Questions

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न [6M] - जीव विज्ञान

Take a timed test

6 questions · self-marked practice — reveal the answer and mark yourself.

Question 16 Marks
जन्तुओं पर रासायनिक समन्वय पर एक व्याख्यात्मक टिप्पणी लिखिए।
Answer
जन्तुओं में रासायनिक समन्वय
जन्तुओं में शरीर की विभिन्न क्रियाओं को नियंत्रित करने के लिए दो प्रकार की समन्वय प्रणालियाँ होती हैं- तंत्रिका समन्वय और रासायनिक समन्वय। रासायनिक समन्वय का कार्य शरीर में विशेष रसायनों के माध्यम से होता है, जिन्हें हामोंन कहा जाता है। यह समन्वय मुख्यतः अंतः स्त्रावी ग्रंथियों (Endocrine glands) द्वारा किया जाता है जो हामर्मोन का स्त्राव करती हैं। ये हामोंन रक्त के माध्यम से शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचते हैं और लक्षित अंगों (Target organs) पर प्रभाव डालते हैं। जन्तुओं में कई प्रकार की अंतः स्त्रावी ग्रंथियाँ होती है, जैसे-
1. पीयूष ग्रंथि (Pituitary gland) इसे 'मुख्य ग्रंथि' कहा जाता है क्योंकि यह अन्य ग्रंथियों के कार्य को नियंत्रित करती है।
2. थायरॉइड ग्रंथि (Thyroid gland) यह थायरॉक्सिन हार्मोन बनाती है जो शरीर के चयापचय (metabolism) को नियंत्रित करता है।
3. अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal gland) यह एड्रेनालिन हामोंन बनाती है जो आपातकालीन स्थिति (जैसे डर, तनाव) में शरीर को सतर्क करता है।
4. अग्न्याशय (Pancreas) यह इंसुलिन और ग्लूकागोन हार्मोन बनाता है जो रक्त में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करते हैं।
5. जनन ग्रंथियाँ (Testes और Ovaries) ये लैंगिक हार्मोन जैसे टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का स्राव करती है, जो प्रजनन और द्वितीयक लैंगिक लवणों को नियंत्रित करते हैं।
रासायनिक समन्वय शरीर की वृद्धि, विकास, चयापचय, तनाव प्रतिक्रिया, जल-संतुलन, प्रजनन और अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों को नियंत्रित करता है। यह प्रक्रिया धीमी लेकिन प्रभावी होती है और तंत्रिका समन्वय के साथ मिलकर शरीर में स्थिरता बनाए रखती है।
View full question & answer
Question 26 Marks
पादपों में समन्वय का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
Answer
पादपों में समन्वयन
सभी जीवों में (पादप व जन्तु दोनों में ही।) जैविक क्रियामों का निमंत्रण व समन्वयन पामा जाता है। जन्तुओं में इसके लिए संवेदी अंग व तंत्रिका तंत्र होता है किन्तु पादपों में न तो तंत्रिका तंत्र होता है और न ही विशेष संवेदी अंगा फिर भी पादपों में उद्‌दीपन के प्रति अनुक्रिया देखी जा सकती है। यदि हम छूई-मुई के पौधों की पत्तियों को धीरे से वे हैं तो वे मुड़ना शुरू कर देती हैं। सूरजमुखी के पौधे के फूल सूर्य के साथ-साथ घूमते जाते हैं। जब अंकुरित बीज का नन्हा-सा पौधा वृद्धि करता है, तो उसकी जड़ नीचे की और तथा तना ऊपर की और बढ़ता है। अतः पौधों में होने वाली समन्वयक क्रियाएँ विभिन्न पादप गतियों के रूप में परिलासित होती हैं। ये पादप गतियाँ वृद्धि मुक्त अथवा वृद्धि पर आश्रित हो सकती हैं; जैसे- छुई-मुई की पत्तियों का वृद्धि मुक्त गति है और नन्हें से पौधे की जड़ व तने का नीचे व ऊपर की और बढ़ना वृद्धि पर आश्रित गति है।
