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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न [5M]

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Question 15 Marks
अन्तर्मुखी तथा बहिर्मुखी व्यक्तित्व में अन्तर स्पष्ट करें।
Answer
युंग ने व्यक्तित्व को दो भागों में विभाजित किया है-
(i) अन्तर्मुखी व्यक्तित्व , (ii) बहिर्मुखी व्यक्तित्व ।
(i) अन्तर्मुखी व्यक्तित्व - ऐसे लोग बाह्य विश्व या समूह से अपने को हटाकर एकान्त जीवन पसन्द करते हैं। भावुकता इनमें अधिक होती है तथा अपनी आलोचनाओं को सहने की शक्ति कम होती है। अधिकांश दार्शनिक तथा कलाकार अन्तर्मुखी व्यक्तित्व के होते हैं।
(ii) बहिर्मुखी व्यक्तित्व - ऐसे लोग व्यवहारकुशल होते हैं। ऐसे व्यक्ति संस्था एवं समूह का जीवन पसन्द करते हैं। आमतौर से राजनीतिक नेता एवं समाज-सुधारक तथा सेना एवं पुलिस के अधिकारी बहिर्मुखी व्यक्तित्व के होते हैं।
फ्रीडमैन एवं रोजेनमैनने टाइप 'ए' तथा टाइप 'बी' इन दो प्रकार के व्यक्तित्वों में लोगों को विभाजित किया है। इन दोनों अध्ययनकर्ताओं ने मनो-सामाजिक जोखिम वाले कारकों का अध्ययन करते हुए इन प्ररूपों की खोज की है। टाइप 'ए' व्यक्तित्व वाले लोगों में उच्चस्तरीय अभिप्रेरणा, उतावलापन तथा कार्य के बोझ से सदैव लदे रहने का अनुभव, धैर्य की कमी, समय की कमी का अनुभव करना पाया जाता है। ऐसे लोग निश्चिन्त होकर मन्दगति से कार्य करने में जटिलता का अनुभव करते हैं। टाइप 'ए' के अन्तर्गत आने वाले लोग अतिरिक्त दाब एवं कॉरोनरी हृदय रोग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इस प्रकार के लोगों में कभी-कभी उच्च रक्तदाब, सी. एच. डी. के विकसित होने का खतरा, धूम्रपान एवं उच्च कोलेस्ट्रॉल स्तर उत्पन्न होने वाले खतरों की अपेक्षा अधिक होता है। दूसरी ओर टाइप 'बी' व्यक्तित्व को टाइप 'ए' व्यक्तित्व की विशेषताओं के अभाव के रूप में समझा जाता है। मॉरिस ने एक टाइप 'सी' व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है। उनके अनुसार जो कैंसर जैसे रोग के प्रति संवेदनशील होता है ऐसे व्यक्तित्व वाले लोग धैर्यवान, विनीत एवं सहयोगशील होते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने संवेगों (जैसे-क्रोध) को रोकने वाले तथा आप्त व्यक्तियों के प्रति आज्ञा को मानने वाले होते हैं। नवीन शोधों में एक टाइप 'डी' व्यक्तित्व का सुझाव भी दिया गया है। ऐसे व्यक्तित्व वाले लोगों में अवसाद हेतु प्रवणता पाई जाती है।
उपरोक्त व्यक्तित्व के प्रारूप सामान्यतया आकर्षित करने वाले हैं अपितु वे बहुत सरल हैं। मानव व्यवहार अत्यधिक परिवर्तनशील व कठिन होता है। लोगों को किसी एक विशेष व्यक्तित्व प्रारूप में विभाजित करना जटिल होता है। उपरोक्त सरल वर्गीकरण योजना में स्पष्टता के साथ लोगों को विभाजित करना पूरी तरह सम्भव नहीं है।
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Question 25 Marks
स्व से आप क्या समझते हैं? स्व के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करें।
Answer
