Questions

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर सविस्तर लिखिए : [5 गुण ]

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6 questions · self-marked practice — reveal the answer and mark yourself.

Question 15 Marks
रेशम के फाइबर से रेशम कैसे बनाया जाता है? स्पष्ट करें।
Answer
रेशम का संसाधन: रेशम फाइबर प्राप्त करने के लिए कोकूनों की बड़ी ढेरी का उपयोग किया जाता है। वयस्क कीट में विकसित होने से पहले ही कोकूनों को धूप में रखा जाता है अथवा पानी में उबाला जाता है या भाप में रखा जाता है। इस प्रक्रम में रेशम के फाइबर पृथक् हो जाते हैं। रेशम के रूप में उपयोग के लिए कोकून में से रेशे निकालने के पश्चात् उनसे धागे बनाने की प्रक्रिया 'रेशम की रीलिंग' कहलाती है। रीलिंग विशेष मशीनों में की जाती है, जो कोकून में से फाइबर या रेशों को निकालती है। फिर रेशम के फाइबरों की कताई की जाती है, जिससे रेशम के धागे प्राप्त हो जाते हैं। यह रेशम का मृदु रेशा स्टील के तार जितना मजबूत होता है। बुनकरों द्वारा रेशम के इन्हीं धागों से वस्त्र बुने जाते हैं।
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Question 25 Marks
रेशम कीट पालन पर एक टिप्पणी लिखिए।
Answer
रेशम कीट पालन: रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम कीटों को पाला जाता है और उनके कोकूनों को एकत्रित करके रेशम के फाइबर प्राप्त किए जाते हैं। एक मादा रेशम कीट एक बार में सैकड़ों अंडे देती है। अंडों को सावधानी से कपड़े की पट्टियों अथवा कागज पर संग्रहित करके रेशम कीट पालकों को बेचा जाता है। ये पालक/किसान अंडों को स्वास्थ्यकर स्थितियों, उचित ताप एवं आर्द्रता की अनुकूल परिस्थितियों में रखते हैं। अंडों को उपयुक्त ताप तक गर्म रखा जाता है, जिससे अंडों में से लार्वा निकल आए। यह तब किया जाता है जब शहतूत के वृक्षों पर नई पत्तियाँ आती हैं। लार्वा, जो कैटरपिलर अथवा रेशम कीट कहलाते हैं, दिन - रात खाते रहते हैं और आमाप (साइज) में काफी बड़े हो जाते हैं। कीटों को शहतूत की ताजी कटी पत्तियों के साथ बाँस की स्वच्छ ट्रे में रखा जाता है। 25 से 30 दिनों के बाद कैटरपिलर खाना बंद कर देते हैं और कोकून बनाने के लिए वे बाँस के बने छोटे - छोटे कक्षों में चले जाते हैं। (इसके लिए ट्रे में छोटी रैक या टहनियाँ रख दी जाती हैं, जिनसे कोकून जुड़ जाते हैं।) कैटरपिलर अथवा रेशम कीट कोकून बनाते हैं, जिसके भीतर प्यूपा विकसित होता है।
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Question 35 Marks
ऊन के जलने की गंध कृत्रिम रेशम के जलने जैसी होती है अथवा शुद्ध रेशम जैसी? क्या आप इसका कारण बता सकते हैं? रेशम की विभिन्न किस्मों के विषय में भी लिखिए।
Answer
(i) ऊन के जलने की गंध शुद्ध रेशम जैसी आती है।
(ii) ऊन और रेशम, दोनों प्राकृतिक पदार्थ हैं और इनका संघटन भी लगभग एक जैसा होता है, इसलिए ऊन के जलने की गंध शुद्ध रेशम जैसी होती है।
(iii) रेशम का धागा रेशम कीट के कोकून से प्राप्त रेशों से तैयार किया जाता है । रेशम कीट अनेक किस्म के होते हैं, जो एक - दूसरे से काफी अलग दिखाई देते हैं और उनसे प्राप्त होने वाला रेशम का धागा गठन अर्थात् रूक्षता, चिकनाहट, चमक आदि में भिन्न होता है। अत: टसर रेशम, मूगा रेशम, कोसा रेशम, शहतूत रेशम, ऐरी रेशम तथा अन्य प्रकार के रेशम विभिन्न किस्म के रेशम कीटों द्वारा काते गए कोकूनों से प्राप्त किए जाते हैं। सबसे सामान्य रेशम कीट 'शहतूत रेशम कीट' है। इस कीट के कोकून से प्राप्त होने वाला रेशम फाइबर मृदु, चमकदार और लचीला होता है तथा इसे सुन्दर रंगों में रंगा जा सकता है।
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Question 45 Marks
रेशम के कीट के जीवनचक्र के बारे में लिखिए।
Answer

