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लघु उत्तरीय प्रश्न (4 गुण) - अर्थशास्त्र

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Question 14 Marks
वैश्वीकरण का आम आदमी पर पड़े प्रभाव की चर्चा करें।
Answer
वैश्वीकरण का आम आदमी पर अच्छा और बुरा दोनों प्रभाव पड़े हैं। सर्वप्रथम अच्छा प्रभाव निम्न है

1. उपयोग के आधनिक संसाधनों की उपलब्धता- वैश्वीकरण के कारण दुनिया के सभी देशों के उच्चतम उत्पादन लोगों को उपयोग के लिए उपलब्ध हो गया है। उदाहरण के लिए पहले जहाँ आम आदमी रेडियो से मनोरंजन प्राप्त करता था। अब उनके लिए विभिन्न कंपनियों के रंगीन
टेलीविजन जैसी चीजों की उपलब्धता हो गई है।

2. रोजगार की बढ़ी हई संभावना वैश्वीकरण के कारण नए-नए क्षेत्र खुल गए हैं। जिससे कुशल श्रमिकों के लिए अधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध हो गए हैं।

3. आधुनिक तकनीक की उपलब्धता वैश्वीकरण के कारण विश्व के विकसित देशों के आधुनिक तकनीक अन्य विकासशील देशों में आसानी से उपलब्ध होने लगे हैं। जिससे आम लोगों के लिए आधुनिकतम तकनीक के उपयोग का दरवाजा खुल गया है। सच कहा जाए तो, भारत जैसे विकासशील देश में आम लोगों पर वैश्वीकरण का बुरा प्रभाव ही पड़ा। वैश्वीकरण से आम लोगों पर निम्नलिखित बुरा प्रभाव पड़ा है

1. बेरोजगारी बढ़ने की आशंका- वैश्वीकरण के कारण आधुनिक संयंत्रों से मशीनी उत्पादन को बढ़ावा मिला है, जिसके कारण समाज के.अधिकतम श्रम शक्ति जो अर्द्धकुशल या अकुशल हैं, ऐसे लोगों में बेरोजगारी के बढ़ने की संभावना हो गई है।

2. उद्योग एवं व्यवसाय के क्षेत्र में बढ़ती हई प्रतियोगिता- विदेशी पूजी एवं विदेशी कंपनियों के बिना किसी प्रतिबंध के आयात होने से आम लोगों में बेरोजगारी फैलने की संभावना बढ़ गई है।

3. श्रम संगठनों पर बरा प्रभाव- श्रमिक संगठनों के द्वारा आम मजदूरों की न्यूनतम माँगों को संगठित रूप से माँग की जाती है जिससे श्रमिकों को सामान्य वेतन एवं सुविधाएं उपलब्ध होने लगती हैं। अब वैश्वीकरण के कारण श्रम कानूनों में लचीलापन आया है जिससे श्रमिक संगठन भी कमजोर हो गया है। इससे आम श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक मिलने में कठिनाई आने लगी है।
4. मध्यम एवं छोरे उत्पादकों की कठिनाई- वैश्वीकरण के कारण मध्यम एवं छोटे ‘उत्पादकों के लिए अपने उत्पादन को सक्षम रखने में अनेक कठिनाइयाँ होने लगी हैं। प्रकृति का यह एक सामान्य नियम है कि पानी में बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को खा जाती हैं। उसी तरह वैश्वीकरण के कारण जो बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ देश में आने लगी हैं, उससे मध्यम और छोटे उद्योग और व्यवसाय के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है।

5. कषि एवं ग्रामीण क्षेत्र का संकट वैश्वीकरण के कारण अब देश और विदेश के बड़े-बड़े पूँजीपति फार्म हाऊस बनाने लगे हैं जिसमें कृषि के क्षेत्र में भी अधिक पूंजी निवेश के द्वारा कम श्रम-शक्ति से ही अधिक उत्पादन प्राप्त करने लगे हैं। इस स्थिति में गाँव के मध्यम एवं छोटे श्रेणी के किसानों के लिए अनेक प्रकार के संकट उत्पन्न हो गए हैं। इस प्रकार वैश्वीकरण के आम लोगों पर कुछ अनुकूल एवं अधिक विपरीत प्रभावों को देखने के बाद हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि वैश्वीकरण से आम लोगों को लाभ से अधिक हानि होने की संभावना है। यह सत्य है कि वैश्वीकरण से पूँजी उत्पाद और आय में वृद्धि होगी।

