार का नियंत्रण करना है, जिससे वे पोषक तत्त्वों के लिए फसल संघर्ष न करें। सतह का वाष्पीकरण रोकना, वर्षा जल का भूमि में रिसाव बढ़ाना, उचित वायु प्रवेश की सुविधा तथा फसल के विकास के समय मिट्टी को अच्छी टिल्थ में रखना इसके अन्य उद्देश्य हैं।
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इस यंत्र के निम्नलिखित भाग हैं-
(1) हत्था (Handle) - यह लकड़ी या माइल्ड स्टील का बना होता है जिनकी संख्या एक या दो होती है जिन्हें पकड़ कर खेत में इसे चलाया जाता है।
(2) ढाँचा (Frame) - यह भाग स्टील से निर्मित होता है जिस पर सारे भाग जुड़े रहते हैं।
(3) लीवर (Liver) - यह लीवर फ्रेम रैचेट के साथ जुड़ा रहता है। इससे फालों के बीच की दूरी को घटाया-बढ़ाया जा सकता है। यह कमानीदार इस्पात का बना होता है।
(4) खुरपे/फाल (Shavels) - ये उच्च कार्बन स्टील के बने होते हैं जो फ्रेम से जुड़े होते हैं। इनकी संख्या 5-7 होती है। बनावट के अनुसार दोनों तरफ से उपयोग में लाये जाते हैं। ये एक तरफ की धार समाप्त होने पर इन्हें दूसरी तरफ से काम में लिया जा सकता है। इन फालों की चौड़ाई 3-4 इंच व लम्बाई 8-10 इंच तक होती है। 
(5) गेज व्हील (Gauge Wheel) - कल्टीवेटर का अग्रस्थ भाग गहराई नियंत्रण पहिया जो कास्ट आयरन का बना होता है।
(6) शैन्क (Shank) - यह गोलाकार होता है और ऊपरी तरफ फ्रेम से तथा नीचे की तरफ खुरपे से जुड़ा रहता है। सभी खुरपे (फाल) इसी में बोल्ट शैन्क से कसे रहते हैं इनकी संख्या फाल की संख्या के समान होती है।
(7) हरीस (Beam) - यह भाग लकड़ी या लोहे का बना होता है। जहाँ लोहे से बना होगा वहीं पर हुक लगा होता है इसी की सहायता से इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने व ले जाने में सुविधा रहती है।
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Question 114 Marks
मोल्ड बोर्ड हल का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer
मोल्ड बोर्ड हल (Mould board plough)
यह प्राथमिक भू-परिष्करण यंत्र है। यह हल हर प्रकार की मिट्टी में अच्छी तरह प्रयोग में लाया जाता है। यह मिट्टी को पलटता है जिससे खरपतवार आदि नीचे दबकर खाद बन जाते हैं। 
मुख्य भाग - इस हल के निम्नांकित तीन मुख्य भाग होते हैं-
(1) हल तल (plough bottom)) (2) हरीस (beam) तथा (3) हत्था (handle) । 
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इनका वर्णन निम्न प्रकार है-
(1) हल तल (Plough Bottom) - इसके चार भाग होते हैं-(i) फार - इसका कार्य मिट्टी को काटना है तथा इसे ढलवां लोहे या इस्पात से बनाया जाता है जो कि 12 इंच तक जुताई करती है। (ii) मोल्ड बोर्ड - इसका कार्य काटी गई मिट्टी को भुरभुरी बनाना है। (iii) लैड साइड - यह भाग कूँड की दीवार के विरुद्ध हल तल को सहारा देता है। (iv) आधार (frog) - इस भाग में फाल मोल्ड बोर्ड तथा लैड साइड जुड़ती हैं। पूर्ण स्थिरता, मजबूती तथा हल की पर्याप्त दक्षता के लिए इसमें कई छेद होते हैं।
(2) हसल या हरीस (Beam) - इसका एक सिरा हल तल से तथा दूसरा सिरा आगे की ओर रहता है। इस भाग की लम्बाई कम (भारी हलों की) या ज्यादा (हल्के हलों की) हो सकती है।
