बिहार पर वैश्वीकरण के दो प्रकार के प्रभाव पड़े हैं - सकारात्मक तथा नकारात्मक ।
बिहार में वैश्वीकरण का सकारात्मक प्रभाव -
(ⅰ) कृषि उत्पादन में वृद्धि - कृषि उत्पादन में वृद्धि से किसानों में खुशहाली बढ़ी है। 1980-83 में बिहार प्रति हेक्टेयर औसत मूल्य जहाँ 3,680 था वहीं 1992-95 में 5,678 हो गया।
(ii) निर्यात में वृद्धि - वैश्वीकरण के कारण बिहार से किए गए निर्यात में वृद्धि हुई है। निर्यात की वस्तुओं में अधिकतर कृषिगत वस्तुएँ ही हैं।
(ii) निर्धनता में कमी - वैश्वीकरण के कारण राज्य में निर्धनता में कमी आई है। निर्धनता रेखा से नीचे आने वालों में काफी कमी आई है।
(iv) विश्व स्तरीय उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धता - वैश्वीकरण के कारण ही बिहार के बाजारों में विश्व स्तरीय उपभोक्ता वस्तुएँ उपलब्ध हो गई हैं।
बिहार में वैश्वीकरण का नकारात्मक प्रभाव -
(i) कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों की उपेक्षा - बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। यहाँ बड़े उद्योगों की काफी कमी है। कृषि पर भी जितना निवेश होना चाहिए, नहीं हो रहा है। कृषि पर आधारित उद्योगों की भारी कमी है। जो उद्योग थे, वे भी बंद हो चुके हैं।
(ii) रोजगार व विपरीत प्रभाव बिहार में छोटे पैमाने के कुटीर उद्योग के क्षेत्र में उद्योग - धंधे तो हैं, लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनी की भड़कीली वस्तुओं के सामने इनकी माँग बहुत कम हो गई है। कुटीर और लघु उद्योग पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ा है।
(iii) आधारभूत संरचना की कमी - बिहार सरकार के काफी प्रयास के बावजूद अभी तक बिहार में आधारभूत संरचना की काफी कमी है। सड़कों का अभी तक पूर्ण विकास नहीं हो पाया है तथा बिजली की भी किल्लत है।
(iv) निवेश की कमी - आधारभूत संरचना की कमी के कारण कोई उद्योगपति यहाँ निवेश के लिए मन से तैयार नहीं है। कहते तो सभी हैं और सर्वेक्षण आदि भी करते हैं, लेकिन बाद में नेताओं की परेशानियों के कारण दुबक जाते हैं।