वृद्धि एक स्थायी एवं अपरिवर्तनीय प्रक्रिया है जिसके कारण जीवों के आकार एवं भार में वृद्धि होती है और नए जीवद्रव्य या निमणि होता है। छुई-मुई में स्पर्श की अनुक्रिया की गति बहुत ग्रीव है। रात और दिन की अनुक्रिया में पुष्पों की गति बहुत मंद होती है। पादय की वृद्धि संबंधी गतियाँ भी मंद होती हैं।
View full question & answer
Question 36 Marks
प्रतिवर्ती क्रिया को चित्र की सहायता से समझाइए। इसका क्या महत्त्व है ?###प्रतिवर्ती क्रिया किसे कहते हैं? प्रतिवर्ती चाप को नामांकित चित्र बनाकर उदाहरण सहित समझाइए।###प्रतिवर्ती क्रिया का महत्त्व बताइए तथा सचित्र वर्णन कीजिए।###प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex action) से आप क्या समझते है। इसका एक नामांकित चित्र बनाइए।###प्रतिवर्ती क्रिया पर टिप्पणी लिखिए।###मानव में प्रतिवर्ती क्रिया का सचित्र वर्णन कीजिए।###प्रतिवर्ती चाप पर टिप्पणी लिखिए।
Answer
प्रतिवर्ती क्रिया
किसी उद्दीपन के फलस्वरूप शीघ्रतापूर्वक होने वाली स्वचालित और अनैच्छिक क्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया कहते हैं।
कार्यविधि प्रतिवर्ती क्रियाएँ जो अनैच्छिक होती हैं और जिन पर मस्तिष्क का किसी भी प्रकार का नियन्त्रण नहीं होता। संवेदी प्रेरणा द्वारा सुषुम्ना अथवा मस्तिष्क में पहुंचने पर तुरन्त ही चालक प्रेरणा के रूप में अपवाहक अंगों मे स्थानान्तरित हो जाती हैं। इस प्रकार प्रतिवर्ती क्रियाएँ अनायास, अविलम्ब यन्त्रवत् एवं सहज ही घटित होती हैं। इस प्रकार की क्रियाओं का सर्वप्रथम पता हाल (Hall, 1833) ने लगाया था।
Image
सुषुम्ना से प्रत्येक स्पाइनल तन्त्रिका दो मूलों के रूप में निकलती है-
(ⅰ) संवेदी तन्तुओं से बना पृष्ठ मूल (dorsal root) तथा
(ii) चालक तन्तुओं से बना अधर मूल (ventral root)।
संवेदना प्राप्त होने पर आवेग (impulse) की लहर पृष्ठ मूल से होकर पृष्ठ मूल गच्छक में स्थित न्यूरॉन तथा उसके एक्सॉन में होती हुई सुषुम्ना के धूसर द्रव्य में पहुँचती है। यहाँ से सिनैप्टिक घुण्डियों से होता हुआ आवेग चालक तन्त्रिका कोशिकाओं के डेण्ड्राइट्स में जाता है। अब यह आवेग ज्यों-का-त्यों चालक प्रेरणा बनकर प्रभावी अंग में पहुँचता है। प्रभावी अंगों की पेशियाँ तुरन्त क्रियाशील होकर इन्हें गति प्रदान करती हैं। संवेदांग से लेकर अपवाहक अंग तक के इस प्रकार के आवेग पथ को प्रतिवर्ती चाप (reflex arc) कहा जाता है।
महत्त्व प्रतिवर्ती क्रियाएँ हमारे लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। जिनके दो प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं-
(i) प्रतिवर्ती क्रियाएँ सुषुम्ना द्वारा सम्पादित होती हैं, अतः मस्तिष्क (brain) का कार्य भार (बोझ) कम होता है।
(ii) ये तुरन्त तथा तीव्र गति से होती है, अतः सम्भावित दुर्घटना को रोकने में सहायता मिलती है।
View full question & answer
Question 46 Marks
मानव मस्तिष्क का नामांकित चित्र बनाइए तथा संक्षिप्त में वर्णन कीजिए।###मस्तिष्क के कितने भाग होते हैं? अनैच्छिक क्रियाएँ; जैसे रक्तदाब, या लार आना तथा वमन किस भाग से नियन्त्रित होते हैं?###मानव मस्तिष्क पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer
मनुष्य में मस्तिष्क अत्यन्त विकसित परन्तु अति कोमल अंग होता है। इसका आयतन 1200 cc से 1500 cc होता है। यह मस्तिष्क कोष में सुरक्षित रहता है। मस्तिष्क के चारों ओर झिल्लियों का दोहरा आवरण होता है। दोनों झिल्लियों के बीच में एक तरल पदार्थ भरा रहता है, जो बाहरी आघातों से मस्तिष्क की सुरक्षा करता है। मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग होते हैं- प्रमस्तिष्क अनुमस्तिष्क तथा मस्तिष्क पुच्छ। इनका वर्णन निम्नवत् है-
1. प्रमस्तिष्क (Cerebrum) यह मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग होता है; यह सम्पूर्ण मस्तिष्क का लगभग $9 / 10$ भाग होता है। प्रमस्तिष्क धूसर पदार्थ (grey matter) तथा श्वेत पदार्थ (white matter) द्वारा निर्मित होता है। प्रमस्तिष्क को एक लम्बी खाँच दायें तथा बायें गोलाध्दोँ में विभक्त करती है। प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध के अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भाग धूसर द्रव्य में ही स्थित होते हैं; जैसे-स्मृति केन्द्र, सोचने-विचारने का केन्द्र आदि। हृदय की गति, भोजन ग्रहण करना, साँस लेना आदि सभी कार्य प्रमस्तिष्क द्वारा संचालित किए जाते हैं। प्रमस्तिष्क ही घृणा, प्रेम, हर्ष, विषाद, दुःख व भय आदि संवेगों का केन्द्र है। अग्रमस्तिष्क का पिछला भाग डाइएनसिफैलॉन है। इसमें दो प्रमुख भाग होते हैं- थैलेमस तथा हाइपोथैलेमस। थैलेमस दर्द, ठण्डा व गर्म को पहचानने का कार्य करता है जबकि हाइपोथैलेमस भूख, प्यार, घृणा व ताप नियन्त्रण का केन्द्र है। ये वसा तथा कार्बोहाइड्रेट के उपापचय का भी नियन्त्रण करते हैं। अतः डाइनसिफैलॉन ताप नियमन, उपापचय तथा जनन क्रिया, दृक पिण्ड दृष्टि ज्ञान आदि का नियन्त्रण और नियमन करता है। डाइएनसिफैलॉन के हाइपोथैलेमस से पीयूष ग्रन्थि लगी होती है।
Image
2. अनुमस्तिष्क (Cerebellum) यह प्रमस्तिष्क के पिछले भाग में नीचे की ओर स्थित होता है। यह प्रमस्तिष्क से छोटा होता है तथा दो भागों में विभक्त होता है।
चलना, कूदना, दौड़ना आदि गति के सभी कार्य अनुमस्तिष्क द्वारा नियन्त्रित होते हैं। शरीर का सन्तुलन (equilibrium) भी इसी से बना रहता है।
3. मस्तिष्क पुच्छ या मेड्‌यूला ऑब्लांगेटा (Medulla oblongata) यह अनुमस्तिष्क के सामने स्थित होता है तथा मस्तिष्क का सबसे पिछला भाग है। यह बेलनाकार होता है। यह भाग श्वसन तन्त्र, हृदय व परिसंचरण तन्त्र अर्थात् अनैच्छिक क्रियाओं का केन्द्र है।
View full question & answer
Question 56 Marks
ऑक्सिन एवं जिबरेलिन हॉर्मोन्स के कार्यों का वर्णन कीजिए।###'ऑक्सिन्स हमारे लिए लाभदायक हैं।' इस कथन की पुष्टि कीजिए।###दो पादप वृद्धि नियन्त्रक हॉर्मोन्स का नाम बताइए तथा उनके कार्य का वर्णन कीजिए।###ऑक्सिन क्या है? प्रकाश अनुवर्तन में ऑक्सिन के कार्यों का वर्णन कीजिए।###दो पादप हॉर्मोन का नाम एवं कार्य लिखिए।###ऑक्सिन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
Answer
दो पादप वृद्धि हॉमोंन ऑक्सिन व जिबरेलिन्स हैं।
