कल्टीवेटर (Cultivator)कल्टीवेटर भी एक प्रमुख कृषि यंत्र है। यह मुख्यतः द्वितीय भूपरिष्करण यंत्र है। यह पशुशक्ति व ट्रेक्टर से चालित होता है। कल्टीवेटर लाइन में बोई गई फसलों में निराई-गुड़ाई व आलू जैसी फसल की खुदाई में प्रयुक्त किया जाता है। भारतवर्ष में प्रयोग होने वाले कल्टीवेटर में कार्मिक कानपुर, शाबास, वाह-वाह, आर.एस. आदि प्रकार के साथ ट्रेक्टर चालित कल्टीवेटर प्रचलन में हैं।
उपयोग - इस यंत्र के प्रयोग का मुख्य उद्देश्य खरपतवार का नियंत्रण करना है, जिससे वे पोषक तत्त्वों के लिए फसल संघर्ष न करें। सतह का वाष्पीकरण रोकना, वर्षा जल का भूमि में रिसाव बढ़ाना, उचित वायु प्रवेश की सुविधा तथा फसल के विकास के समय मिट्टी को अच्छी टिल्थ में रखना इसके अन्य उद्देश्य हैं।

इस यंत्र के निम्नलिखित भाग हैं-
(1) हत्था (Handle)
- यह लकड़ी या माइल्ड स्टील का बना होता है जिनकी संख्या एक या दो होती है जिन्हें पकड़ कर खेत में इसे चलाया जाता है।
(2) ढाँचा (Frame)
- यह भाग स्टील से निर्मित होता है जिस पर सारे भाग जुड़े रहते हैं।
(3) लीवर (Liver)
- यह लीवर फ्रेम रैचेट के साथ जुड़ा रहता है। इससे फालों के बीच की दूरी को घटाया-बढ़ाया जा सकता है। यह कमानीदार इस्पात का बना होता है।
(4) खुरपे/फाल (Shavels)
- ये उच्च कार्बन स्टील के बने होते हैं जो फ्रेम से जुड़े होते हैं। इनकी संख्या 5-7 होती है। बनावट के अनुसार दोनों तरफ से उपयोग में लाये जाते हैं। ये एक तरफ की धार समाप्त होने पर इन्हें दूसरी तरफ से काम में लिया जा सकता है। इन फालों की चौड़ाई 3-4 इंच व लम्बाई 8-10 इंच तक होती है।
(5) गेज व्हील (Gauge Wheel)
- कल्टीवेटर का अग्रस्थ भाग गहराई नियंत्रण पहिया जो कास्ट आयरन का बना होता है।
(6) शैन्क (Shank)
- यह गोलाकार होता है और ऊपरी तरफ फ्रेम से तथा नीचे की तरफ खुरपे से जुड़ा रहता है। सभी खुरपे (फाल) इसी में बोल्ट शैन्क से कसे रहते हैं इनकी संख्या फाल की संख्या के समान होती है।
(7) हरीस (Beam)
- यह भाग लकड़ी या लोहे का बना होता है। जहाँ लोहे से बना होगा वहीं पर हुक लगा होता है इसी की सहायता से इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने व ले जाने में सुविधा रहती है।