रेशम कीट का जीवनचक्र: रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम के कीटों को पालना 'रेशम कीट पालन (सेरीकल्चर)' कहलाता है। मादा रेशम कीट अंडे देती है, जिनसे लार्वा निकलते हैं, जो कैटरपिलर/इल्ली या रेशम कीट कहलाते हैं। ये आकार में वृद्धि करते हैं और जब कैटरपिलर अपने जीवन-चक्र की अगली अवस्था में प्रवेश करने के लिए तैयार होता है, तो यह प्यूपा/कोशित कहलाता है, जो अपने इर्द - गिर्द एक जाल बुन लेता है। यह जाल उसे अपने स्थान में बने रहने में सहायता करता है। फिर यह अंग्रेजी संख्या आठ (8) के रूप में अपने सिर को एक सिरे से दूसरे सिरे तक ले जाता है। सिर की इस गति के समय कैटरपिलर पतले तार के रूप में प्रोटीन से बना एक पदार्थ स्रावित करता है जो कठोर होकर (सूखकर) रेशम का रेशा बन जाता है। जल्दी ही कैटरपिलर स्वयं को पूरी तरह से रेशम के रेशों से ढक लेता है। यह आवरण कोकून कहलाता है। कीट का इसके आगे का विकास कोकून के भीतर होता है। कोकून से प्राप्त रेशों से रेशम का धागा तैयार किया जाता है।
RBSE Class 7 Science Important Questions Chapter 3 रेशों से वस्त्र तकग 1 RBSESolutions.in
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Question 55 Marks
भेड़ से प्राप्त रेशों को स्वेटर बुनने में उपयोग की जाने वाली ऊन में कैसे परिवर्तित किया जाता है?
Answer
रेशों को ऊन में परिवर्तित करना: स्वेटर बुनने वाली अथवा शॉल बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली ऊन एक लम्बी प्रक्रिया द्वारा प्राप्त उत्पाद होती है, जिसमें निम्नलिखित चरण सम्मिलित हैं चरण 1: भेड़ के बालों को त्वचा की पतली परत के साथ शरीर से उतार लिया जाता है। यह प्रक्रिया ऊन की कटाई' कहलाती है। सामान्यत: बालों को गर्मी के मौसम में काटा जाता है। बाल ऊनी रेशे प्रदान करते हैं। इन्हीं ऊनी रेशों को संसाधित करके ऊन का धागा बनाया जाता है।
चरण 2: त्वचा सहित उतारे गये बालों को टंकियों में डालकर अच्छी तरह से धोया जाता है, जिससे उनकी चिकनाई, धूल और गर्त निकल जाए। यह प्रक्रम अभिमार्जन' कहलाता है। आजकल, अभिमार्जन मशीनों द्वारा किया जाता है।
चरण 3: अभिमार्जन के बाद छंटाई करके रोमिल अथवा रोयेंदार बालों को कारखानों में भेज दिया जाता है, जहाँ विभिन्न गठन वाले बालों को पृथक् किया जाता है।
चरण 4: इसमें बालों में से छोटे-छोटे कोमल व फूले हुए रेशों को छाँट लिया जाता है, जो 'बर' कहलाते हैं। इसके बाद रेशों का पुनः अभिमार्जन कर उन्हें सुखा लेते हैं। इस प्रकार प्राप्त उत्पाद ही धागों के रूप में काते जाने के लिए उपयुक्त ऊन होती है।
चरण 5: रेशों की विभिन्न रंगों में रंगाई की जाती है, क्योंकि भेड़ अथवा बकरी की सामान्य ऊन काली, भूरी अथवा सफेद होती है।
चरण 6: इस चरण को 'रीलिंग' कहते हैं। इसमें रेशों को सीधा करके सुलझाया जाता है और फिर लपेटकर उनसे धागा बनाया जाता है। लम्बे रेशों को कातकर स्वेटरों की ऊन के रूप में और अपेक्षाकृत छोटे रेशों को कात कर ऊनी वस्त्र बुनने में उपयोग किया जाता है।
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Question 65 Marks
भेड़ पालन और इनके प्रजनन के विषय में लिखिए।
Answer
भेड़ पालन: हमारे देश के अनेक भागों - जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के पहाड़ी क्षेत्रों तथा हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के मैदानों में ऊन प्राप्त करने के लिए भेडों की कई किस्मों को पाला जाता है। भेड शाकाहारी होती है और वह घास और पत्तियाँ पसन्द करती है । भेड़ पालक इन्हें हरे चारे के अतिरिक्त दालें, मक्का, ज्वार, खली और खनिज भी खिलाते हैं। सर्दियों में, भेड़ों को घरों के अन्दर रखा जाता है और इन्हें पत्तियाँ, अनाज और सूखा चारा खिलाया जाता है।
प्रजनन: भेड़ों की कुछ नस्लों के शरीर पर बालों की घनी परत होती है, जिससे बड़ी मात्रा में अच्छी गुणवत्ता की ऊन प्राप्त होती है। इन भेड़ों को 'वरणात्मक प्रजनन' द्वारा उत्पन्न किया जाता है, जिनमें से एक जनक किसी अच्छी नस्ल की भेड़ होती है।
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