(3) हत्था (Handle) - हल को नियंत्रित करने के लिए क्लोविस (clovice) से जुड़ा होता है। लम्बे हरीस वाले हलों में एक ही हत्था तथा छोटे हरीस वाले हलों में दो हत्थे होते हैं। ये लकड़ी या इस्पात के बने होते हैं।
इस हल में कूँड की गहराई को बढ़ाने हेतु फाल की नोक को लैड साइड एड़ी की अपेक्षा नीचे की तरफ 5 से 8 मिलीमीटर तथा झुकी हुई रखते हैं। इस झुकाव को खड़ा झुकाव (vertical suction) कहते हैं। इसी तरह कुंड की चौड़ाई को बढ़ाने हेतु फार की नोक को लैड साइड की एड़ी की अपेक्षा, जमीन के समानान्तर 3 से 5 मिलीमीटर बाहर को रखा जाता है। इसे क्षैतिज झुकाव (horizontal suction) कहते हैं।
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Question 124 Marks
कृषि यंत्रीकरण से क्या आशय है ? भारत में कृषि यंत्रीकरण की उन्नति एवं भावी सम्भावनाओं का वर्णन कीजिए।
Answer
कृषि यंत्रीकरण - सभी कृषि कार्य मनुष्य या पशु के स्थान पर यदि मशीन से किया जाये तो उसे कृषि यंत्रीकरण कहते हैं। यह मुख्यतः दो प्रकार का होता है-(1) पूर्ण (सम्पूर्ण कार्य मशीनों से किये जायें) व (2) आंशिक (कुछ मशीनों के द्वारा और कुछ पशुओं के द्वारा) यंत्रीकरण।
भारत में कृषि यंत्रीकरण की उन्नति - भारत में कृषि में यंत्रीकरण विभिन्न क्रियाकलापों को पूरा करने के लिए वर्ष दर वर्ष बढ़ रहा है। सर्वेक्षण से पता चलता है कि 2 टन प्रति हैक्टेयर उपज के लिए 1 अश्व शक्ति की दर से शक्ति की आवश्यकता पड़ती है जिसे आधुनिक ट्रेक्टर, डिस्क हल, पम्पिंग सेट, रिपर, कम्बाइन और पावर टिलर का निर्माण कर पूरा किया जा रहा है। पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में कृषि यंत्रीकरण की उन्नति अधिक हुई है।
भारत में कृषि यंत्रीकरण की भावी सम्भावनाएँ - आज के परिप्रेक्ष्य में कृषि यंत्रीकरण की हमारे देश में आवश्यकता बढ़ती जा रही है, क्योंकि अन्य उद्योगों की तुलना में आज कृषि कार्यों के लिए मानव श्रम (मजदूर) की उपलब्धता कम है तथा कृषि कार्यों को समय पर सम्पादित करने में कठिनाई आने से फसल उत्पादन लागत बढ़ रही है। कृषि बिना यंत्रीकरण कम लाभ का साधन होता जा रहा है तथा परम्परागत कृषि मजदूर गाँव को छोड़कर शहर की ओर पलायन कर रहा है। मजदूरों की इस कमी को कृषि यंत्रों के प्रयोग से निश्चित समय में पूरा करना सम्भव है।
अतः भारत में कृषि यंत्रीकरण की काफी प्रबल सम्भावनायें हैं परन्तु इसके लिए निम्न कारकों को ध्यान में रखना होगा, जैसे-बड़े-बड़े यंत्रों के निर्माण से ज्यादा ध्यान देशी यंत्रों को ही सुधार कर उन विशेष परिस्थितियों और जलवायु अनुकूल बनाने से कार्यक्षमता बढ़ेगी तथा किसान लाभान्वित होंगे। किसानों को भी सहकारी खेती को अपनाने की जरूरत है जिससे किसानों के व्यक्तिगत खर्च में कमी रहेगी। सरकार के प्रयास सस्ती दरों पर ऋण की व्यवस्था करना, तकनीकी ज्ञान हेतु कृषक प्रशिक्षण व्यवस्था, यंत्र विकास के लिए अनुसंधान केन्द्रों की स्थापना तथा प्रदर्शनियों का आयोजन करते रहना चाहिए, जिससे भारत में कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा मिलेगा।
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