स्व का मतलब होता है स्वयं की पहचान, स्वयं का व्यक्तित्व अर्थात् जो भी कुछ व्यक्ति है। स्व को इस तरह से भी परिभाषित किया जा सकता है-जैसे मैं इस तरह का व्यक्ति हूँ और ये मेरी खूबियाँ तथा कमजोरियाँ हैं। इस तरह स्वः किसी व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की ओर संकेत करता है।
स्व के प्रकार - स्वः मुख्यतः दो प्रकार का होता है-
(1) व्यक्तिगत स्व - इसमें एक ऐसा आभाष होता है जिसमें व्यक्ति मुख्य रूप से अपने विषय में ही सम्बन्ध होने का अनुभव करता है। जैसे कि जैविक आवश्यकताएँ 'जैविक आत्म' को कैसे विकसित करती हैं? अपितु शीघ्र ही बच्चे की उसके पर्यावरण में मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक आवश्यकताएँ उसके व्यक्तिगत आत्म के रूप में उत्पन्न होने लगती है किन्तु इसमें जीवन के उन पक्षों पर बल होता है जो उस व्यक्ति से जुड़ी होती है, जैसे- व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, व्यक्तिगत उत्तरदायित्व, व्यक्तिगत उपलब्धि, व्यक्तिगत सुख-सुविधाएँ आदि।
(2) सामाजिक स्व - इसका अभिप्रायः मुख्यतः दूसरों के सम्बन्ध में होता है जिसके अन्तर्गत, सहयोग, एकता, सम्बन्धन, त्याग, समर्थन अथवा भागीदारी जैसे जीवन के प्रमुख पक्षों की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है। इस प्रकार सामाजिक स्व, परिवार तथा सामाजिक सम्बन्धों को महत्व देता है अतः इसे सम्बन्धात्मक स्व के रूप में भी जाना जाता है।
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Question 35 Marks
व्यक्तित्व के पाँच शील गुणों का वर्णन करें।
Answer
व्यक्तित्व के पाँच शील गुण
कुछ वर्षों में आधारभूत व्यक्तित्व विशेषकों की संख्या को लेकर उत्पन्न हुए मतभेदों से एक रुचिकर दिशा परिवर्तन हुआ है। पॉल कॉस्टा तथा राबर्ट मैक्रे ने सभी सम्भावित व्यक्तित्व विशेषकों की जाँच पर पाँच कारकों के एक समुच्चय के विषय में जानकारी दी है। इनको वृहत् पाँच कारकों के रूप में जाना जाता है। ये पाँच कारक निम्नलिखित हैं-
(i) अनुभवों के लिए खुलापन- जो लोग इस कारक के अन्तर्गत अधिक अंक प्राप्त करते हैं वे उत्सुक, कल्पनाशील, सांस्कृतिक क्रियाकलापों एवं नए विचारों के प्रति उदारता में अभिरुचि लेने वाले व्यक्ति होते हैं। दूसरी ओर कम अंक पाने वाले व्यक्तियों में अनन्यता पाई जाती है।
(ii) बहिर्मुखता - यह विशेषता ऐसे लोगों में विद्यमान होती है जिनमें आग्रहिता, सामाजिक सक्रियता, बातूनीपन, बहिर्गमन और आमोद-प्रमोद हेतु पसन्दगी पाई जाती है। दूसरी ओर ऐसे लोग होते हैं जो संकोची होते हैं।
(iii) सहमतिशीलता - यह कारक उन लोगों की विशेषताओं को बताता है जिनमें सहयोग करने, मैत्रीपूर्ण व्यवहार करने, सहायता करने, पोषण करने एवं देखभाल करने जैसे व्यवहार शामिल होते हैं। दूसरी ओर ऐसे लोग होते हैं जो आक्रामक और आत्म-केन्द्रित होते हैं।
(iv) तन्त्रिकाताप-इस कारक के अन्तर्गत अधिक अंक प्राप्त करने वाले लोग सांवेगिक रूप से परेशान, भयभीत, दुश्चितित, अस्थिर, चिड़चिड़े, तनावग्रस्त और दुःखी होते हैं। इससे विपरीत प्रकार के लोग सुसमायोजित होते हैं।
