Questions

प्रश्नों के उत्तर सविस्तार लिखिए : ( 4 गुण )

Take a timed test

8 questions · self-marked practice — reveal the answer and mark yourself.

Question 14 Marks
निम्न बीमारियों का कारण, लक्षण एवं उपचार लिखिए।
1) आफरा,
2) खुजली,
3) अतिसार,
4) कब्ज
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 24 Marks
जूँ एवं किलनी का पशुओं में होने वाले प्रकोप एवं नियन्त्रण का वर्णन कीजिए।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 34 Marks
निम्न पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए-
(1) फीताकृमि
(2) ऐस्केरिस ।
Answer
(1) फीताकृमि (Tape worm)-फीताकृमि पर्ण के समान चपटे होते हैं। परन्तु खण्डीय व फीते के समान विभिन्न लम्बाई के होते हैं। इनकी जनन क्रिया उभयलिंगी है तथा नर व मादा के जनन अंग प्रत्येक खंड में होते हैं। प्रत्येक फीता कृमि के आरम्भ में एक सिर होता है जिसे स्कोलेक्स कहते हैं। यह अंग लगभग गोल होता है। साधारणतया इस पर चार चूषण होते हैं या इनका कई प्रकार का रूपान्तर होता है। कुछ फीताकृमि के चूषण पर काटे लगे रहते हैं। स्कोलेक्स का आगे का कुछ भाग निकला रहता है जिसे रोस्टलेम कहते हैं। स्कोलेक्स के पीछे एक छोटा सा अखंडीय भाग होता है जिसे गर्दन कहते हैं जिसके पीछे खंड आरम्भ हो जाते हैं जो पहले अपरिपक्व अवस्था में फिर परिपक्व अवस्था में होते हैं। पीछे के कुछ खंडों में पाचन क्रिया के बाद बने अण्डे होते हैं। ये खण्ड टूट-टूट कर मल के साथ बाहर आ जाते हैं। अण्डों को संक्रामक अवस्था में पहुँचाने के लिए साधारणतया मध्यस्थ पोषक की आवश्यकता पड़ती है। अतः विभिन्न वंशों के फीताकृमियों की लारवा अवस्था स्पष्ट रूप से भिन्न होती है जो अनेक प्रकार के मध्यस्थ पोषक में पनपती है।
उपचार-कृमि नाशक औषधियों का प्रयोग करना चाहिए। अलवैण्डाजोल संस्पैशन भैंस, बैल व घोड़े के लिए 20 मि.ली. प्रति 100 किलो शरीर भार तथा भेड़, बकरी के लिए 5 मि.ली. प्रति 25 किलो शरीर भार पर, इसके अलावा सैस्टोफीन, आदि भी दे सकते हैं।
(2) ऐस्केरिस (Ascaris)- भारत में यह प्रमुख रूप से पाया जाता है। इस परजीवी का प्रकोप गर्मियों में 3 महीने तक के बछड़ों में अधिक पाया जाता है। भैंस के बछड़े गाय के बछड़ों की तुलना में अधिक सुग्राही होते हैं।
जीवनचक्र की मुख्य अवस्थाएँ एवं संक्रमण-गोलकृमि पशुओं की आँत में रहते हैं। इनके अण्डे मल के साथ शरीर के बाहर आते हैं। ये अण्डे यथोचित समय में संक्रामक अवस्था में पहुंच जाते हैं तथा इनके अन्दर लार्वा की द्वितीय अवस्था बन जाती है। पशु द्वारा खा लेने पर ये छोटी आँत में निर्मोकोत्सर्जन करते हैं। यहाँ से ये शरीर के विभिन्न अंगों के ऊतकों में (जैसे-यकृत, फुफ्फुस, वृक्क) में पहुंच जाते हैं। इस समय तक इनमें कोई विकास नहीं होता। जिसे प्रसवपूर्व संक्रमण कहते हैं।
रोगजनकता-यह मुख्य रूप से तीन महीने की उम्र तक के बछड़ों का परजीवी है। भारी संक्रमण से बछड़ों में अतिसार हो जाता है और शरीर कृशकाय हो जाता है जिसके कारण उन्हें खड़े रहने में भी परेशानी होती है। उसकी श्वास से सड़े मक्खन जैसी गंध आती है। बछड़ों में न्यूमोनिया के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। गोलकृमियों की वयस्क अवस्था आंत्रशोथ पैदा करती है। भारी संख्या में यह आँत में अवरोध पैदा करते हैं।
