विज्ञान ने आज मानव को अनेक उपहार दिए हैं। इन्हीं के कारण ही आज मानव जल, थल और आकाश का स्वामी बन बैठा है। विज्ञान ने जहाँ हमें अनेक प्रकार के वरदान दिए हैं, वहीं कुछ समस्याओं को भी जन्म दिया है, जिनमें प्रदूषण की समस्या प्रमुख है। ‘प्रदूषण’ का अर्थ है- विशेष प्रकार से दूषित होना। यानी पर्यावरण के संतुलन का दोषपूर्ण हो जाना। प्रदूषण के कारण ही जल, थल और वायु दूषित हो गई है।
सभ्यता के विकास के साथ जंगल कटते गए। ज्यों-ज्यों आबादी बढ़ी आवास के लिए अधिक स्थान की आवश्यकता पड़ी। खेती के लिए अधिक भूमि तथा ईंधन के लिए अधिक लकड़ी की आवश्यकता हुई । इस प्रकार भूमि की कमी को वनों की कटाई करके करते रहे। वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है। साथ ही सड़कों पर बढ़ते यातायात तथा औद्योगिक इकाइयों के कारण निकलते धुएँ से वायु प्रदूषित हो रहा है। आसमान में उड़ते विमानों, कल कारखानों तथा वाहनों आदि से प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। नगरों से निकलने वाला कचरा, गंदगी, कारखानों का प्रदूषित अवशेष नदियों में प्रवाहित करने से जल पीने योग्य नहीं रह गया। गंगा जैसी नदी जिसका जल पवित्र था वह आज प्रदूषण की चपेट में है। यह प्रदूषित जल पेड़-पौधे, जीव-जंतुओ और मानव-जीवन सभी के लिए हानिकारक है। धरती का जलस्तर भी गिर गया है। वाहन, लाउडस्पीकर, यान रेलगाड़ियाँ, कारखाने आदि चारों तरफ भरपूर ध्वनि-प्रदूषण फैलाते हैं। कारखाने विषैली गैस तथा धुआँ छोड़ते हैं। सड़कों पर लाखों की संख्या में दौड़ते वाहन कार्बन तथा अन्य गैस छोड़ते हैं जो मनुष्य ही नहीं वनस्पतियों तक के लिए हानिकारक हैं। बिजली बनाने के संयंत्र भी धुआँ और राख उगलते हैं। ये सब वायु को विषाक्त बना देते हैं। ये जहरीली हवा रक्तचाप, दमा, त्वचा संबंधी अनेक रोगों को जन्म देती है। इस प्रदूषित वायु के कारण शहरों के पेड़े-पौधे भी प्रभावित होते हैं। इस प्रकार वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण आदि प्रदूषण के प्रकार हैं।
बड़े-बड़े नगरों में आवास की भारी समस्या है। इसीलिए वहाँ झुग्गी झोपड़ियाँ बन जाती हैं जिसमें मज़दूर आदि रहते हैं। इसके कारण गंदगी होती है तथा भूमि प्रदूषण होती है। भूमि प्रदूषण के कारण अनेक रोगों का जन्म होता है।
यद्यपि प्रदूषण एक विश्वव्यापी समस्या है तथापि इसका एक मात्र समाधान वृक्षारोपण है। वृक्ष वातावरण को शुद्ध वायु प्रदान करते हैं। औद्योगिक इकाइयों को यदि घनी आबादी वाले क्षेत्रों से हटाकर नगरों से दूर स्थापित किया जाए, इससे प्रदूषण के विस्तार को रोका जा सकता है। वनों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगाई जानी चाहिए।