(v) अन्तर्विवेकशीलता- इसके अन्तर्गत अधिक अंक पाने वाले लोगों में उपलब्धि-उन्मुखता, उत्तरदायित्व, निर्भरता, कर्मठता, दूरदर्शिता और आत्म-नियन्त्रण पाया जाता है। दूसरी ओर कम अंक पाने वाले लोगों में आवेग पाया जाता है।
व्यक्तित्व के क्षेत्र में यह पंच-कारक मॉडल एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त विकसित करते हैं। अनेक संस्कृतियों में लोगों के व्यक्तित्व को समझने हेतु यह मॉडल अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ है।
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Question 45 Marks
शेल्डन और युंग के द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व के प्ररूप का संक्षेप में वर्णन कीजिए।###शेल्डन के अनुसार व्यक्तित्व के प्रकारों का वर्णन करें।
Answer
मनोवैज्ञानिक शेल्डन द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व के प्ररूप मनोविज्ञान में सर्वविदित हैं। शेल्डन ने शारीरिक बनावट तथा स्वभाव को आधार बनाते हुए व्यक्तित्व के प्रारूप को गोलाकृतिक, आयताकृतिक तथा लम्बाकृतिक व्यक्तित्व रूप में प्रस्तावित किया है। गोलाकृतिक प्ररूप वाले व्यक्ति मोटे मृदुल और गोल होते हैं, स्वभाव में गोलाकृतिक प्ररूप के व्यक्ति शिथिल तथा मिलनसार होते हैं। आयताकृतिक प्ररूप वाले व्यक्ति मजबूत एवं सुगठित शरीर वाले होते हैं, जो देखने में आयताकार लगते हैं। आयताकृतिक प्ररूप वाले व्यक्ति ओजस्वी तथा साहसी होते हैं। लम्बाकृतिक प्ररूप वाले व्यक्ति लम्बे तथा सुकुमार होते हैं। ऐसे व्यक्ति कुशाग्र बुद्धि वाले होते हैं।
यह बात सत्य है कि व्यक्तित्व के ये सभी शारीरिक प्ररूप सरल, किन्तु व्यक्तियों के व्यवहारों के विषय में भविष्यवाणी करने में उपयोगी सिद्ध होते हैं। वैसे तो व्यक्तित्व के ये सभी प्ररूप रूढ़िवादी धारणाओं की तरह ही होते हैं जो सभी लोग उपयोग करते हैं। व्यक्तित्व का एक अलग प्ररूप मनोवैज्ञानिक युंग ने प्रस्तुत किया जिसके अन्तर्गत युंग ने व्यक्ति को दो वर्गों अन्तर्मुखी तथा बहिर्मुर्खी में विभाजित किया है। इस प्ररूप को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है। इस प्ररूप के अनुसार अन्तर्मुखी व्यक्तित्व वाले वह लोग होते हैं जो अकेला रहना पसन्द करते हैं अर्थात् भीड़ से या दूसरे व्यक्तियों से बचते हैं और स्वभाव से शर्मीले होते हैं। बहिर्मुखी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति सामाजिक तथा बहिर्गामी होते हैं और मुख्यतः ऐसे व्यवसायों का चयन करते हैं जिसके अन्तर्गत वह काफी सारे लोगों के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध बनाए रखें। ऐसे व्यक्तित्व वाले लोग काफी भीड़ के बीच में रहते हुए और सामाजिक कार्यों को करते हुए दबावों के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं।
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Question 55 Marks
व्यक्तित्व के मूल्यांकन से क्या अभिप्राय है? सविस्तार समझाइये।
Answer

व्यक्तित्व का मूल्यांकन


