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Question 12 Marks
भेद स्पष्ट करें -
P तरंग तथा T तरंग।
Answer
क्र.सं.P तरंग (Wave)T तरंग (Wave)
1.P तरंग को आलिन्द के उद्दीपन/विध्रुवण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।जबकि T तरंग निलय का उत्तेजना से सामान्य अवस्था में वापिस आने की स्थिति को प्रदर्शित करता है।
2.जिससे दो आलिन्दों का संकुचन होता है।T तरंग का अंत प्रकुंचन अवस्था की समाप्ति का द्योतक है।
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Question 22 Marks
भेद स्पष्ट करें -
प्रकुंचन तथा अनुशिथिलन
Answer
क्र.सं.प्रकुंचन (Systole)अनुशिथिलन (Diastole)
1.हृदय के सिकुड़ने को प्रकुंचन कहते हैं।हृदय के फैलने को अनुशिथिलन कहते हैं।
2.प्रकुंचन के फलस्वरूप हृदय रुधिर को विभिन्न अंगों में भेजने हेतु प्रेषित करता है।अनुशिथिलन के फलस्वरूप देह के विभिन्न भागों से लाया गया रुधिर हृदय में आता है।
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Question 32 Marks
रक्त को एक संयोजी ऊतक क्यों मानते हैं?
Answer
रक्त एक जटिल तरल संयोजी ऊतक है जिसमें द्रव्य आधात्री (Matrix), प्लाज्मा तथा अन्य संगठित संरचनाएँ पाई जाती हैं। इस ऊतक को विभाजित नहीं किया जा सकता है। यह पोषक पदार्थों का संवहन करता है। शरीर की रोगों से प्रतिरक्षा के साथ-साथ विभिन्न जैविक क्रियाओं के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है जैसे-श्वसन व उत्सर्जन आदि। अतः उक्त विशेषताओं के कारण रक्त को संयोजी ऊतक मानते हैं।
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Question 42 Marks
प्लाज्मा (प्लैज्मा) प्रोटीन का क्या महत्त्व है?
Answer
प्लाज्मा प्रोटीन का महत्त्व - प्लाज्मा में 90-92 प्रतिशत जल तथा 6-8 प्रतिशत प्रोटीन पदार्थ पाये जाते हैं। फाइब्रिनोजन, ग्लोबुलिन तथा एल्बुमिन प्लाज्मा में उपस्थित मुख्य प्रोटीन हैं।
फाइब्रिनोजन की आवश्यकता रक्त का थक्का या स्कंदन में होती है। ग्लोबुलिन का उपयोग शरीर के प्रतिरक्षा तन्त्र तथा एल्बुमिन का उपयोग परासरणी सन्तुलन के लिए होता है।
अतः हम कह सकते हैं प्लाज्मा प्रोटीन का हमारे लिए कितना महत्त्वपूर्ण है।
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Question 52 Marks
शिरा आलिन्द पर्व (कोटरालिंद गांठ SAN) को हृदय का गति प्रेरक (पेसमेकर) क्यों कहा जाता है?
Answer
शिरा आलिन्द पर्व जिसे SAN भी कहते हैं, शिरा आलिन्द पर्व अधिक क्रिया-विभव पैदा करता है। यह एक मिनट में 70-75 क्रिया-विभव पैदा करता है तथा हृदय का लयात्मक संकुचन (Rhythmic Contraction) को प्रारम्भ करता है तथा बनाये रखता है। इसलिए इसे (गतिप्रेरक) पेसमेकर कहते हैं। अर्थात् यह हृदय गति पर नियन्त्रण एवं नियमन करता है।
इससे हमारी सामान्य हृदय स्पन्दन दर 70-75 प्रति मिनट होती है जो औसतन 72 स्पन्दन प्रति मिनट होती है।
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Question 62 Marks
एक सामान्य ECG का आरेख बनाते हुए इसके घटकों को समझाइए।
Answer
self
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Question 72 Marks
मानव रुधिर वर्गों के नाम लिखो तथा बताओ यदि माँ का A तथा पिता B वर्ग का है तो बच्चों में कौनसा वर्ग होगा?