लक्षण-पशुओं में खाने के प्रति अरुचि हो जाती है, शरीर के भार में कमी आ जाती है तथा अतिसार हो जाता है। शरीर में रक्त की कमी हो जाती है तथा छोटी व बड़ी आँत में आंत्रशोथ हो जाता है। भेड़ों में पैरों के चारों ओर की त्वचा गल जाती है जिसे पद गलन कहते हैं। जिससे इन स्थानों पर जीवाणु प्रवेश कर जाते हैं।
उपचार-इसके उपचार हेतु कृमि नाशक औषधि का प्रयोग करना चाहिए जैसे कैरीसाइड 55-100 मिलीग्राम/किलो शरीर भार के अनुसार देना चाहिए। इसके अतिरिक्त डेवर्म, पेनाकर आदि भी दी जा सकती हैं।
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Question 44 Marks
पेचिस के कारण, लक्षण, निदान एवं चिकित्सा पर टिप्पणी लिखिए।
Answer
पेचिस- यह रोग एक प्रजीवा द्वारा फैलने वाला रोग है, जो कि गर्मी के दिनों में अधिकतर फैलता है। इस रोग का जीवाणु बड़ी आँत में रहता है और पशु में दस्त उत्पन्न करता है। रोगी पशु के दस्त में अण्डे की तरह की छोटी-छोटी कोकसीडिया निकलती हैं, जोकि बिना सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखी जा सकती है। यह रोग पशुओं तथा कुक्कुट में छोटे बच्चों में ज्यादा सघन जनसंख्या हो फैलता है। बड़े पशुओं में इसका आक्रमण नहीं होता है। यह बीमारी गाय, भैंस तथा कुक्कुट के छोटे बच्चों में फैलती है।
बीमारी के कारण- यह प्राजीव परजीवी कोकसीडियम जरनाई या इमेरिया जरनाई के द्वारा फैलता है। यह परजीवी गोबर में पाया जाता है, जो कि बड़ी आँत पर आक्रमण करता है। इन जीवाणुओं की स्पोरोजोइट अवस्था छूत फैलाने का कार्य करती है।
पेचिस के लक्षण-इस बीमारी की प्रारंभिक अवस्था में बहुत पतला गोबर होता है, जिसमें रक्त मिला रहता है। एक-दो दिन बाद और अधिक खून आने लगता है। बहुत जोर लगाने पर ऐंठन के साथ दस्त होता है। कभी-कभी जोर लगाने से रैक्टम भी बाहर आ जाता है। पशु में बेचैनी एवं प्यास बढ़ जाती है, भूख कम हो जाती है परन्तु इसमें तापक्रम नहीं बढ़ता है। इसमें रोगी 5-15% मर जाते हैं।
निदान- ( 1) लक्षणानुसार- बीमारी के उपरोक्त लक्षण देखकर निदान किया जा सकता है।
(2) सूक्ष्मदर्शी द्वारा-गोबर का स्मीयर बनाकर परीक्षण करने पर जीवाणु देखे जा सकते हैं।
(3) पोस्टमार्टम-शव की चीर फाड़ करने से आँतें सूजी हुई कई गुना मोटी दिखाई देती हैं। आँतों की श्लेष्म झिल्लियों पर रक्त के धब्बे मिलते हैं। गुदा की श्लेष्म झिल्ली पीली पड़ जाती है।
पेचिस की चिकित्सा-पेचिस की चिकित्सा निम्न प्रकार की जाती है-
(1) सौंफ, जीरा, बेलगिरी सबकी एक-एक तोला मात्रा लेकर चावल के एक किलो मांड में देनी चाहिए।
(2) क्लोरोडीन 5 ग्राम, फिनोल 750 मिलीग्राम, दलिया 400 ग्राम सबको मिलाकर दिन में 2-3 बार देना चाहिए।
(3) सल्फा ड्रग्स जैसे सल्फागोनेडीन, सल्फामैजेथीन की गोलियाँ या सल्फामैजाथीन सोडियम 33.3% के घोल की इन्ट्रावेनस सुई लगाने से लाभ होता है।
(4) ऐंठन तथा दर्द को कम करने के लिए गुदा में 1% फिटकरी का घोल पिचकारी द्वारा चढ़ाना चाहिए।
