Question
मेरी अविस्मरणीय रेल-यात्रा

Answer

यात्रा का उत्साह यह बात सन् 2005 की है। मुझे दिल्ली से चंडीगढ़ जाना था। मैं पिताजी के साथ था। मैं पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था। पिताजी ने बतलाया था कि दोपहर 12.30 पर नई दिल्ली से चलने वाली फ्लाईंग मेल से हमें चंडीगढ़ के लिए चलना है। यह मेरी प्रथम रेल-यात्रा थी। अतः मैं प्रात: से बहुत उत्साहित था।
स्टेशन का दृश्य हम 12.00 बजे ही नई दिल्ली स्टेशन पर पहुंच गए। साफ-सुथरा चहल-पहल से भरा रेलवे स्टेशन था। कोई कुली को आगे किए अटैचियाँ लिए आ रहा था, कोई अपना बैग सँभाले गाड़ियों की ओर लपका जा रहा था। 12.05 पर हमने अपनी जगह ढूंढ निकाली। मुझे खिड़की के पास बैठने का मौका मिला।
गाडी का दश्य ठीक 12.30 पर गाड़ी चली। लगभग सभी सीटें यात्रियों से भर गई थीं। लोग अपने-अपने सगे-संबंधियों के साथ किसी-न-किसी क्रिया में व्यस्त थे। अधिकांश लोग पत्र-पत्रिका, समाचार-पत्र या पुस्तक आदि पढ़ रहे थे। एकाध जगह ताश का खेल चल रहा था। बुजुर्ग लगने वाले यात्री देश-विदेश की चर्चा में व्यस्त थे।
गाडी से बाहर का दश्य गाड़ी के चलते ही मेरा ध्यान बाहर के दृश्यों की तरफ खिंच गया। मेरे लिए तो यह सर्जीव चलचित्र था। मैं दिल्ली से चंडीगढ़ के सारे दृश्यों को पी लेना चाहता था। मेरा ध्यान पटरी के काँटे बदलती गाड़ी की ओर गया। मैं समझ नहीं पाया कि गाड़ी कैसे उन आड़ी-तिरछी पटरियों में से अपना रास्ता ढूंढ़ पा रही है। यह मैं समझ पाऊं कि गाड़ी रूक गई। यह सब्जी मंडी स्टेशन था।
चहल-पहल- सब्जी मंडी से गाड़ी चली कि एक भक्ति-स्वर सुनाई दिया। यह कोई सूरदास जी थे, जो यात्रियों को गीत सुनाकर अपना पेट भरते थे। यात्रियों ने उसका मीठा गीत सुना और बदले में उसे पैसे दिए। अब खिड़की के बाहर हरे-भरे खेतों, पुलों, नदियों, मकानों, रेलवे-फाटकों, छोटे-छोटे रेलवे स्टेशनों की श्रृंखला शुरू हो गई, जिन्हें. मैं रूचिपूर्वक देखता रहा। मुझे सब कुछ भा रहा था। यह सब मेरे लिए नया था।
गाड़ी में खाने-पीने का सामान बेचने वाले, जूते-पालिश करने वाले, भीख मांगने वाले, खिलौने बेचने वाले आ-जा रहे थे। जहाँ जिस स्टेशन पर गाड़ी रूकती थी, वहीं चहल-पहल शुरू हो जाती थी। चाय, बोतल, पुस्तकें, पकौड़े आदि बेचने वाले अधीर हो उठते थे। इस सारी चहल-पहल में कब पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला आकर चला गया, मुझे पता ही न चला। मेरा ध्यान तो तब टूटा, जब पिताजी ने कहा बेटा पुरु! चलो जूते पहनो, स्टेशन आ गया है। मेरी वह प्रथम रेल-यात्रा आज भी मुझे स्मरण है।

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