मानव श्वसन की क्रियाविधि: सामान्यतः हम अपने नथुनों (नासाद्वार) से वायु अंदर लेते हैं। जब हम वायु को अंत:श्वसन द्वारा अंदर लेते हैं, तो यह हमारे नथुनों से नासा गुहा में चली जाती है। नासा गुहा से वायु, श्वास नली से होकर हमारे फेफड़ों (फुफ्फुस) में जाती है। फेफड़े वक्ष-गुहा में स्थित होते हैं। वक्ष - गुहा पार्श्व में पसलियों से घिरी रहती है। एक बड़ी पेशीय परत, जो
डायाफ्राम: (मध्यपट) कहलाती है, वक्ष - गुहा को आधार प्रदान करती है। श्वसन में डायाफ्राम और पसलियों से बने पिंजर की गति सम्मिलित होती है। अंतःश्वसन के समय पसलियाँ ऊपर और बाहर की ओर गति करती हैं और डायाफ्राम नीचे की ओर गति करता है। यह गति हमारी वक्ष - गुहा के आयतन को बढ़ा देती है और वायु फेफड़ों में आ जाती है। फेफड़े वायु से भर जाते हैं। उच्छ्व सन के समय पर्सलियाँ नीचे और अन्दर की ओर आ जाती हैं, जबकि डायाफ्राम ऊपर की ओर अपनी पूर्व स्थिति में आ जाता है। इससे वक्ष - गुहा का आयतन कम हो जाता है। इस कारण वायु फेफड़ों से बाहर धकेल दी जाती है। इस प्रकार श्वसन की क्रियाविधि पूरी होती है।
RBSE Class 7 Science Important Questions Chapter 10 जीवों में श्वसन 3