प्रायः जब हम किसी नये व्यक्ति के सम्पर्क में आते हैं तो उसे जानने का प्रयास करते हैं, साथ ही उसे जानने से पहले ही अपनी एक राय बना लेते हैं कि वह क्या कर सकता है। सामान्यतः मनुष्य व्यक्तिगत जीवन में अपने पूर्वानुभवों, प्रेक्षणों, वार्तालापों और अन्य लोगों से प्राप्त सूचनाओं पर विश्वास करते हैं। इस उपागम के अन्तर्गत दूसरों को समझना विभिन्न कारकों से प्रभावित हो सकता है जो हमारे निर्णयों को अतिरंजित कर वस्तुनिष्ठता को कम कर सकते हैं। अतः व्यक्तित्वों का विश्लेषण करने के लिए हमें अपने प्रयत्नों को अत्यधिक औपचारिक रूप से संगठित करने की जरूरत होती है। किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को समझने हेतु सोद्देश्य औपचारिक प्रयास को व्यक्तित्व मूल्यांकन कहते हैं।
मूल्यांकन का लक्ष्य लोगों के व्यवहारों को कम त्रुटि तथा अधिकतम परिशुद्धता के साथ समझना एवं उनकी भविष्यवाणी करना होता है। मूल्यांकन का अर्थ उन प्रक्रियाओं से है जिनका प्रयोग कुछ विशेषताओं के आधार पर लोगों के मूल्यांकन या उनके बीच विभेदन हेतु किया जाता है। मूल्यांकन के अन्तर्गत किसी विशेष स्थिति में व्यक्ति सामान्य तौर पर कौन-सा व्यवहार करता है? तथा कैसे करता है? हम यह समझने का प्रयत्न करते हैं। प्रशिक्षण मानव समझ को उन्नत करने के अतिरिक्त स्थानन, मूल्यांकन, निदान, परामर्श एवं दूसरे उद्देश्यों हेतु भी अधिक उपयोगी है।
मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने का प्रयत्न विभिन्न ढंगों से किया है। सबसे अधिक प्रयोग की जाने वाली तकनीकों के अन्तर्गत मनोमितिक परीक्षण, आत्म-प्रतिवेदन माप, प्रक्षेपी तकनीकें तथा व्यवहार- परक विश्लेषण आते हैं। इन तकनीकों के द्वारा व्यक्तित्व के अनेक पक्षों के विषय में जानकारी मिलती है।

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Question 65 Marks
व्यक्तित्व आत्म और सामाजिक आत्म में अन्तर करें।
Answer
व्यक्तिगत आत्म एवं सामाजिक आत्म के बीच अन्तर
व्यक्तिगत आत्म - इसमें एक ऐसा आभास होता है जिसमें व्यक्ति मुख्य रूप से अपने बारे में ही सम्बद्ध होने का अनुभव करता है। जैसे कि अभी हम लोगों ने पढ़ा कि जैविक आवश्यकताएँ जैविक आत्म को कैसे विकसित करती। अपितु शीघ्र ही बच्चे की उसके पर्यावरण में मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आवश्यकताएँ उसके व्यक्तिगत आत्म के रूप में उत्पन्न होने लगती हैं। किन्तु इन पंक्तियों में जीवन के उन पक्षों पर बल होता है जो उस व्यक्ति से जुड़ी होती हैं; जैसे- व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, व्यक्तिगत उत्तरदायित्व, व्यक्तिगत, उपलब्धि, व्यक्तिगत सुख-सुविधाएँ आदि ।
सामाजिक आत्म - इसका स्पष्टीकरण प्रायः दूसरों के सम्बन्ध में होता है जिसके अन्तर्गत सहयोग एकता सम्बन्धन, त्याग, समर्थन अथवा भागीदारी जैसे जीवन के प्रमुख पक्षों की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है। इस प्रकार आत्म परिवार और सामाजिक सम्बन्धों को महत्व देता है अतः इस आत्म को पारिवारिक अथवा सम्बन्धात्मक आत्म के रूप में भी जाना जाता है।
