Question
राष्ट्र के प्रति हमारा नैतिक दायित्व

Answer

1. प्रस्तावना - प्रत्येक समाज और राष्ट्र का भविष्य उसके सुनागरिकों पर निर्भर रहता है। राष्ट्रीय उत्थान के लिए केवल भौतिक समृद्धि ही पर्याप्त नहीं रहती है, इसके लिए तो वैचारिक, शैक्षिक, बौद्धिक एवं नैतिक चिन्तन की। आवश्यक है। वर्तमान काल में लोकतन्त्रात्मक शासन - व्यवस्था के अन्तर्गत अधिकारों की रक्षा और राजनीतिक सत्ता को प्राप्त करने की बात हर कोई करता है, परन्तु कर्त्तव्य - बोध और नैतिक दायित्व की भावना लोगों में वैसी नहीं दिखाई देती है। हमारे सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन में नैतिकता की कमी आ गई है। इस कारण हम राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को भूलते जा रहे हैं। 

2. वर्तमान राष्ट्रीय स्वरूप - स्वतन्त्रता प्राप्ति के अनन्तर देश के कर्णधारों ने संविधान का निर्माण कर संघीय शासन - व्यवस्था का प्रवर्तन किया और इसे धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्र का स्वरूप दिया। आज विश्व में भारतीय लोकतन्त्र को सबसे बड़ा माना जाता है और इसमें सामाजिक विकास की प्रक्रिया भी निरन्तर चल रही है। परन्तु आज सारे देश में नवयुवकों में बेरोजगारी, महँगाई तथा भ्रष्टाचार के कारण उद्दण्डता, अनुशासनहीनता और तोड़ - फोड़ की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सरकारी कर्मचारियों में भ्रष्टाचार एवं अनुत्तरदायित्व की भावना फैल रही है। राजनीति में भाई - भतीजावाद, स्वार्थ - लोलुपता, चरित्रहीनता और छल - कपट अत्यधिक बढ़ रहा है। इससे हमारा राष्ट्रीय चरित्र दूषित हो रहा है। 

3. राष्ट्र के प्रति हमारा नैतिक दायित्व - अपने राष्ट्र के नागरिक होने से हमें जहाँ संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार प्राप्त हैं, वहाँ हमारे कुछ कर्त्तव्य भी हैं। इसलिए हमें अपने नैतिक दायित्व का निर्वाह करने में पूर्णतया सावधान रहना चाहिए। हमें ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए, जिससे संविधान का उल्लंघन हो, राष्ट्रीय विकास और सामाजिक सद्भाव अवरुद्ध हो हमें अपने परिवार, अपने गाँव या नगर तथा प्रदेश आदि के साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का हित - चिन्तन करना चाहिए। 

राष्ट्र की सुरक्षा, चहुँमुखी प्रगति, जन - कल्याण, सामाजिक उन्नति और सुव्यवस्था के प्रति हमें अपने दायित्वों का निर्वाह करना चाहिए। अपने राष्ट्र में सच्चरित्र का निर्माण करना हमारा प्रथम दायित्व है, क्योंकि सच्चरित्र से ही समाज को मंगलमय बनाया जा सकता है। अतः हमारा राष्ट्र के प्रति यह नैतिक दायित्व है कि हम त्याग - भावना, सच्चरित्रता. देश - भक्ति, समाज - सेवा आदि श्रेष्ठ गुणों को अपनाकर पूरे समाज को भी इसी तरह निष्ठावान् बनावें। 

4. उपसंहार - राष्ट्र - निर्माण का कार्य जन - जागृति एवं कर्त्तव्य - बोध से ही सम्पन्न हो सकता है। उक्त सभी बातों का चिन्तन करते हुए दायित्व का निर्वाह करते रहें, तभी हम राष्ट्रीय कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। इसलिए हमारा यह नैतिक दायित्व है कि हम सुनागरिक बनें, अपनी चारित्रिक एवं नैतिक उन्नति का प्रयास करें।

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