ऑक्सिन इसकी खोज वेण्ट (Vent) नाम वैज्ञानिक ने की थी। ये जड़ या तने के शीर्ष से स्स्रावित वे कार्बनिक पदार्थ हैं, जो मुख्यतया कोशिकाओं के दीर्धीकरण को प्रेरित करते हैं। इसके अतिरिक्त पादपों की विभिन्न जैविक क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। ऑक्सिन्स की सबसे अधिक सान्द्रता पादपों की शीर्षस्थ वृद्धि में पाई जाती है, उदाहरण: IAA, IBA, B-NAA, 2, 4-D आदि।
ऑक्सिन के प्रभाव तथा उपयोगिता
1. कोशिका दीर्घन तथा वृद्धि दर पर प्रभाव ऑक्सिन से कोशिका दीर्घन होने के कारण ही तनो तथा फलों के आयतन में वृद्धि होती है। कोशिका दीर्घन ऑक्सिन की उपस्थिति में भित्ति दाब घट जाने तथा जल के लिए भित्ति की पारगम्यता बढ़ जाने के कारण परासरणी सान्द्रता बढ़ने से तथा कोशिका भित्ति का लचीलापन (plasticity) बढ़ जाने के कारण होता है।
2. संवहन एधा में कोशिका विभाजन कोशिका विभाजन की दर तथा एधा की मौसमी सक्रियता ऑक्सिन से नियन्त्रित होती है। रोपण (grafting), क्षति (injury) आदि के समय कैलस (callus) का निर्माण इसी के कारण होता है।
3. शीर्ष प्रमुखता अधिकतर पादपो में शीर्ष कलिका की उपस्थिति में पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि रुकी रहती है। इस स्थिति को शीर्ष प्रमुखता (apical dorminance) कहते हैं। शीर्ष कलिका को हटाने पर पार्श्व कलिकायें तेजी से बढ़ती है। ऐसा माना जाता है कि शीर्ष कलिका में अवरोधक, ऑक्सिन बनते हैं जो नीचे जाकर पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि को रोकते हैं।
4. वर्तन गतियाँ एकदिशीय प्रकाश के कारण अन्धकार के क्षेत्र में आक्सिन की सान्द्रता अधिक हो जाती है। तनों में अधिक सान्द्रता अधिक वृद्धि प्रेरित करती है, अतः तने प्रकाश को ओर मुड़ जाते है अर्थात् धनात्मक प्रकाशानुवर्तन (positive phototropism) प्रदर्शित करते हैं। दूसरी ओर जड़ों में ऑक्सिन की अधिक सान्द्रता वृद्धि को संदमित करती है, अतः जड़े प्रकाश के विपरीत मुड़ जाती है और ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन (negative phototropism) प्रदर्शित करती है।
इसी प्रकार गुरुत्वाकर्षण के कारण अनुप्रस्थ स्थिति में निचले तल पर ऑक्सिन की सान्द्रता अधिक होने से तने व जड़ में क्रमशः ऋणात्मक एवं धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन (geotropism) प्रभावित होता है।
5. मूल प्रेरण यदि कलम को ऑक्सिन में डुबोकर भूमि में लगाया जये तो जड़ें शीघ्रता से उत्पन्न होती हैं। ऑक्सिन पार्श्व मूलों का प्रेरण भी करते हैं।
6. प्रसुप्तावस्था आलू जैसे कन्दों पर ऑक्सिन के छिड़काव से कलिये का अंकुरण रुका रहता है जिससे उनका संग्रहण अधिक समय तक किया जा सकता है।
7. अनिषेकफलन बीज रहित फलों के निर्माण में ऑक्सिन का उपयोग होता है। ये अनिषेकफलन (parthenocarpy) प्रेरित करते हैं।
8. खरपतवारनाशक 2,4-D जैसे ऑक्सिन संकीर्ण पत्ती वाली फसल (एकबीजपत्री) के साथ उगने वाली बड़ी पत्तियों वाली खरपतवार को नष्ट कर देते हैं।
उपर्युक्त के अतिरिक्त अन्य अनेक प्रक्रिया आदि में ऑक्सिन का उपयोग महत्त्वपूर्ण है; जैसे-पक्वनपूर्व फलों की गिरने से रोकथाम, पातन के रोकथाम, फलों को मीठा करने में, लघु शाखाओं के निर्माण में (जैसे-सेब में), फलन का प्रेरण आदि में।