(5) दस्तों के कारण पशु के शरीर से काफी पानी निकल जाता है, अतः पशु का डीहाइड्रेशन रोकने के लिए 1000-2000 सैलाइन घोल जिसमें ग्लूकोज हो इन्ट्रावेनस सुई देनी चाहिए।
(6) गोबर कम उसके साथ आँव अधिक होने पर नक्सवोम 30 देना चाहिए।
(7) पेट में गड़गड़ाहट, अधो वायु के साथ मल त्याग, उसमें आँव तथा खून का परिमाण अधिक होने पर एलोज 30 देनी चाहिए।
(8) काले, मटमैले, आँवयुक्त कोलतार जैसे दस्त हों तो मर्क्यूरिसकार 200 देना चाहिए।
(9) खून का भाग कम हो, पेट में मरोड़ अधिक हो तो मर्क सोल 200 का प्रयोग करना चाहिए।
(10) पशु गृह तथा अन्य जगह से कोकसीडिया नष्ट करने के लिए अमोनिया घोल का छिड़काव करना चाहिए। इसके अतिरिक्त वे सब उपचार जो कि संक्रामक रोगों के बचाव के लिए बताए गए हैं, अपनाने चाहिए।
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Question 54 Marks
पशुओं में दाह एवं मोच पर टिप्पणी लिखिए।
Answer
दाह (Burn)- जब पशु आवास में आग लग जाने से गर्म पानी से या रासायनिक घोल (तेजाब) से जल जाता है। जिससे फफोले पड़ जाते हैं एवं फफोलों के फूटने पर उसमें से द्रव्य निकलता है एवं घाव हो जाता है।
उपचार-जले हुए भाग पर चूने का पानी, अलसी का तेल (यदि अलसी का तेल उपलब्ध नहीं हो तो मीठा तेल) बराबर मात्रा में मिलाकर लगाने से काफी आराम मिलता है। यदि घाव में मवाद या तरल सा पदार्थ निकलता हो तो लाल दवा के हल्के गर्म घोल से साफ करके जिंक ऑक्साइड दिन में दो-तीन बार लगाना चाहिए। सिरका, शहद या पैराफीन लगाने से भी दर्द कम होता है। तेजाब से जल जाने पर एक प्रतिशत कपड़े धोने का सोडे का घोल लगाना चाहिए। यदि पशु के शरीर का काफी भाग जल गया हो तो तुरंत पशु चिकित्सक से इलाज करवाना चाहिए।
मोच (Sprain)- यह आमतौर पर पशु के फिसलने से, कूदने से, पशु के आपस में लड़ने से चोट लगने से मोच आती है। मोच साधारणतया शरीर के जोड़ों पर विशेषकर टांग में आती है। इसमें मांसपेशियाँ, स्नायु या टेन्डन पर चोट आती है या ये अपने स्थान पर से हट जाते हैं। मोच के स्थान पर सूजन आती है जो गर्म एवं दर्द युक्त होती है। यदि मोच पशु के टांगों में है तो पशु लंगड़ाकर चलता है।
उपचार-यदि मोच ताजी एवं गर्म है तो उस जगह पर ठंडा पानी डालें या बर्फ से सेक करना चाहिए। पुरानी मोच में नमक या बोरिक एसिड मिले गुनगुने पानी से सेक करना चाहिए। पशु को सूजन एवं दर्द कम करने वाली दवा लगानी चाहिए।
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Question 64 Marks
पशुओं में होने वाले घावों के विभिन्न घावों का वर्णन करते हुए उनकी उपचार विधि को स्पष्ट कीजिए।
Answer
पशुओं में होने वाले घाव को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है-
(1) खरोंच- यह किसी वस्तु से रगड़ खाने, टकराने, कंटीली झाड़ियों से तारबंदी से रगड़ खाने या गिरने से होते हैं। इसमें त्वचा की सूक्ष्म रक्तवाहिनियाँ फट जाती हैं। खरोंच घाव बहुत ही दर्द युक्त होता है व कई बार ऊतकों के बीच द्रव्य इकट्ठा हो जाता है जिसमें घाव में सूजन पैदा हो जाती है।