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Question 75 Marks
व्यक्तित्व को आप किस प्रकार परिभाषित करते हैं? व्यक्तित्व के अध्ययन के प्रमुख उपागमों को बताइये।
Answer
सामान्यतः व्यक्तित्व का तात्पर्य व्यक्ति के बाहरी शारीरिक तथा उसके व्यवहार से होता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्तित्व से तात्पर्य उन सभी विशिष्ट तरीकों से है जिनके माध्यम से व्यक्तियों तथा स्थितियों के प्रति अनुक्रिया की जाती है। हम सभी इस बात का आसानी से प्रस्तुतीकरण कर सकते हैं कि हम किस प्रकार से विभिन्न परिस्थितियों के प्रति अनुक्रिया करते हैं? कुछ शब्दों; जैसे-शर्मीला, चुगलखोर, गम्भीर, शान्त आदि का प्रयोग व्यक्तित्व की विषय वस्तु बताने में किया जाता है। यह सभी शब्द व्यक्तित्व के अलग-अलग घटकों को इंगित करते हैं। इसके आधार पर व्यक्तित्व से तात्पर्य उन अनन्य एवं सापेक्ष गुणों से है जो एक समय अवधि के अन्तर्गत विभिन्न परिस्थितियों में व्यक्ति के व्यवहार की विशिष्टता प्रकट करते हैं। व्यक्तित्व व्यक्तियों की उन विशेषताओं को भी कहते हैं, जो निम्न परिस्थितियों में व्यक्ति के व्यवहार से प्रकट होती हैं।
व्यक्तित्व के प्रमुख उपागम
व्यक्तित्व का अध्ययन अपने आप में अत्यधिक व्यापक गम्भीर तथा बहुपक्षीय अध्ययन है। व्यक्तित्व में अत्यधिक व्यक्तिगत भिन्नताएँ पाई जाती हैं। एक ही माता-पिता की दो सन्तानों के व्यक्तित्व का विकास भी पर्याप्त भिन्न रूप में हो सकता है। यहीं नहीं दो जुड़वा बच्चों के व्यक्तित्व में भी भिन्नता देखी जा सकती है। मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व के व्यक्तित्व तथा सम्बन्धित व्यवहारों में पाई जाने वाली भिन्नता तथा संगति को समझने के लिए तथा उसकी व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए विभिन्न उपागम तथा सिद्धान्त प्रतिपादित किए हैं। ये सिद्धान्त मानवीय व्यवहार के भिन्न-भिन्न मॉडलों पर आधारित हैं। व्यक्तित्व के प्रमुख उपागम निम्नलिखित हैं :
(1) प्ररूप उपागम, (2) विशेषक उपागम, (3) मनोगतिक उपागम, (4) पश्च-फ्रायडवादी उपागम, (5) व्यवहारवादी उपागम, (6) सांस्कृतिक उपागम, (7) मानवतावादी उपागम।
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Question 85 Marks
व्यक्तित्व के शीलगुण उपागम का संक्षिप्त वर्णन करें।
Answer
व्यक्तित्व का शीलगुण उपागम- इस उपागम की स्थापना गॉर्डन ऑलपोर्ट ने की थी। इसे विशेषक सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है। यह मानव व्यक्तित्व के अध्ययन का एक तरीका है। इसमें मुख्यतः शीलगुणों के मापन को महत्व दिया जाता है। जब लोग स्वयं तथा दूसरों का वर्णन करने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, वे शब्द मानव व्यक्तित्व को समझने हेतु आधार प्रस्तुत करते हैं। इसके आधार पर आलपोर्ट ने विशेषकों को तीन भागों में विभाजित किया है-