जिबरेलिन के प्रभाव तथा उपयोगिता
1. बोल्टिंग
जिबरेलिन पर्वों की कोशिकाओं का दीर्घन करके तनों की लम्बाई बढ़ाता है। द्विवर्षीय पौधों में जिनका तना अत्यन्त हासित होता हैं। अर्थात् पर्वसन्धियाँ अत्यधिक पास-पास होती है; जिबरेलिन देने से तेजी से बढ़ने लगता है। इसे बोल्टिंग कहते हैं; जैसे- चुकन्दर (sugar beat) तथा आनुवंशिक बौने पौधे।
2. दीर्घ प्रकाशावधि वाले पौधों में शीघ्र पुष्पन जिबरेलिन के प्रभात से दीर्घ प्रकाशावधि पादपों; जैसे- हेनबेन (Hyoscyamus niger) लघु प्रकाशावधि में ही पुष्प उत्पन्न होने लगते हैं जबकि सामान्य अवस्था में दीर्घ प्रकाशावधि में ही पुष्प उत्पन्न होते हैं।
3. बसन्तीकरण का प्रतिस्थापन कुछ द्विवर्षीय पौधों में पुष्पन के लिए शीतकाल के कम तापमान की आवश्यकता होती है, जिबरेलिन के प्रभाव से यह आवश्यकता समाप्त की जा सकती है।
4. प्रसुप्तावस्था को दूर करना आलू के कन्दों (tubers) व शीतकालीन कलिकाओं को जिबरेलिन देने से उनकी प्रसुप्तावस्था टूट जाती है तथा अंकुरण प्रारम्भ हो जाता है।
5. अनिषेकफलन सेब, नाशपाती जैसे फलों में ऑक्सिन की अपेक्षा जिबरेलिन द्वारा अनिषेकफलन अधिक सफलता से कराया जा सकता है। इसी प्रकार अनेक फल; जैसे- अंगूर इनके प्रभाव से बड़े तथा बीज रहित उत्पन्न होते हैं।
उपर्युक्त के अतिरिक्त बीजों में शीघ्र अंकुरण, जीर्णता नियन्त्रण, पुष्पो व फलों का परिवर्द्धन आदि में जिबरेलिन उपयोगी हैं।
View full question & answer
Question 66 Marks
पादप हॉर्मोन्स पर टिप्पणी लिखिए।###पादप हॉर्मोन्स की चार प्रमुख विशेषताएँ बताइए।###पादप हॉर्मोन क्या हैं?###पादप हॉर्मोन्स कितने प्रकार के होते हैं?
Answer
पादप हॉर्मोन (Plant hormones) पादपों में वृद्धि तथा विकास को नियन्त्रित करने के लिए कुछ विशिष्ट रासायनिक पदार्थ होते हैं जिन्हें पादप हॉमोंन या वृद्धि नियामक (growth regulators) कहते हैं। पादप हॉर्मोन्स वे जटिल कार्बनिक पदार्थ हैं जो पेड़-पौधों में निश्चित स्थानों पर बनते हैं तथा संवहन ऊतकों द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में संचरित होकर उनकी वृद्धि को नियन्त्रित करते हैं।
पादप हॉर्मोन मुख्यतः विभज्योतक कोशिकाओं और नई उगती पत्तियों एवं फलों में स्स्रावित होते हैं।
पादप हॉर्मोन्स की मुख्य विशेषताएँ
1. ये जड़, तना एवं कलिका के शीर्षस्थ विभज्योतक में बनते हैं तथा फ्लोएम में से होकर अन्य अंगों में पहुँचते हैं और सभी भागों में विसरित होकर वृद्धि का नियन्त्रण करते हैं।
2. इन्हें पौधों से निष्कासित किया जा सकता है।
3. ये पादप वृद्धि तथा वृद्धिरोधन को नियन्त्रित करते हैं।
4. सामान्य से कम या अधिक मात्रा में होने पर इनका उल्टा प्रभाव पड़ता है।
5. ये कार्बनिक प्रकृति के होते हैं।
6. ये अति अल्प मात्रा में ही प्रभावशील होते हैं।
पादप हॉर्मोन्स का वर्गीकरण पादप हॉमॉन्स को मुख्यतः दो वर्गों में बाँटते हैं-
(i) वृद्धि प्रवर्धक जो वृद्धि की दर को बढ़ाते हैं।
उदाहरणार्थ: जिबरेलिन, साइटोकाइनिन ।
(ii) वृद्धि निरोधक जो वृद्धि की दर को कम करते हैं।
 उदाहरणार्थ : एब्सिसिक अम्ल, एथिलीन।
View full question & answer