उपचार-यदि घाव मामूली सी खरोंच की स्थिति में हो तो 0.1% लाल दवा (पोटैशियम परमँग्नेट) से बने पानी के घोल से या 1% फिनाइल युक्त पानी में रूई भिगोकर घाव को धोना चाहिए व उसके बाद टिंक्चर आयोडिन को रूई में भिगोकर घाव पर लगाना चाहिए।
(2) खुले घाव- शरीर के किसी भाग पर चोट लगने से ऊतक नष्ट हो जाने एवं रक्त वाहिनियों के फट जाने से होता है। इस प्रकार के घाव दुर्घटना से, तेज धारदार या नुकीले औजार से, किसी पदार्थ से टकराने से हो जाता है। ताजे घाव से खून निकलता है यदि इस प्रकार के घाव की ठीक तरह से देखभाल न की जाए तो घाव सड़ जाता है। घाव पर मक्खियाँ बैठने पर उसमें कीड़े भी पड़ जाते हैं। अतः ताजे घाव का शीघ्र उपचार करने पर जल्द भर जाता है।
उपचार-सर्वप्रथम घाव के आस-पास के बाल
काट दें। लाल दवा एक प्रतिशत के घोल से धोकर साफ कर लेना चाहिए। यदि घाव से खून निकल रहा हो तो टिंचर बेन्जाइन का रूई का फाहा रखकर पट्टी बांध देनी चाहिए। यदि घाव ऐसे स्थान पर हो जहाँ पट्टी बाँधना सम्भव न हो तोवहाँ कोई एन्टीसैप्टिक मल्हम घाव के ऊपर लगा देना चाहिए।
(3) पुराना घाव- यदि ताजे घाव का समय पर
उपचार नहीं किया जाये तो घाव सड़ने लगता है। इस प्रकार का घाव पुराना घाव कहलाता है। इस प्रकार के घाव में मवाद पड़ जाती है एवं घाव से दुर्गंध आती है। मक्खियों के बैठने से घाव में कीड़े पड़ जाते हैं।
उपचार-इस प्रकार के घाव को लाल दवा के एक प्रतिशत घोल से अच्छी तरह से साफ करना चाहिए। रूइ के फोहे से अच्छी तरह से साफ करना चाहिए। रूई के फोहे से घाव में पड़ी मवाद, मृत ऊतक आदि को घाव से निकाल देना चाहिए। यदि घाव में कीड़े पड़ गए हों तो तारपीन तेल का रूई का फाहा 5-10 मिनट तक लगाकर रखें जिससे घाव के भीतर घुसे कीड़े घाव की सतह पर आ जायें उसके बाद रूई का फाहा हटाकर बाहर निकाल देना चाहिए। घाव पर एन्टीसैप्टिक मल्हम या टिंक्चर आयोडीन लगाना चाहिए। जब तक घाव पूरी तरह न भरे नियमित रूप से घाव पर दवा लगाकर पट्टी बाँधनी चाहिए जिससे घाव को धूल एवं मक्खियों से बचाया जा सके।
शरीर के कई ऐसे नाजुक भाग हैं जैसे आँख, कान, थन, योनि, गुदा द्वार आदि के घावों का उपचार ऊपर वर्णित उपचार विधि से करने पर लाभ की जगह नुकसान होगा। नाजुक भागों के घाव के उपचार हेतु एक्रीफ्लेवीन लोशन, मरक्यूरोक्रोम आदि दवा लगानी चाहिए।
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Question 74 Marks
पशुओं में होने वाली बीमारियों के वर्गीकरण को स्पष्ट कीजिए।
Answer
बीमारियों का वर्गीकरण- पशुओं में होने वाली बीमारियों को निम्न आधार पर वर्गीकृत किया गया है-
(1) रोग के कारक के आधार पर- इस वर्ग में वे सभी रोग आते हैं, जिनका कारक निश्चित होता है। इनको तीन भागों में बाँटा गया है।
(i) संसर्ग रोग-इन्हें छूत की बीमारी भी कहते हैं। इस वर्ग में वे सभी रोग आते हैं, जो रोगग्रस्त पशु के स्वस्थ पशु के संपर्क में आने से स्वस्थ पशुओं में भी फैल जाते हैं। जैसे-पशु प्लेग, गलघोंटू इत्यादि। छूत से फैलने वाले (संसर्ग रोग) सभी रोग संक्रामक होते हैं, लेकिन सभी संक्रामक रोग छूत से फैलने वाले नहीं होते हैं।