Answer
मानव रुधिर वर्गों के नाम निम्न हैं- (1) A, (2) B, (3) ΑΒ, (4) Ο
बच्चों में O, A, B तथा AB रुधिर वर्ग होगा।
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Question 82 Marks
ECG प्राप्त करने की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
Answer
ECG प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ नामक उपकरण प्रयोग में लेते हैं।
इस तकनीक में संचलन जैली (Conducting Jelly) का प्रयोग करते हुए उपकरण के तीन इलेक्ट्रोड क्रमशः मरीज के वक्ष, कलाई तथा पैरों पर लगाये जाते हैं। इनसे प्राप्त विद्युत संकेत क्षीण प्रकृति (Low amplitude) के होते हैं जिनको उपकरण में लगी उपयुक्त प्रणाली से अभिवर्द्धित (Amplify) पर संवेदी रिकॉर्डर में रिकॉर्ड कर लिया जाता है।
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Question 92 Marks
मनुष्य के हृदय स्पन्दन के संचालन में वेगस की भूमिका समझाइए।
Answer
मनुष्य के हृदय की स्पन्दन दर में वृद्धि या कमी स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र के सान्निध्य में जाने वाली वेगस क्रेनियल तन्त्रिका (Vagus Cranial Nerve) के द्वारा नियन्त्रित की जाती है। वेगस तन्त्रिका के अन्तिम सिरे से ऐसिटोकोलिन नामक तत्त्व का स्त्राव होता है जो शिरा आलिन्द पर्व को संदमित करके हृदय स्पन्दन को कम करता है। स्पन्दन दर में वृद्धि हेतु तन्त्रिका तन्तु नोरएड्रीनेलिन नामक तत्त्व का स्रावण करते हैं।
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Question 102 Marks
यदि किसी व्यक्ति का रुधिर दाब बार-बार मापने पर रुधिर दाब 140/90 या अधिक आता है तो यह क्या प्रदर्शित करता है? समझाइए।
Answer
यदि किसी व्यक्ति का रुधिर दाब बार-बार मापने पर रुधिर दाब 140/90 या अधिक आता है तो वह अति तनाव प्रदर्शित करता है। उच्च रुधिर दाब हृदय की बीमारियों को जन्म देता है तथा अन्य महत्त्वपूर्ण अंगों जैसे मस्तिष्क तथा वृक्क जैसे अंगों को प्रभावित करता है।
अति तनाव रुधिर दाब की वह अवस्था है, जिसमें रक्त दाब सामान्य (120/80) से अधिक है। इस मापदण्ड में 120 मिमी. एच.जी. (मिलीमीटर में मर्करी दबाव) को प्रकुंचन या पम्पिंग दाब और 80 मिमी. एच.जी. को अनुशिथिलन या विराम काल (सहज) रुधिर दाब (Blood Pressure) कहते हैं।
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Question 112 Marks
हाइपरटेंशन किसे कहते हैं? धमनी काठिन्य एवं एथिरोकाठिन्य रोग में कोई चार अन्तर लिखिए।
Answer
हाइपरटेंशन (Hypertension) - उच्च रक्त दाब की स्थिति को हाइपरटेंशन (Hypertension) कहते हैं।
धमनी काठिन्य एवं एथिरोकाठिन्य में अन्तर
(Differences between Arteriosclerosis and Atherosclerosis)
क्र.सं.धमनी काठिन्य (Arteriosclerosis)एथिरोकाठिन्य (Atherosclerosis)
1.धमनियों का कैल्सियम लवणकोलेस्ट्रोल जमा होने के कारण कड़ा हो जाना।धमनी की अन्तःभित्ति पर लिपिड (कोलेस्ट्रोल) की परत का जमा होना।
2.छोटी व मध्यम धमनियों में हो सकता है।बड़ी व मध्यम आकार की धमनी में होता है।
3.धमनी गुहा पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है।धमनी की गुहा संकरी हो जाती है।
4.धमनी गुहा सख्त हो जाती है, अपनी लचक खो देती है एवं फट सकती है।धमनी गुहा बंद हो सकती है जिसके कारण रक्त प्रवाह रुक सकता है।