(1) मुख्य विशेषक - ये अत्यन्त सामान्यीकृत प्रवृत्तियाँ होती हैं। ये उस लक्ष्य को प्रदर्शित करती हैं जिसमें चतुर्दिक व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन व्यतीत होता है। हिटलर का नाजीवाद तथा महात्मा गाँधी की अहिंसा प्रमुख विशेषक के उदाहरण है। ये विशेषक व्यक्ति के नाम के साथ ऐसे जुड़े होते हैं कि उनकी पहचान ही व्यक्ति के नाम के साथ ऐसे जुड़े होते हैं कि उनकी पहचान ही व्यक्ति के नाम के साथ हो जाती है।
(2) केन्द्रीय विशेषक - इन्हें प्रभाव में कम व्यापक किन्तु फिर भी सामान्यीकृत प्रवृत्तियों के रूप में जाना जाता है। ये विशेषक मेहनती, निष्कपट तथा स्फूर्ति आदि होते हैं। ये अधिकांशतः लोगों के अनुशंसा पत्रों में या नौकरी की संस्तुतियों में किसी व्यक्ति के लिए लिखे जाते हैं।
(3) गौण विशेषक - ये विशेषक व्यक्ति की सबसे कम सामान्यीकृत विशिष्टताओं के रूप में जाने जाते हैं। इस प्रकार के विशेषकों के उदाहरण हैं जैसे- मुझे संजातीय वस्त्र पहनना पसन्द है अथवा मुझे आम पसन्द हैं आदि।
आलपोर्ट ने व्यवहार पर स्थितियों के प्रभाव को स्वीकार किया किन्तु उनका मानना है कि विशेष स्थिति में जिस प्रकार व्यक्ति प्रतिक्रिया करता है वह उसके विशेषकों पर निर्भर करती है।
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Question 95 Marks
स्वभाव पर आधारित व्यक्तित्व के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
Answer
स्वभाव पर आधारित व्यक्तित्व के प्रकार - शैल्डन ने स्वभाव के आधार पर व्यक्तित्व का वर्गीकरण किया था। शैल्डन ने शारीरिक अथवा मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण से व्यक्तियों को तीन प्रकार का माना है। ये प्रकार हैं- एण्डोमॉर्फिक, मिसोमॉर्फिक तथा एक्टोमॉर्फिक। इन तीनों प्रकार के व्यक्तियों के स्वभाव में विद्यमान अन्तर के आधार पर तीन प्रकार के व्यक्तित्व माने जाते हैं। व्यक्तित्व के ये तीन प्रकार निम्नलिखित हैं-
(i) विसेरोटोनिक - इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्ति आरामपसन्द होते हैं। इन्हें खाना-पीना अच्छा लगता है। इनका अन्य लोगों से प्रेमपूर्ण सम्बन्ध रहता है। इन्हें नींद गहरी एवं अधिक आती है। अन्य लोगों पर निर्भर रहना इन्हें अच्छा लगता है।
(ii) सोमैटोटोनिक - ये व्यक्ति स्वयं कार्य करना पसन्द करते हैं। इन्हें दूसरों पर निर्भर रहना अच्छा नहीं लगता। साहस, प्रतियोगिता के कार्य तथा कर्मठता इनके व्यक्तित्व के गुण होते हैं। ये विपत्ति से न डरने वाले होते हैं।
(iii) सेरिब्रोटोनिक - इस प्रकार के व्यक्ति अत्यधिक सौम्य प्रकृति के होते हैं। संयम, संकोचशीलता तथा संवेदनशीलता इनके व्यक्तित्व के मुख्य गुण होते हैं। इन्हें अपनी भावनाओं और इच्छाओं को दबाना आता है। इन्हें सामाजिक कार्यों में अधिक भाग लेना तथा दूसरों की सहायता लेना भी अच्छा नहीं लगता। इन विशेषताओं के अतिरिक्त इनके बोलने एवं अन्य हाव-भावों में भी विशेष स्थिरता होती है। इन्हें गहरी नींद आती है।
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Question 105 Marks
व्यक्तित्व का विशेषक उपागम क्या है? यह कैसे प्रारूप उपागम से भिन्न है?