(ii) संक्रामक रोग-इस वर्ग के रोग जीवाणु, वायरस, परजीवी तथा प्रोटोजोआ द्वारा फैलते हैं। यह रोग, रोगग्रस्त पशुओं के सम्पर्क में रहने वाली वस्तुओं के द्वारा भी स्वस्थ पशुओं में पहुँच जाते हैं।
(iii) अन्य रोग- अन्य रोगों में पोषक तत्वों की कमी से (जैसे-कैल्सियम की कमी से अस्थि वक्रता) होने वाले रोग, चयापचय जन्य रोग (जैसे कीटोसिस तथा दुग्ध ज्वर) एलर्जिक रोग (जैसे चर्मरोग) तथा विषाक्तता (सायनाइड विषाक्तता) आदि रोग आते हैं।
(2) रोग से पीड़ित अंगों के आधार पर- इस वर्ग के रोगों को दो वर्गों में बाँटा गया है-
(i) स्थानीय रोग-वे रोग जो एक समय में पशु के एक खास भाग को ही प्रभावित करते हैं। जैसे-होर्निया, थनैला, फोड़ा आदि।
(ii) साधारण रोग-इस वर्ग के रोग पशु शरीर के विभिन्न भागों तथा कभी-कभी पूर्ण शरीर को ही प्रभावित करते हैं। जैसे-इन्फ्लूएंजा बुखार।
(3) रोग प्रकोप एवं अवधि के आधार पर-इस वर्ग के रोगों को चार भागों में बाँटा गया है-
(i) अति उग्र रोग-ऐसे रोग जो पशुओं पर अचानक आक्रमण करते हैं इनके लक्षण भी भली प्रकार प्रकट नहीं हो पाते और पशु यकायक मरने लगते हैं। जैसे भेड़ों में ऐन्थ्रेक्स रोग।
(ii) उग्र रोग- ऐसे रोग जो अचानक अधिक तेजी से आते हैं और थोड़ी देर में समाप्त हो जाते हैं। जैसे गलघोंटू, लंगड़ी रोग।
(iii) उप उग्ररोग-इनमें वे सभी रोग आते हैं जो अचानक तेजी से आते हैं और इनकी अवधि अधिक लम्बी होती है। जैसे खुरपका रोग।
(iv) चिरकालीन रोग-इनमें वे रोग आते हैं जो पशु शरीर में धीरे-धीरे दिखाई देते हैं तथा अधिक समय में समाप्त होते हैं। जैसे क्षय रोग इत्यादि।
(4) रोग विभाजन के आधार पर- इस वर्ग के रोगों को 6 भागों में बाँटा गया है-
(i) पशु महामारी-इस प्रकार के रोग एक साथ बड़े क्षेत्र में पशुओं में फैलते हैं और इनके लक्षण भी सभी पशुओं में एक समान ही होते हैं।
(ii) स्थानिक मारी रोग- इस प्रकार के रोग वे माने जाते हैं जो पशुओं की कुछ विशेष नस्लों अथवा जातियों को ही प्रभावित करते हैं।
(iii) विदेशज रोग- ऐसे रोग जो विदेशी नस्ल खरीदते समय इनके साथ देश में आ जाते हैं। जैसे दक्षिण अफ्रीकी अश्व रोग।
(iv) विकीर्ण रोग-यह रोग यंत्र तांत्रिक रोग भी कहलाता है। यह रोग कभी-कभी पशुओं में दिखाई देता है, जैसे-पागलपन (Rabies)।
(v) पैन्जूटिक रोग-इस प्रकार के रोग प्रायः वह होते हैं, जो एक साथ किसी राष्ट्र में पशुओं की विभिन्न जातियों को प्रभावित करते हैं।
(vi) देशी रोग-इस प्रकार के रोग एक राष्ट्र के जन्मजात रोग होते हैं, ये आरम्भ से ही पशुओं में होते हैं।
(5) रोग आरम्भ होने के आधार पर- इस वर्ग को तीन भागों में बाँटा गया है-
(i) पैतृक रोग-वे रोग जो माता-पिता से संतान में आते हैं, जैसे मिर्गी तथा हिमोफीलिया।
(ii) जन्मजात रोग-वे रोग जो बच्चों में गर्भकाल से ही माँ से लग जाते हैं। जैसे क्षय रोग।
(iii) अर्जित रोग-वह रोग जो बच्चों में जन्म लेने के बाद उनके जीवनकाल में वातावरण से लग जाते हैं।
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Question 84 Marks
स्वस्थ पशु एवं रोगी पशुओं के लक्षणों की तुलना कीजिए।
Answer
स्वस्थ एवं रोगी पशुओं के लक्षणों की तुलना अग्र तालिका से कर सकते हैं-