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Question 122 Marks
मानव रक्त परिसंचरण का आरेखीय चित्र बनाइए।
Answer
self
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Question 132 Marks
मनुष्य के रुधिर परिसंचरण तन्त्र में कौनसी दो विशेषताएँ मिलती हैं? समझाइए।
Answer
मनुष्य के रुधिर परिसंचरण तन्त्र में निम्न दो विशेषताएँ मिलती हैं-
(1) O2 युक्त रुधिर तथा O2 रहित रुधिर हृदय तथा रक्त-वाहिनियों में कभी नहीं मिलता या हमेशा पृथक् रहता है।
(2) रक्त शरीर में एक चक्र पूरा करने में हृदय से दो बार गुजरता है। पहली बार शरीर का समस्त अशुद्ध रुधिर दाहिने आलिन्द तथा निलय में होकर फेफड़ों में जाता है तथा दूसरी बार फेफड़ों से फुफ्फुस शिराओं द्वारा शुद्ध रुधिर बायें आलिन्द में होकर बायें निलय में और वहाँ से एक महाधमनी द्वारा समस्त शरीर में आ जाता है।
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Question 142 Marks
हृदय स्पंदन किसे कहते हैं? न्यूरोजेनिक हृदय एवं मायोजेनिक हृदय में कोई चार अन्तर लिखिए।
Answer
हृदय स्पंदन (Heart beat) - सतत् एवं क्रमिक संकुचन तथा शरीर से रुधिर को एकत्रित एवं पम्पिंग करने के पश्चात् हृदय का शिथिलन हृदय स्पंदन कहलाता है।
न्यूरोजेनिक हृदय एवं मायोजेनिक हृदय में अन्तर
क्र.सं.न्यूरोजेनिक हृदयमायोजेनिक हृदय
1.हृदय स्पंदन, हृदय के समीप स्थित गैग्लियॉन के द्वारा प्रारम्भ होता है।हृदय स्पंदन रूपांतरित हृदयक पेशियों के पेचेज द्वारा प्रारम्भ होता है।
2.संकुचन का आवेग तंत्रिका तंत्र से उत्पन्न होता है।संकुचन का आवेग हृदय में स्वतः उत्पन्न होता है।
3.हृदय शरीर से निकालते ही तुरन्त धड़कना बंद कर देता है। इसलिए हृदय का प्रत्यारोपण संभव नहीं है।हृदय शरीर से निकालने के पश्चात् भी कुछ समय के लिए धड़कतारहता है, इस कारण हृदय का प्रत्यारोपण संभव है।
4.उदाहरण - कुछ एनीलिडस एवं कई आर्थोपोड्स का हृदय।उदाहरण - मोलस्क एवं कशेरूकियों का हृदय।
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Question 152 Marks
थिबेसियस कपाट तथा हिज बण्डल की स्थिति स्पष्ट करो।
Answer
थिबेसियस कपाट - बायें अग्र महाशिरा छिद्र के पास कोरोनरी शिरा छिद्र पर पाया जाता है।
हिज बण्डल - आलिन्द-निलय पर्व से तन्तुओं के निकलने वाले समूह को हिज बण्डल कहते हैं। इस बण्डल के तन्तु निलयों की भित्ति में फैले होते हैं।
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Question 162 Marks
रीसस शिशु (Rhesus Baby) किसे कहते हैं? इस शिशु को बचाने के कोई दो उपाय लिखिए।
Answer
रीसस शिशु-इरिथ्रोब्लास्टोसिस फीटेलिस रोग से ग्रसित शिशु को रीसस शिशु कहते हैं। सामान्यतः इस शिशु का जन्म समय से पूर्व होता है एवं इसमें रक्ताल्पता पाई जाती है।
शिशु को बचाने के उपाय-
(i) शिशु के सम्पूर्ण रक्त को स्वस्थ रुधिर द्वारा प्रतिस्थापित करके शिशु को बचाया जा सकता है।
(ii) प्रसव से ठीक पूर्व लगभग 72 घण्टे के भीतर Rh- माता को ऐन्टी Rh- ऐन्टीबॉडी का इन्ट्रावेनस इन्जेक्शन देकर भी शिशु को बचाया जा सकता है।
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Question 172 Marks
रुधिर लयन किसे कहते हैं? क्या कारण है कि लाल रुधिर कणिकाओं में ऑक्सीय श्वसन नहीं होता है?
