Question 15 Marks
मानव में पाचन की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
Answer
View full question & answer→मानव में पाचन: मानव में आहारनाल एवं सम्बद्ध स्रावी ग्रंथियाँ मिलकर पाचन तंत्र का निर्माण करते हैं। आहारनाल के विभिन्न भागों में भोजन का पाचन क्रमिक रूप से होता है। आहारनाल के विभिन्न भाग निम्न प्रकार से हैं।
(i) मुख एवं मुख गुहिका: भोजन का अन्तर्ग्रहण मुख द्वारा होता है। हमारे मुख में लाला ग्रन्थि होती है, जो लाला रस (लार) स्त्रावित करती है। इस लार को भोजन में मिलाने का कार्य जीभ करती है। (ii) भोजन नली (ग्रसिका): मुख गुहिका द्वारा निगला हुआ भोजन ग्रसिका में जाता है। ग्रसिका गले एवं वक्ष से होती हुई जाती है। ग्रसिका की भित्ति के संकुचन से भोजन नीचे की ओर सरकता जाता है। वास्तव में, सम्पूर्ण आहारनाल संकुचित होती रहती है तथा यह गति भोजन को नीचे की ओर धकेलती रहती है।
(iii) आमाशय: यह मोटी भित्ति वाली एक थैलीनुमा संरचना है। इसकी आन्तरिक सतह श्लेष्मल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रस स्रावित करती है। अम्ल भोजन के साथ यहाँ तक पहुँचे जीवाणुओं को नष्ट करता है और माध्यम को अम्लीय बनाता है। पाचक रस (जठर रस) प्रोटीन को सरल पदार्थों में विघटित करता है।
(iv) क्षुद्रांत्र (छोटी आँत): यह लगभग 7.5 मीटर लम्बी अत्यधिक कुंडलित नली है। क्षुद्रांत्र में यकृत द्वारा खावित पित्त, अग्न्याशय से अग्न्याशयिक स्राव एवं क्षुद्रात्र भित्ति द्वारा स्रावित पाचक रस की क्रिया से भोजन के सभी घटकों का पाचन पूरा हो जाता है। भोजन के जिस भाग का पाचन अथवा अवशोषण नहीं होता, उसे बृहदांत्र में भेज दिया जाता है।
(v) बृहदांत्र (बड़ी आँत): यह क्षुद्रांत्र की अपेक्षा चौड़ी एवं छोटी होती है। यह मलाशय से जुड़ी होती है। जल एवं कुछ लवण बृहदांत्र में अवशोषित होते हैं। शेष बचा हुआ अपचित पदार्थ मलाशय में चला जाता है तथा अर्धठोस मल के रूप में रहता है।
(vi) मलद्वार अथवा गुदा -समय: समय पर यह मल गुदा द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। इस प्रकार विभिन्न चरणों में मानव में पाचन की क्रिया सम्पन्न होती है।
(i) मुख एवं मुख गुहिका: भोजन का अन्तर्ग्रहण मुख द्वारा होता है। हमारे मुख में लाला ग्रन्थि होती है, जो लाला रस (लार) स्त्रावित करती है। इस लार को भोजन में मिलाने का कार्य जीभ करती है। (ii) भोजन नली (ग्रसिका): मुख गुहिका द्वारा निगला हुआ भोजन ग्रसिका में जाता है। ग्रसिका गले एवं वक्ष से होती हुई जाती है। ग्रसिका की भित्ति के संकुचन से भोजन नीचे की ओर सरकता जाता है। वास्तव में, सम्पूर्ण आहारनाल संकुचित होती रहती है तथा यह गति भोजन को नीचे की ओर धकेलती रहती है।
(iii) आमाशय: यह मोटी भित्ति वाली एक थैलीनुमा संरचना है। इसकी आन्तरिक सतह श्लेष्मल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रस स्रावित करती है। अम्ल भोजन के साथ यहाँ तक पहुँचे जीवाणुओं को नष्ट करता है और माध्यम को अम्लीय बनाता है। पाचक रस (जठर रस) प्रोटीन को सरल पदार्थों में विघटित करता है।
(iv) क्षुद्रांत्र (छोटी आँत): यह लगभग 7.5 मीटर लम्बी अत्यधिक कुंडलित नली है। क्षुद्रांत्र में यकृत द्वारा खावित पित्त, अग्न्याशय से अग्न्याशयिक स्राव एवं क्षुद्रात्र भित्ति द्वारा स्रावित पाचक रस की क्रिया से भोजन के सभी घटकों का पाचन पूरा हो जाता है। भोजन के जिस भाग का पाचन अथवा अवशोषण नहीं होता, उसे बृहदांत्र में भेज दिया जाता है।
(v) बृहदांत्र (बड़ी आँत): यह क्षुद्रांत्र की अपेक्षा चौड़ी एवं छोटी होती है। यह मलाशय से जुड़ी होती है। जल एवं कुछ लवण बृहदांत्र में अवशोषित होते हैं। शेष बचा हुआ अपचित पदार्थ मलाशय में चला जाता है तथा अर्धठोस मल के रूप में रहता है।
(vi) मलद्वार अथवा गुदा -समय: समय पर यह मल गुदा द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। इस प्रकार विभिन्न चरणों में मानव में पाचन की क्रिया सम्पन्न होती है।