2. विज्ञान का अभूतपूर्व विकास-बीसवीं शताब्दी में विज्ञान ने अभूतपूर्व उन्नति की है। जहाँ आज से सौ वर्ष पहले मनुष्य बैल-गाड़ियों और घोड़ों पर बैठकर यात्रा करता था और सौ मील की यात्रा करने में उसके कई दिन निकल जाते थे तथा परिश्रम और थकान के मारे उसका कचूमर निकल जाता था, वहाँ आज सैकड़ों मील की यात्रा वह चुटकियों ता है। विज्ञान के द्वारा प्रदत्त सुविधाओं से वह सैकड़ों मील दूर के दृश्य देख लेता है तथा मीलों दर बैठे व्यक्ति से वार्तालाप कर सकता है। यातायात के साधनों, दैनिक सुख-सुविधा की वस्तुओं, यान्त्रिक साधनों, तथा अनेक स्वचालित मशीनों आदि के आविष्कार से विज्ञान का आश्चर्यजनक विकास हुआ है।
3. विज्ञान मानव के लिए वरदान-विज्ञान से मानव को जितना लाभ हुआ है उतना उसे प्राचीन युग में ईश्वर आराधना या धर्माचरण से नहीं हुआ था। विज्ञान से समाज और व्यक्ति दोनों समान रूप से उपकृत हुए हैं। व्यक्ति का जीवन पग-पग में सरल और उच्चस्तरीय बन गया है। आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान ने इतने साधन उपलब्ध करा दिये हैं कि अब कोई काम असम्भव नहीं रह गया है। इसलिए विज्ञान अब मानव के लिए वरदान ही है।
4. विज्ञान मानव के लिए अभिशाप-वर्तमान में विज्ञान ने मनुष्य के महत्त्व और कार्यक्षेत्र का अमित विस्तार करके उसे बहुत ज्यादा व्यस्त बना दिया है। आज आदमी का जीवन एकदम नीरस और यन्त्र जैसा बन गया है। भौतिकता बढ़ रही है, पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है तथा विनाशकारी परमाणु हथियारों के आविष्कार से मानव-जाति के समूल विनाश का भय उपस्थित हो गया है। अतः विज्ञान का अतिभौतिकवादी प्रयोग मानवता के लिए अभिशाप बन गया है।
5. समाधान एवं उपसंहार-इस सांसारिक जीवन में मानव-हित का स्थान सर्वोपरि है। विज्ञान हमारी सुविधा के लिए है, हम विज्ञान की सुविधा के लिए नहीं हैं। अतः विज्ञान के द्वारा प्रदत्त सुविधाओं का महत्त्व तभी है, जब मनुष्य की मनुष्यता सुरक्षित रहे, वह अमानवीय न बन जाये तथा उसकी आत्मा सूखे नाले की तरह नीरस न हो जाये। विज्ञान को अभिशाप से वरदान बनाने का उत्तरदायित्व बुद्धिमान् और विवेकशील लोगों पर है। अतः विज्ञान मानव-जाति के लिए वरदान सिद्ध हो, हमें इस दिशा में सचेत रहना चाहिए।
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