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3 अंक प्रश्न

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Question 13 Marks
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-
(i) टीकाकरण, (ii) एलर्जी ।
Answer
(i) टीकाकरण- टीकाकरण वह उपाय है जिसके द्वारा किसी जीव में किसी रोग के प्रति प्रतिरोधकता को पैदा किया जाता है। इस तकनीकी में कमजोर रोगकारक जीव को शरीर में प्रवेश करा दिया जाता है तब शरीर का प्रतिरक्षात्मक तंत्र प्रेरित होकर इस रोगकारक के प्रति प्रतिरक्षियों का निर्माण करके रोगप्रतिरोधात्मक क्षमता का विकास कर लेता है, और जब वास्तविक रोगाणु शरीर में प्रवेश करते हैं तब ये प्रतिरक्षी उसे नष्ट कर देते हैं और रोग से जीव की रक्षा हो जाती है। रोगकारकों या रोगाणुओं के कृत्रिम रूप से प्रवेश कराने वाले कारक को टीका कहते हैं। आजकल बच्चों को पोलियो, टिटेनस, डिप्थीरिया, कुकुर खाँसी, चेचक आदि के टीके लगाये जाते हैं।
(ii) एलर्जी - जब हमारे शरीर में ऐसा पदार्थ प्रवेश करता है, जिसके प्रति उच्च प्रतिरोधक क्षमता का विकास हो गया है, तब अचानक तीव्रता से हमारे शरीर में प्रतिरोधात्मक क्रियाएँ होने लगती हैं, जो पूरे शरीर में शोथ, जलन, खुजली या दाने के रूप में दिखाई देती हैं, इन्हीं सभी क्रियाओं को एक साथ एलर्जी कहते हैं। अतः एलर्जी हमारे शरीर में उच्च प्रतिरोधक क्षमता का प्रतीक है। धूल तथा परागकणों, सौन्दर्य प्रसाधनों, विविध रसायनों तथा रोगकारकों के कारण एलर्जी के लक्षण दिखाई देते हैं।
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Question 23 Marks
निम्नलिखित पौधे से प्राप्त ड्रग का नाम एवं शरीर पर होने वाले एक-एक कुप्रभाव को लिखिए।
(i) पैपेवर सोम्नीफेरम, (ii) कैनिबस सटाइवा, (iii) एरिथ्रोजाइलम कोका ।
Answer
(i) पैपेवर सोम्नीफेरम प्राप्त ड्रग - अफीम ।
कुप्रभाव - अफीम के सेवन से शारीरिक निर्भरता और श्वसन अवसाद हो सकता है।
(ii) कैनिबस सटाइवा - प्राप्त ड्रग - भाँग, गांजा, चरस।
कुप्रभाव -इसके सेवन से याद्दाश्त में कमी, एकाग्रता में कमी और मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ हो सकती हैं।
(iii) एरिथ्रोजाइलम कोका -प्राप्त ड्रग कोकीन।
कुप्रभाव - इससे हृदय सम्बन्धी समस्याएँ हो सकती हैं।
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Question 33 Marks
प्रतिरक्षी अणु का नामांकित चित्र बनाइए।
Answer
प्रतिरक्षी या एंटीबॉडी प्रतिरक्षा तंत्र से सम्बन्धित प्रोटीन हैं, जिन्हें इम्यूनोग्लोब्युलिन भी कहा जाता है। प्रत्येक प्रतिरक्षी अणु में चार पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ होती हैं। इनमें से दो छोटी श्रृंखलाएँ हल्की श्रृंखलाएँ या लाइट चेन तथा बड़ी श्रृंखलाएँ, भारी श्रृंखलाएँ या हैवी चेन कहलाती हैं। इसी कारण प्रतिरक्षी अणु को H2L2 द्वारा दर्शाया जाता है। यह श्रृंखलाएँ मिलकर एक Y आकार की सरंचना बनाती हैं। इन श्रृंखलाओं के शीर्ष परिवर्तनीय क्षेत्र अर्थात् वेरिएबिल रीजन का निर्माण करते हैं, जो विशिष्ट एंटीजन हेतु प्रतिरक्षी को विशिष्टता प्रदान करता है। यह लाइट व हैवी श्रृंखलाओं का अंतिम सिरा 'एंटीजन बाइंडिंग साइट' का निर्माण करता है। यह श्रृंखलाएँ आपस में डाइसल्फाइड बन्धों से जुड़ी रहती हैं।
