निर्देशन के तत्त्व-निर्देशन कोई एक कार्य नहीं वरन् अनेक कार्यों या तत्त्वों का समूह है।
निर्देशन के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-
1. पर्यवेक्षण-पर्यवेक्षण निर्देशन कार्य का एक प्रमुख तत्त्व है। इसका अभिप्राय कार्य पर अधीनस्थों की देखभाल करना और उसकी समस्याओं के समाधान में मदद करना है ताकि संस्था के सभी कार्य योजनाओं के अनुरूप हो सकें।
2. नेतृत्व-निर्देशन का एक प्रमुख तत्त्व नेतृत्व है। नेतृत्व व्यक्तियों के व्यवहार को प्रभावित करने की वह प्रक्रिया है, जो उन्हें स्वत: ही सांगठनिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए प्रतिस्पर्द्धित करती है। यह संकेत करती है कि किसी व्यक्ति की उस योग्यता को जो अनुयायियों के मध्य अच्छे पारस्परिक सम्बन्धों को बनाये रखने में तथा उन्हें अभिप्रेरित करने की जिससे वे सांगठनिक उद्देश्यों की पूर्ति में अपना योगदान दे सकें।
3. अभिप्रेरणा-अभिप्रेरणा का अर्थ है किसी भी कार्य या क्रिया को प्रेरित अथवा प्रभावित करना। व्यवसाय के सन्दर्भ में, इसका अर्थ उस प्रक्रिया से है जो अधीनस्थों को निर्धारित सांगठनिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक वांछित रूप से कार्य करने के लिए तैयार करती है। इस प्रकार अभिप्रेरणा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोगों को, वांछित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रेरित किया जाता है। यह व्यक्तियों की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि पर निर्भर करती है।
4. सम्प्रेषण-सम्प्रेषण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा भाव, विचार, तथ्य, अनुभव इत्यादि का आदानप्रदान होता है। जिसका उद्देश्य दो व्यक्तियों के मध्य या आपस में आपसी समझ पैदा करना है।