तालिका
क्र.संस्वस्थ पशुओं के लक्षणरोगी पशुओं के लक्षण
1.स्वस्थ पशु रेवड़ में रहता है।बीमार पशु रेवड़ से अलग हो जाता है एवं मुरझाई सी अवस्था में रहता है।
2.पशु ध्वनि और गति के प्रति उचित संवेदनशीलता दर्शाता है।बाह्य संवेदक के प्रति पूरी तरह संवेदनशील नहीं रहता।
3.पशु की त्वचा मुलायम, चमकदार व लचीली होती है। इसकी पहचान गर्दन की चमड़ी को पकड़कर की जा सकती है।पशु की त्वचा सूखी, मोटी, कम लचीली, चमकहीन व रोंगटे खड़े रहते हैं, त्वचा को हाथ से पकड़ने पर रोएं हाथ पर चिपक जाते हैं।
4.पशु के नथुने नम होते हैं। नासारन्ध्र से किसी प्रकार का स्राव नहीं निकलता है।नथुने शुष्क होते हैं। नासारन्ध्र से पानी जैसा गाढ़ा या खून निकल सकता है।
5.आंखें चमकदार एवं सचेत होती हैं।आँखों में कम चमक होती है एवं कुछ बीमारियों में पानी या तरल गाढ़ा पदार्थ निकलता है।
6.आहार पूरी तरह से खाता है।आहार खाने में कोई रुचि नहीं लेता।
7.पशु जुगाली करता रहता है।जुगाली नहीं करता या कम करता है या लार गिरती है।
8.पशु ठीक तरह से गोबर करता है। गाय भैंस का गोबर अपेक्षाकृत ढीला होता है एवं रंग गहरे हरे से गहरा भूरा होता है। गोबर में किसी प्रकार का बुलबुला या खून नहीं होता है एवं किसी प्रकार की दुर्गंध नहीं आती।पशु के गोबर के रंग, मात्रा, गाढ़ापन व गन्ध में परिवर्तन आ जाता है। गोबर सूखा या पतला करता है या कब्जी हो जाती है।
9.पशु के पेशाब का रंग हल्का पीला या पानी जैसा होता है। सामान्य रूप से पेशाब करता है एवं किसी प्रकार की दुर्गंध नहीं आती।पेशाब का रंग गहरे पीले रंग का या लाल रंग जैसा होता है। पेशाब में दुर्गंध आती है। पेशाब करने में तकलीफ, पेशाब की ज्यादा या कम मात्रा।
10.दुधारू पशुओं का दुग्ध उत्पादन सामान्य रहता है एवं दुग्ध की गुणवत्ता सामान्य रहती है।दुग्ध उत्पादन कम हो जाता है। दुग्ध की गुणवत्ता में गिरावट आती है। दुग्ध पानी जैसा या मवाद या खून आतादुग्ध उत्पादन कम हो जाता है। दुग्ध की गुणवत्ता में गिरावट आती है। दुग्ध पानी जैसा या मवाद या खून आता है।
11.श्वसन क्रिया एवं श्वसन गति सामान्य होती है।श्वास लेने में कठिनाई, खांसी या दुर्गंध युक्त श्वास आती है।
12.शरीर का तापमान सामान्य रहता है।तापमान सामान्य से अधिक या कम हो सकता है।
13.नाड़ी की गति सामान्य होती है।नाड़ी की गति सामान्य से अधिक या कम हो जाती है।
14.पशु के उठने-बैठने, चलने व चरने की क्रिया सामान्य होती है।उठने-बैठने में तकलीफ होती है। पशु लंगड़ाता है।
15.पशु की आवाज सामान्य रहती है।आवाज में परिवर्तन आ जाता है।
16.पशु कान, पूंछ या सिर हिलाते रहते हैं एवं सिर ऊँचा उठाये रखते हैं।कान, पूँछ या सिर कम हिलाते हैं या बिल्कुल नहीं हिलाते। सिर नीचे की ओर होता है।
17.प्राकृतिक द्वार जैसे जननेन्द्रियों से किसी प्रकार का स्राव नहीं आता। परन्तु मादा पशु के पाले में आने पर स्राव आता है।जननेन्द्रियों में मवाद जैसा स्राव या खून आता है।
18.पशु के स्वभाव में सामान्य से भिन्नता नहीं होती।पशु का स्वभाव सामान्य नहीं रहता।
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