2. राजनीति का स्वरूप - वर्तमान समय में राजनीति का वास्तविक स्वरूप सक्रिय राजनीति से है। इसके अनुसार किसी राजनीतिक दल का गठन करना या किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर लोक - प्रतिनिधि के लिए चुनाव लड़ना सक्रिय राजनीति मानी जाती है। परन्तु विद्यार्थी जीवन में जिस राजनीति का ज्ञान दिया जाता है उसका उद्देश्य छात्रों को जनतान्त्रिक शासन व्यवस्था का ज्ञान कराना है, उनमें संविधान में प्रदत्त अधिकारों के उपयोग की चेतना उत्पन्न करना है। इस प्रकार विद्यार्थी जीवन में राजनीति का आशय लोकतन्त्र की शिक्षा देना है।
3. विद्यार्थियों के लिए राजनीति का औचित्य - जहाँ तक जनतान्त्रिक शासन - व्यवस्था के प्रति राजनीतिक चेतना जागृत करना तथा संसदीय प्रणाली का ज्ञान प्राप्त करना है, वहाँ तक विद्यार्थियों के लिए राजनीति उचित है, क्योंकि उस क उनके लिए वह पाठय - विषय ही है। लेकिन जब विद्यार्थी दलगत राजनीति की गतिविधियों में भाग लेने लग जाते हैं, तो वे नियमित अध्ययन से विमुख होने लगते हैं। तब वे विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़कर स्वार्थ साधने में प्रवृत्त हो जाते हैं। उस दशा में वे कुचक्री नेताओं के चक्कर में आकर हड़ताल, तोड़फोड़ आदि कार्यों में भाग लेते हैं। इस दृष्टि से विद्यार्थियों के लिए सक्रिय राजनीति उचित नहीं है।
4. विद्यार्थियों के कर्त्तव्य - विद्यार्थी जीवन मानव के विकास की आधारशिला है। इसलिए जब विद्यार्थी अपने सामने उच्च आदर्शों और लक्ष्यों को निर्धारित कर तदनरूप शिक्षा ग्रहण करेंगे, तब निःसन्देह उनका भावी जीवन प्रशस्त होगा। इसलिए उनका प्रमुख कर्त्तव्य यह है कि वे अपने विद्या मंन्दिरों को भ्रष्ट राजनीति से बचाकर रखें और छात्र संघों के गठन को मात्र राजनैतिक चेतना की शिक्षा मानें। वे अपना जीवन सफल बनाने तथा सच्चरित्रों को अपनाने में ही विशेष रुचि रखें।
5. उपसंहार - अतएव संक्षेप में कहा जा सकता है कि जहाँ तक विद्यार्थियों में राजनैतिक चेतना और जनतान्त्रिक शासन - व्यवस्था के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने का प्रश्न है, वहाँ तक उन्हें छात्र - संघों के द्वारा अपने विचारों को परिपक्व बनाना चाहिए। परन्तु उन्हें सक्रिय राजनीति से सदा दूर ही रहना चाहिए।
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