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Question 43 Marks
प्रतिजन क्या है? इसके सामान्य लक्षण लिखिए।### प्रतिजन के तीन लक्षण लिखिए।
Answer
प्रतिजन शब्द का शाब्दिक अर्थ है - प्रतिपिण्ड उत्पादन करने वाला। प्रतिजन सभी रोगाणुओं सहित सभी प्रकार की कोशिकाओं की सतह पर पाए जाते हैं।
रासायनिक रूप से प्रतिजन प्रायः प्रोटीन्स या ग्लाइकोप्रोटीन होते हैं लेकिन यह विविध रासायनिक प्रकृति के हो सकते हैं। प्रतिजन शरीर में प्रतिरक्षी तंत्र को एंटीबॉडी निर्माण हेतु उत्तेजित करते हैं।
जीवाणु कोशिका भित्ती के पॉलीसैकेराइड, नाभिकीय अम्ल, जटिल लिपिड, विषाणु कैप्सिड भी एंटीजन के रूप में कार्य कर सकते हैं।
प्रत्येक प्रतिजन अणु में एक प्रतिजनिक निर्धारक क्षेत्र (एंटीजेनिक डिटरमिनेशन एरिया) होता है। इस क्षेत्र की उपस्थिति प्रत्येक प्रतिजन का एक विशिष्ट लक्षण है। किसी प्रतिजन के एक से अधिक एंटीजेनिक डिटरमिनेशन एरिया हो सकते हैं।
विभिन्न प्रकार के प्रतिजन हैं- स्व-प्रतिजन या ऑटो एंटीजन, एलोएंटीजन तथा हेटेरोफाइल एंटीजन।
मनुष्य में विभिन्न रक्त वर्गों (ABO रक्त समूह) की उपस्थिति का आधार प्रतिजन होते हैं। प्रतिजन के आधार पर ही प्रतिरक्षी तंत्र रोगाणुओं की पहचान कर पाता है।
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Question 53 Marks
प्रतिजैविकों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।### प्रतिजैविक क्या है?### प्रतिजैविक के तीन लक्षण लिखिए।
Answer
प्रतिजैविक - सामान्यतः सूक्ष्मजीवों द्वारा उत्पन्न ऐसे पदार्थ जो या तो जीवाणुओं को मार देते हैं या उनकी वृद्धि संदमित कर देते हैं, प्रतिजैविक कहलाते हैं। प्रतिजैविकों का उपयोग जीवाणुजन्य रोगों में ही किया जाता है। विषाणुओं पर इनका कोई प्रभाव नहीं होता।
पहली एंटीबायोटिक पेनिसिलीन थी जिसे अलेक्जैडर फ्लैमिंग ने 1928-29 में पेनिसीलियम नोटेटम नामक कवक से प्राप्त किया था। आज अनेक प्रकार की एंटीबायोटिक्स की खोज की जा चुकी है। एंटीबोयाटिक्स जीवाणुओं में या तो कोशिका भित्ति के संश्लेषण को बाधित करती है या उनके किसी महत्वपूर्ण जैव- रासायनिक पथ पर रोक लगाकर उनकी मृत्यु का कारण बनती है।
पेनिसिलीन जैसी एंटीबायोटिक्स केवल कुछ प्रकार के जीवाणुओं के विरुद्ध कारगर होती है इन्हें नेरो स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक कहा जाता है। आधुनिक एंटीबायोटिक्स जैसे सिफेक्सिम ब्रॉड स्पेक्ट्रम होती हैं व अनेक प्रकार के रोगाणुओं के विरुद्ध कार्य करती हैं।
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