Answer
विशेषक उपागम हमारे दैनिक जीवन के सामान्य अनुभव के बहुत समान हैं। ये सिद्धान्त व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले मूल तत्वों की खोज करते हैं। ये सिद्धान्त मुख्यतः व्यक्तित्व के आधारभूत घटकों के वर्णन या विशेषीकरण से सम्बन्ध रखते हैं। प्राणी व्यापक रूप से मनोवैज्ञानिक गुणों में भिन्नताओं को दर्शाते हैं, फिर भी उनको व्यक्तित्व विशेषकों के लघु समूह में शामिल किया जा सकता है। उदाहरणार्थ- जब हमें यह पता होता है कि कोई व्यक्ति सामाजिक है तो वह व्यक्ति न सिर्फ सहयोग, मित्रता तथा मदद करने वाला होगा अपितु वह अन्य सामाजिक घटकों से युक्त व्यवहार दर्शाने में भी प्रवृत्त होगा। अतः विशेषक उपागम लोगों की प्राथमिक विशेषताओं की पहचान करने का प्रयत्न करता है। एक विशेषक तुलनात्मक रूप से एक स्थिर तथा स्थायी गुण माना जाता है जिस पर एक व्यक्ति दूसरों से अलग होता है। इसके अन्तर्गत सम्भव व्यवहारों की एक श्रृंखला अन्तर्निहित होती है जिसको स्थिति की माँगों के अनुसार सक्रियता प्राप्त होती है।
विशेषक उपागम प्ररूप उपागम से अलग होते हैं। व्यक्तित्व के प्ररूप समानताओं पर आधारित प्रत्याशित व्यवहारों के एक समुच्चय का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्राचीन समय से ही लोगों को व्यक्तित्व के प्ररूपों में वर्गीकृत करने का प्रयत्न किया गया है। हिप्पोक्रेटस ने एक व्यक्तित्व का प्ररूप विज्ञान प्रस्तावित किया जो फ्लूइड या ह्यूमस पर आधारित है। उन्होंने प्राणियों को चार प्रारूपों में विभाजित किया है; जैसे- उत्साही, श्लेष्मिक, विवादी तथा कोपशील। हर एक प्रारूप विशिष्ट व्यवहारपरक विशेषताओं वाला होता है।
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Question 115 Marks
फ्रायड ने व्यक्तित्व-संरचना की व्याख्या किस प्रकार दी है? व्याख्या कीजिए।
Answer
व्यक्तित्व के प्राथमिक संरचनात्मक तत्व फ्रायड के व्यक्तित्व सिद्धान्त के अनुसार तीन होते हैं- इदम् या इड, अहम् तथा पराहम्। यह तत्व अचेतन मन में ऊर्जा का कार्य करते हैं और लोगों के द्वारा किए गए व्यवहारों से इनके विषय में अनुमान लगाया जा सकता है। यह वास्तविक भौतिक संरचना नहीं है बल्कि सम्प्रत्यय हैं।
• इड - व्यक्ति की मूल प्रवृतिक ऊर्जा का स्रोत इड होता है। इसका सीधा सम्बन्ध व्यक्ति की आवश्यकताओं, कामेच्छाओं तथा आक्रामक आवेगों की तात्कालिक तुष्टि से होता है। यहसामान्यतः सुखेप्सा सिद्धान्त पर कार्य करता है, यह उसका अभिग्रह होता है। लोग सुख की तलाश करते हैं तथा दुख से बचते हैं। फ्रायड का मानना है कि मनुष्य की अधिकाधिक मूलप्रवृतिक ऊर्जा कामुक होती है तथा बची हुई ऊर्जा आक्रामक होती हैं। इड को नैतिक मूल्यों, समाज और दूसरे लोगों की कोई चिन्ता नहीं होती है।
• अहं - अहं व्यक्ति की मूलप्रवृतिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि वास्तविकता के धरातल पर करता है। अहं का विकास इड से होता है। यह संरचना वास्तविकता के सिद्धान्त से संचालित होती हैं तथा इड को व्यवहार करने के उचित तरीकों का निर्देशन कराता है। उदाहरण के लिए, किसी बालक का इड जो डोसा खाना चाहता है और उससे कहता है डोसा फटाफट से खा लो परन्तु वहीं उसका अहं उससे कहता है अगर उसने बिना खरीदे यह चीज खा ली तो उसे दण्ड झेलना पड़ेगा। वास्तविकता के सिद्धान्त पर कार्य करते हुए और वास्तविकता को समझते हुए बालक समझता है कि बिना खरीदे वह अपनी डोसा खाने की इच्छा पूरी नहीं कर सकता अर्थात् यही सर्वाधिक उचित तरीका होगा। इस तरह इड की माँग अवास्तविक और सुखेप्सा सिद्धान्त से संचालित होती है और अहं धैर्यवान् तथा वास्तविकता के सिद्धान्त से संचालित होता है।
