Question
आदर्श विद्यार्थ

Answer

विद्यार्थी जीवन परिश्रम, अनुशासन, संयम और नियम का जीवन है। किसी भी मनुष्य का भविष्य कैसा होगा यह उसके विद्यार्थी जीवन से ही जाना जाता है। प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरुकुल में पढ़ते थे और दिन-रात गुरु के सम्पर्क में रहते थे। इस प्रकार वे संयमित और मर्यादापूर्ण जीवन के आदि हो जाते थे ।
मनुष्य के लिए विद्यार्थी जीवन का समय महत्त्वपूर्ण होता है। मनुष्य के जीवन के लिए यह उसके सर्वांगीण विकास का समय है। खेल-कूद, व्यायाम, ज्ञानप्राप्ति, चरित्रनिर्माण, आत्मनिर्भरता, कर्तव्यनिष्ठा, विनम्रता और परोपकार जैसे गुणों का इस अवधि में ही विकास होता है। कहा गया है "विद्या ददाति विनयं ।" अर्थात् विद्या से विनम्रता प्राप्त होती है। विद्यार्थी के लिए गुरु से ज्ञान पाने के तीन उपाय हैं: नम्रता, अनुशासन और जिज्ञासा । नम्रता से अनुशासन आता है।
जिज्ञासा किसी भी विद्यार्थी का विशिष्ट गुण है और अनुशासन सेवा का गुण प्रदान करता है। शिक्षा के क्षेत्र में अनुशासन का बड़ा महत्त्व है। अनुशासित विद्यार्थी ही आदर्श विद्यार्थी की श्रेणी में आ सकता है।
आदर्श विद्यार्थी समय पर सोना, समय पर उठना, नियमित रूप से विद्याभ्यास करना, संतुलित भोजन करना, बड़ों की संगत करना, कलुषित विचारों से दूर रहना आदि नियमों का दृढता से पालन करता है। परिश्रमी विद्यार्थी को सुख की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। परिश्रम के बिना विद्या हासिल करना असम्भव है ।
विद्यार्थी को अपना समय व्यर्थ बरबाद नहीं करना चाहिए। विद्यार्थी को अपने भविष्य में सफलता प्राप्त करने के लिए मार्ग में आनेवाल प्रत्येक कठिनाई का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए, यही आदर्श विद्यार्थी की पहचान है।

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