2. प्रिय होने का आधार - रामचरितमानस में मार्मिक स्थलों का वर्णन तल्लीनता से हुआ है। राम - वनवास, दशरथ - मरण, सीता - हरण, लक्ष्मण - मूर्छा, भरत - मिलन आदि के प्रसंग दिल को छूने वाले हैं। रामचरितमानस जहाँ भारत के समस्त वाङ्गमय का सार है, वहाँ आदर्शों का भण्डार है। यह साहित्य और धर्म दोनों क्षेत्रों में अपना महत्त्व रखता है। इस कथा में आदर्श पिता दशरथ हैं तो राम - लक्ष्मण, भरत - शत्रुघ्न जैसे आदर्श पुत्र हैं।
यदि सीता जैसी आदर्श पत्नी है, तो राम जैसे एक पत्नीव्रत के पालक आदर्श पति हैं। राम - लक्ष्मण जैसे भाई हैं। भरत जैसा भाई तो अन्यत्र खोजने पर भी नहीं मिलेगा। हनुमान जैसा आदर्श सेवक, सुग्रीव व विभीषण जैसे मित्र और कहाँ मिलेंगे। रावण जैसा शत्रु भी यहाँ आदर्श से च्युत नहीं होता। वह श्रीराम से शत्रुता अवश्य करता है लेकिन वह सीता को अशोक वाटिका में ससम्मान रखता है। इसके साथ ही इस ग्रंथ में भारत की अखण्डता का प्रतिपादन किया गया है।
रामचरितमानस भाव व कला पक्ष की दृष्टि से भी अनुपम ग्रन्थ है। यह भक्ति का भी अनुपम ग्रंथ है। संभवतः संसार के किसी भी ग्रंथ का इतना पठन - पाठन नहीं होता जितना रामचरितमानस का होता है। इस कारण अनेक विशेषताओं के कारण यह ग्रन्थ मुझे सर्वाधिक प्रिय है।
3. पुस्तक का संदेश - यह पुस्तक केवल धार्मिक महत्त्व की नहीं है। इसमें मानव को प्रेरणा देने की असीम शक्ति है। इसमें राजा - प्रजा, स्वामी, दास, मित्र, पति - पत्नी, स्त्री - पुरुष सभी को अपना जीवन उज्ज्वल बनाने की शिक्षा दी गई है। इतना ही नहीं तुलसीदास ने प्रायः जीवन के सभी पन्नों पर सूक्तियाँ लिखी हैं। उनके इन अनमोल वचनों के कारण यह पुस्तक अमरता को प्राप्त हो गई है। .
4. उपसंहार - तुलसीदास द्वारा रचित अमर ग्रंथ 'रामचरितमानस' के महत्त्व को देश के ही नहीं विदेशी विद्वानों ने भी स्वीकार किया है। एक विद्वान के अनुसार - "रामचरितमानस उत्तरी भारत का सबसे लोकप्रिय ग्रंथ है और इसने जीवन के समस्त क्षेत्रों में उच्चाशयता लाने में सफलता पाई है।" इतना ही नहीं इसके महत्त्व के संबंध में माता प्रसाद गुप्त ने कहा है - "रामचरितमानस ने समस्त उत्तरी भारत पर सदियों से अपना प्रभाव डाल रखा है। और यहाँ के आध्यात्मिक जीवन का निर्माण किया है।"
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