• पराहम् - मानसिक प्रकार्यों की नैतिक शाखा के रूप में जानना पराहम् के विषय में जानकारी प्राप्त करने का सबसे उचित तरीका है। पराहम् इड तथा अहम् को बताता है कि किसी महत्वपूर्ण अवसर पर इच्छा की सन्तुष्टि नैतिक है या अनैतिक। उदाहरण के लिए, यदि किसी बच्चे को कोई कार्य करना है तो वह अपनी माँ से या किसी और बड़े से पूछकर करेगा तो उसका पराहम् उसे संकेत देता है कि उसका व्यवहार नैतिक है। इस प्रकार के व्यवहार के माध्यम से किये गये कार्य से बालक को कोई भय, अपराध-बोध या कोई चिन्ता नहीं होगी। समाजीकरण की प्रक्रिया में पैतृक प्राधिकार के आन्तरिकीकरण के माध्यम से पराहम् इड को नियन्त्रित करने में सहायता करता है।
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Question 125 Marks
आत्म किसे कहते हैं? आत्म सम्मान की विवेचना कीजिए।
Answer
आत्म को आत्मगत एवं वस्तुगत दोनों रूपों में समझा जा सकता है। जब हम यह कहते हैं कि "मैं जानता हूँ कि मैं कौन हूँ" तो आप आत्म का वर्णन 'जानने वाले' के रूप में ही कर रहे हैं या फिर उस रूप में कर रहे हैं 'जिसे जाना जा सकता है।' स्वयं को जानने की प्रक्रिया ही आत्मगत कहलाती है जबकि वस्तुगत (परिणामी) रूप में आत्म प्रेक्षित होता है और जान लिये जाने वाले तथ्य के रूप में होता है।
आत्म-सम्मान
आत्म-सम्मान हमारे आत्म का एक महत्वपूर्ण अंग है। मानव के रूप में हम हमेशा ही अपने मूल्य अथवा मान और अपनी योग्यता के विषय में आंकलन करते रहते हैं। मानव का अपने बारे में यह मूल्य-निर्णय ही आत्म-सम्मान कहलाता है। कुछ लोगों में आत्म-सम्मान उच्चस्तरीय होता है, जबकि कुछ लोगों में आत्म-सम्मान निम्नस्तरीय ही होता है। किसी भी व्यक्ति के आत्म-सम्मान का मूल्यांकन करने के लिए व्यक्ति के सम्मुख विभिन्न प्रकार के कथन प्रस्तुत किये जाते हैं, तत्पश्चात् उस व्यक्ति से पूछा जाता है कि प्रस्तुत किये कथन उसके सन्दर्भ में सही हैं यह बतायें।
हमारे दैनिक जीवन के व्यवहारों द्वारा आत्म-सम्मान अपना घनिष्ठ सम्बन्ध दर्शाता है। उदाहरणार्थ; जिन बच्चों में आत्म-सम्मान उच्च होता है उनका निष्पादन विद्यालयों में निम्न आत्म-सम्मान रखने वाले बच्चों की तुलना में अधिक होता है और जिन छात्रों में उच्च सामाजिक आत्म-सम्मान होता है उनको निम्न सामाजिक आत्म-सम्मान रखने वाले छात्रों की तुलना में सहपाठियों द्वारा अधिक पसन्द किया जाता है। दूसरी ओर जिनमें दुश्चिन्ता, अवसाद और समाजविरोधी व्यवहार पाया जाता है उन छात्रों में सभी क्षेत्रों में निम्न आत्म-सम्मान होता है। इन अध्ययनों से यह पता चलता है कि जो माता-पिता अपने बच्चों का पालन-पोषण अत्यधिक प्रेमपूर्वक करते हैं उन बालकों में आत्म-सम्मान भी उच्च ही विकसित होता है क्योंकि ऐसा होने पर बालक अपने आपको अत्यधिक सक्षम एवं योग्य समझता है। माता-पिता जिन बच्चों के सहायता न माँगने पर भी उनके निर्णय स्वयं लेते हैं उन बच्चों में आत्म-सम्मान का स्तर निम्न पाया जाता है।
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