Answer
रुधिर लयन (Haemolysis) - लाल रक्ताणुओं की प्लाज्माकला अर्ध पारगम्य होती है। यदि इन्हें अल्प वलीय (hypotonic) तरल जैसे-0.5% नमक का घोल या आसुत जल में रखें, तो द्रव इनके भीतर प्रवेश कर जायेगा, इसके फलस्वरूप ये फूलकर फट जायेंगे तथा हीमोग्लोबिन बाहर निकल आता है। इसे रुधिर लयन (haemolysis) कहते हैं।
कभी-कभी अपघटन में लाल रक्ताणुओं का पदार्थ विसरण द्वारा बाहर निकल आता है और रुधिराणु की आकृति ज्यों की त्यों बनी रहती है। इन खाली खोखों को मरीचिका या घोस्ट (Shadow or ghost) कहते हैं।
लाल रुधिर कणिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया की अनुपस्थिति के कारण ऑक्सीश्वसन नहीं हो पाता है।
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Question 182 Marks
लसीका तन्त्र किसे कहते हैं? लसीका के कार्यों का वर्णन कीजिए।
Answer
लसीका तन्त्र को सहायक या दूसरा परिसंचरण तन्त्र भी कहते हैं। यह तन्त्र लसीका केशिकाओं (Lymph Capillaries), लसीका वाहिनियों (Lymph Vessels), लसीका गाँठें (Lymph nodes) व अन्य लसीका अंगों का बना होता है।
लसीका के कार्य (Functions of Lymph)-
1. यह रक्त व ऊतक द्रव के बीच बिचौलिया (Middleman) का कार्य करता है।
2. कोशिकाओं के चारों तरफ जलीय वातावरण बनाकर कोशिका के बाहर एवं भीतर रसाकर्षण सन्तुलन बनाये रखता है।
3. इसमें उपस्थित श्वेत रुधिर कणिकाएँ जीवाणुओं का भक्षण करती हैं और शरीर की रोगाणुओं से रक्षा करती हैं।
4. छोटी आंत से वसा का अवशोषण लसिका केशिकाओं में होता है।
5. रुधिर के प्लाज्मा के अंश को जो धमनी कोशिकाओं से बाहर निकलकर ऊतक द्रव्य में आ जाता है, वापस रुधिर परिसंचरण तन्त्र में भेजती है।
6. लसीका शरीर के कोमल अंगों की रक्षा में सहायक होता है। यह हृदयावरणी गुहा तथा देह गुहा के अंगों को नम बनाये रखता है तथा अंगों के बीच परस्पर रगड़ से बचाव करता है।
7. ऊतक द्रव से प्रोटीन को पुनः रक्त में लौटाता है।
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Question 192 Marks
एंजिना पेक्टोरिस एवं हृदय आघात को समझाइए।
Answer
एंजिना पेक्टोरिस एवं हृदय आघात (Angina Pectoris and Heart Shock) - यह हृदय पेशियों की एक प्रकार की ऐंठन है। हृदय पेशियों को जब किसी कारण से O2 की आपूर्ति बन्द हो जाती है या बहुत कम O2 मिलती है तब ये मृत हो जाती हैं। इससे सीने एवं हृदय में कष्टकारी दर्द होता है। दर्द का कारण हृदय पेशियों में लैक्टिक अम्ल की मात्रा में वृद्धि होना है। ऐसी स्थिति घातक होती है। हृदय आघात के कई कारण हो सकते हैं- कोरोनरी धमनी में थक्का बन जाने के कारण (थ्रोम्बोसिस) या रुधिर वाहिका में रुकावट आ जाने के कारण यह रोग हो जाता है। व्यक्ति का अधिक मोटा होना, धूम्रपान, उच्च रुधिर दाब, कम व्यायाम, रुधिर में कोलेस्टेरॉल की मात्रा अधिक होना ऐसे कारक हैं, जिनसे हृदय आघात का खतरा बढ़ जाता है।
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Question 202 Marks
"यदि Rh-ve माताएँ एक से अधिक बार Rh+ve शिशु से युक्त गर्भधारण करती हैं, तो Rh कारक के कारण गम्भीर समस्या पैदा हो जाती है।" कारण सहित समझाइए।
Answer
Rh कारक वंशागत होता है। Rh+ प्रभावी तथा Rh- अप्रभावी होता है। Rh- माता से उत्पन्न Rh+ शिशु पिता से Rh कारक प्राप्त करता है। गर्भस्थ Rh+ शिशु से प्रसव के समय Rh ऐन्टीजन माता के रुधिर में प्रवेश कर जाते हैं। माता के रुधिर में इस ऐन्टीजन के कारण एन्टी-Rh ऐन्टीबॉडी उत्पन्न हो जाती है। सामान्यतः ऐन्टीबॉडी इतनी अधिक मात्रा में नहीं होती जो प्रथम बार उत्पन्न शिशु को हानि पहुँचा सके, लेकिन बाद में गर्भधारण की स्थिति में माता के रुधिर से एन्टी Rh ऐन्टीबॉडी अपरा द्वारा गर्भस्थ शिशु के रुधिर में पहुँचकर शिशु के रक्ताणुओं का लयन कर देती है। गर्भस्थ शिशु या नवजात शिशु के इस घातक रोग को इरिथ्रोब्लास्टोसिस फीटेलिस कहते हैं।
इस रोग से ग्रसित शिशु को रीसस शिशु कहते हैं। सामान्यतः इसका जन्म समयपूर्व होता है तथा इसमें रक्ताल्पता पाई जाती है।
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