आशनिकता आधुनिकता का अर्थ है-नए जमाने के अनुसार जीना। पाषाण-युग से लेकर आज तक मनुष्य-जीवन गतिशील है। आगे भी यह प्रगति निरंतर चलती रहेगी। जिस प्रकार एक हजार साल पुरानी चीजें हमारे लिए खंडहर हो चुकी हैं। सौ साल पुरानी चीजें भी बेकार हो चुकी हैं। दस साल पुराने साधन भी धीरे-धीरे अनुपयोगी होते जा रहे हैं। कारण यह है कि आज उनसे भी अधिक उपयोगी साधन हमारे सामने आ चुके हैं। मनुष्य का स्वभाव है कि वह नई उपयोगी चीजों की ओर आकर्षित होता है और पुरानी चीजों को बेकार समझकर छोड़ देता है।
पनी संस्कति त्याज्य नहीं पुराने साधन तो पुराने पड़ सकते हैं, किंतु पुराने लोग, पुराने रिश्ते, पुराने भाव और विचार आवश्यक नहीं कि त्याज्य हों। मनुष्य प्राचीन काल से जिन आदतों, भावनाओं और आदर्शों को निभाता आया है, उनमें आज भी उपयोगी आदतें बची हुई हैं। उदाहरणतया, भरे-पूरे परिवार में रहना, माता-पिता का सम्मान करना, ईश्वर की भक्ति करना, बड़ों को आदर और छोटों को स्नेह देना हमारे पुराने संस्कार हैं। बोकी परंपरा बहुत पुरानी है। ये परंपराएँ आज भी शुभ हैं। इन्हें छोड़ना नहीं चाहिए। जिन लोगों ने अपनी प्रगति के लिए बूढ़े माता-पिता को त्यागा है, उन्होंने अपना तथा माता-पिता का अहित ही किया है।
पाश्चात्य संस्कृति आधुनिक नहीं – आवश्यक नहीं कि पाश्चात्य संस्कृति आधुनिक हो। पायजामे की जगह कटी-छटी एंप्री पहनना, ब्लाउज की बजाय स्लीवलैस टॉप पहनना, साड़ी की जगह जींस पहनना, दादी की बजाय फ्रैंच-कट रखना-पाश्चात्य संस्कृति की निशानियाँ तो हो सकती हैं किंतु आधुनिक होने की नहीं। दूध-छाछ की जगह कोक पीने से और रोटी-मक्खन की जगह पीजा-बर्गर खाने से कोई आधुनिक नहीं हो सकता। आधुनिक तो वह है जो अपने देश और परिस्थिति के अनुकूल धोती-कुर्ता, लस्सी, सत्तू आदि को भी अपनाने में शर्म न करे। भला, गर्म देश में कोट-पेंट, टाई कैसे आधुनिक हो सकती है?
भारतीय संस्कृति-भापनिकता की मांग भारतीय संस्कृति कभी पुरानी नहीं पड़ती। कारण यह है कि वह सबको उदारतों का पाठ पढ़ाती है। वह धर्म, देश, प्रांत के भेद भुलाकर सबको आगे बढ़ने का अवसर देती है। वह कभी किसी विदेश पर आक्रमण नहीं करती। वह विदेशी आक्रमणकारी पर भी बम न चलाकर उसे अहिंसापूर्वक बाहर निकालती है। यह शांति का मार्ग है। इसी से यह नया विश्व जीवित रह सकता है। सर्वे भवन्तु सुखिनः, वसुधैव कुटुम्बकम्, अहिंसा आदि ऐसी बातें भारतीय संस्कृति में आज भी जीवित हैं जो पुरानी होते हुए भी नई हैं और आज की माँग हैं। यही कारण है कि आज अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में गीता को पढ़ाना अनिवार्य कर दिया गया है। गीता पुराना ग्रंथ होते हुए भी अत्याधुनिक है। इसी से विश्व-शांति बची रह सकती है। अत: भारतीयों को अगर आधुनिक होना है तो वे पाश्चात्य संस्कृति नहीं, भारतीय संस्कृति को अपनाएँ।