2. बाल - विवाह की कुप्रथा - इस कुप्रथा का प्रचलन मध्यकाल में हुआ। भारतीय समाज में कन्या का बालपन में ही विवाह रचाना उचित समझा जाने लगा। दहेज - प्रथा के कारण भी बाल - विवाह का प्रचलन हुआ। बालक - बालिका पूर्णतया नासमझ रहने से अपने विवाह - संस्कार का विरोध भी नहीं कर पाते और अधिक दहेज भी नहीं देना पड़ता, इसी कारण बाल - विवाह की कुप्रथा निम्न - मध्यम वर्ग में विशेष रूप से प्रचलित हुई।
3. बाल - विवाह का अभिशाप - बाल - विवाह की कुप्रथा से समाज में अनेक समस्याओं का जन्म हुआ। छोटी अवस्था में ही विवाह होने से स्त्रियों में अशिक्षा, अज्ञान, अन्धविश्वास आदि के साथ बाल - विधवा होना आदि समस्याएँ सामने आती हैं। अबोध अवस्था में विवाहित वर - वधू को भविष्य में आपसी कलह का शिकार होना पड़ता है, कभी तलाक हो जाता है तथा अवयस्क अवस्था में ही सन्तानोत्पत्ति होने लगती है। जनसंख्या की असीमित वृद्धि का एक कारण यह भी है। इन सब बुराइयों को देखने से बाल - विवाह हमारे समाज के लिए एक अभिशाप ही है।
4. समस्या के निवारणार्थ उपाय - बाल - विवाह की बुराइयों को देखकर समय - समय पर समाज - सुधारकों ने जन - जागरण के उपाय किये। भारत सरकार ने इस सम्बन्ध में कठोर कानून बनाया है और अठारह वर्ष से कम आयु की कन्या तथा इक्कीस वर्ष से कम आयु के युवक के विवाह को कानूनन सामाजिक अपराध घोषित किया गया है। फिर भी बाल - विवाह निरन्तर हो रहे हैं। अकेले राजस्थान के गाँवों में बैसाख मास की अक्षय तृतीया को हजारों बाल - विवाह होते हैं। इस समस्या का निवारण कठोर कानून तथा समाज - सुधारकों को भी इस दिशा में भरसक प्रयास करना चाहिए।
5. उपसंहार - बाल - विवाह ऐसी कुप्रथा है, जिससे वर - वधू का भविष्य अन्धकारमय बन जाता है। इससे समाज में कई विकृतियाँ आ जाती हैं। अतः इस कुप्रथा का निवारण अपेक्षित है, तभी समाज को इस अभिशाप से मुक्त कराया जा सकता है।
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