बुद्धि के सिद्धान्तों का प्रतिपादन उसके तत्वों के आधार पर किया गया है, जो निम्नलिखित हैं-
(1) एकतत्व सिद्धान्त - बुद्धि में केवल एक ही तत्व को स्वीकार किया जा सकता है जिसका स्वरूप अविभाज्यता एवं अखंडता है। इस सिद्धान्त में बुद्धि को एक इकाई के रूप में माना गया है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक बिने, टरमैन और स्टर्न हैं। इनके अनुसार बुद्धि को बाँटा नहीं जा सकता है, बुद्धि सर्वशक्तिमान है जो कि सभी मानसिक शक्तियों को अपने अधीन रखती है।
(2) द्वितत्व के सिद्धान्त - इस सिद्धान्त को स्पीयरमैन ने प्रतिपादित किया है। इनके अनुसार बुद्धि को दो वर्गों में विभाजित किया गया है जिनमें एक सामान्य बुद्धि तथा दूसरा विशिष्ट बुद्धि है। मूलतः बुद्धि सामान्य कार्यों को सामान्य तत्व द्वारा तथा विशिष्ट कार्यों को विशिष्ट तत्व द्वारा सम्पन्न करती है। उदाहरण के लिए; संगीत एवं विज्ञान को सीखने में S Factor की अधिक मात्रा होती है जबकि भूगोल एवं अंग्रेजी में G Factor की मात्रा अधिक होगी। एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक होने के लिए G : S = 1 : 4 होना चाहिए। स्पीयरमैन G को मानसिक शक्ति मानता है। बुद्धि के सामान्य तत्व के गुण (क) जन्मजात होते हैं, (ख) सदा एक समान होते हैं।
(3) बहुतत्व सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार बुद्धि में एक या दो तत्व नहीं होते बल्कि बुद्धि विभिन्न बौद्धिक योग्यताओं का समन्वित रूप है। इस सिद्धान्त को मनोवैज्ञानिक थर्स्टन ने प्रतिपादित किया है। बुद्धि की कोई योग्यता स्वतन्त्र न होकर परस्पर समन्वित होती है।
(4) समूह खण्ड सिद्धान्त- ब्रिटेन के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक स्पीयरमैन ने बुद्धि के द्वितत्व सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। उन्होंने इस सिद्धान्त में यह समझाने का प्रयास किया है कि बुद्धि कितने कारकों या तत्वों से मिलकर बनी है। अपने अध्ययनों के आधार पर उन्होंने बुद्धि के दो कारकों या तत्वों का उल्लेख किया है।