गब्बारे पर अंकित व्यापार मेला- मुझे सन् 2006 में प्रगति मैदान, दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला देखने का अवसर मिला। मेले का विज्ञापन करने के लिए आकाश में एक विशाल गैसीय गुब्बारा ताना गया था। जिस पर बड़े-बड़े शब्दों में ‘व्यापार मेला’ लिखा था।
मख्य द्वार- व्यापार मेले में प्रवेश करने के कई द्वार थे। मैं जिस द्वार से गया, उसके बाहर टिकट लेने वालों की सर्पाकार लंबी पंक्ति थी। वह पंक्ति बहुत अनुशासित थी। इसलिए शीघ्र ही प्रवेश का मौका मिल गया। मुख्य द्वार और मार्ग को विविध कलात्मक सज्जाओं से सजाया गया था। हमें दूर से ही बीसियों मोटे-मोटे नाम दिखाई दिए—आसाम, हरियाणा, मध्य प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, केस्ल, जापान, अमेरिका, पाकिस्तान आदि।
जर्मनी का मंडप- मैं इन रंगीनियों में खोया हुआ ही,था कि अचानक स्वयं को एक मंडप में खड़ा पाया। यह जर्मनी का मंडप था। इसमें विविध आधुनिकतम सज्जाओं के साथ उस देश की प्रगति को दर्शाया गया था।
घडियों वाला मंडप – आगे हाल ऑफ नेशंस के साथ एक छोटा भवन था जिसमें विश्वभर की घड़ियों की प्रदर्शनी लगी थी। अंदर जाकर विविध घड़ियों के मंडपों को देखा तो हैरान रह गया। एक-से-एक श्रेष्ठ गुणवत्ता वाले टाइमपीस, क्लॉक तथा कलाई घड़ियों ने मन मोह लिया। मैंने भी एक अलार्म घड़ी खरीदी।
हरियाणा का मंडप- हरियाणा का मंडप देखने के लिए मुझे काफी दूर जाना पड़ा। लेकिन उस दूरी का अनुभव भी मनमोहक था। ऐसा लगता था जैसे सारी दिल्ली सज-धजकर उधर आ… उमड़ी हो। कई मीलों में फैले प्रगति मैदान की सड़कें शाम ढल आने पर रंगीन हो उठी थीं। आश्चर्य यह कि कहीं कोई भगदड़ नहीं, शोर-शराबा नहीं, बल्कि ऐसी मंथर गति, जैसे संध्या के समय समुद्र मस्ती में लहरें ले रहा हो। मुझे बहुत अच्छा लगा।
वापसी- रात घिर आई थी। मैं वापसी के लिए द्वार पर चला। आगे देखा—हजारों लोग एक ऊँचे स्थान पर मजमा लगाए खड़े हैं पता चला कि कोई नाटक-कंपनी नाटक खेल रही है। वहीं बहुत लंबी पंक्ति देखी जिसमें फैशन-शो देखने के इच्छुक लोग टिकट लेने के लिए खड़े थे। मन हटता ही न था। जैसे-तैसे बाहर पहुँचा तो मुड़कर फिर से व्यापार मेले की ओर देखा। रोशनी में जगमगाता हुआ मेला दुलहन की तरह सजकर खड़ा था।