किन्तु वृद्धि का यह लाभ समा के मुट्ठी भर धनी एवं उच्च शिक्षा प्राप्त लोग ही प्राप्त कर सकेंगे। वैश्वीकरण की स्थिति में ऊँ आय के अमीर व्यक्तियों की आय बढ़ती चली जाएगी और 85 प्रतिशत की सर्वाधिक संख्या में आम लोगों का जीवन कठिन हो जाने की संभावना है।
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Question 24 Marks
भारत में वैश्वीकरण के पक्ष में तर्क दें।
Answer
भारत में वैश्वीकरण के पक्ष में निम्नलिखित तर्क इस प्रकार हैं
  1. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहन वैश्वीकरण से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रोत्साहित होगा, जिससे भारत जैसे विकासशील देश अपने विकास के लिए पूँजी प्राप्त कर सकेगा।
  2. प्रतियोगी शक्ति में वृद्धि-वैश्वीकरण की नीति के फलस्वरूप भारत जैसे विकासशील देशों की प्रतियोगी शक्ति में वृद्धि होगी और अर्थव्यवस्था का त्वरित विकास हो सकेगा।
  3. नयी प्रौद्योगिकी के प्रयोग में सहायक वैश्वीकरण भारत जैसे विकासशील देशों को विकसित देशों द्वारा तेयार की गई नई प्रौद्योगिकी के प्रयोग में सहायता प्रदान करता है।
  4. अच्छी उपभोक्ता वस्तुओं की प्राप्ति–वैश्वीकरण भारत जैसे विकासशील देशों को अच्छी-अच्छी गुणवत्ता की उपभोग वसतुओं को सापेक्षतः कम कीमत पर प्राप्त करने के योग्य बनाता है।
  5. नये बाजार तक पहुंचना-वैश्वीकरण के फलस्वरूप भारत जैसे विकासशील देश के लिए दुनिया के बाजारों तक पहुँच का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा।
  6. उत्पादन तथा उत्पादिता के स्तर को उन्नत करना-वैश्वीकरण से ज्ञान का तेजी से प्रसार होता है और इसके परिणामस्वरूप भारत जैसे विकासशील देश अपने उत्पादन और उत्पादिता – के स्तर को उन्नत कर सकते हैं। अतः यह उत्पादिता के अंतर्राष्ट्रीय स्तर प्राप्त करने के लिए गति न करता है।
  7. किंग तथा वित्तीय क्षेत्र में सपार-वैश्वीकरण के फलस्वरूप विश्व के अन्य देशों ‘ के सम्पर्क में आने से बैंकिंग तथा वित्तीय क्षेत्र की कुशलता में सुधार होगा।
  8. मानवीय पूँजी की क्षमता का विकास- शिक्षा तथा कौशल प्रशिक्षण वैश्वीकरण के प्रमुख घटक हैं। इससे मानवीय विकास को बढ़ावा मिलता है।
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Question 34 Marks
वैश्वीकरण का बिहार पर पड़े प्रभावों को बतायें।
Answer
वैश्वीकरण के कारण बिहार का आर्थिक परिवेश भी बदलता जा रहा है। आर्थिक विकास के लिए अन्य राज्यों की तरह बिहार में भी अधिक पूंजीनिवेश की आवश्यकता है। वैश्वीकरण का बिहार के जनजीवन पर न केवल सकारात्मक प्रभाव पड़े हैं बल्कि इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी है जिसे हम निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।
सकारात्मक प्रभाव –
1. कृषि उत्पादन में वृद्धि-वैश्वीकरण के बाद बिहार के कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। बिहार में खाद्यान्नों का उत्पादन 1977-78 में 102 लाख टन था जो 1996-97 में बढ़कर 141 लाख टन हो गया। इसी तरह 1980-83 की अवधि में बिहार में प्रति हेक्टेयर फसलों का औसत मूल्य 3,680 रु. या जो 1992-95 की अवधि में बढ़कर 5,678 रु. हो गया।
2.निर्यातों में वृद्धि वैश्वीकरण के फलस्वरूप बिहार से किये गये निर्यातों में वृद्धि हुई है। इन निर्यातों में कुछ खाद्य एवं व्यावसायिक फसलों का निर्यात, कुटीर तथा लघु उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं का निर्यात तथा फलों का निर्यात शामिल है। फलों के निर्यात के अन्तर्गत बिहार लीची, आम तथा मखाना के लिए प्रसिद्ध है।
3. विदेशी प्रत्यक्ष विनियोग की प्राप्ति-वैश्वीकरण के फलस्वरूप बिहार में विदेशी प्रत्यक्ष विनियोग भी हुआ है और विदेशी प्रत्यक्ष विनियोग के लिए काफी दिलचस्पी दिखायी गयी है। इससे भविष्य में विदेशी प्रत्यक्ष विनियोग में काफी वृद्धि की आशा की जा सकती है।
4.शुद्ध राज्य घरेलू उत्पादन तथा प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पादन में वृद्धि-वैश्वीकरण के फलस्वरूप चालू मूल्यों पर राज्य के शुद्ध घरेलू उत्पादन तथा प्रति व्यक्ति शुद्ध घरेलू उत्पादन में वृद्धि हुई है। दूसरे शब्दों में इस अवधि में राज्य की कुल आय तथा प्रति व्यक्तिआय में वृद्धि हुई है।
5.निर्धनता में कमी-वश्वीकरण के पश्चात् राज्य में निर्धनता में उल्लेखनीय कमी हुई है। बिहार में निर्धनता की रेखा से नीचे आनेवाली जनसंख्या 1993-94 में 54.96 थी जो 1999-2000 में घटकर, 42.60% हो गयी।
6. विश्वस्तरीय उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धता वैश्वीकरण के कारण बिहार के बाजारों में विश्वस्तरीय उपभोक्ता वस्तुएं उपलब्ध हो गयी हैं। विभिन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मोबाईल फोन, जूते, रेडिमेड वस्त्र आदि अब बिहार के बाजारों में भी उपलब्ध हैं।
7.रोजगार के अवसरों में वृद्धि–वैश्वीकरण के फलस्वरूप रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है। उच्च शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्राप्त लोगों के लिए विदेशों तथा देश के अन्य भागों में रोजगार के नये अवसर उपलब्ध हुए हैं। वैश्वीकरण का ही प्रभाव है कि बिहार के बहुत सारे सॉफ्टवेयर इंजीनियर आज विदेशों में नौकरी कर रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका एवं इंग्लैंड में बड़ी संख्या में सॉफ्टवेयर इंजीनियर नौकरी कर रहे हैं।
8. बहुराष्ट्रीय बैंक एवं बीमा कम्पनियों का आगमन-वैश्वीकरण का ही प्रभाव है कि बिहार में बहुराष्ट्रीय बैंकों जैसे HSBC बैंक आदि का आगमन हुआ। बिहार में बहुराष्ट्रीय बीमा कम्पनियाँ भारतीय कम्पनियों के साथ मिलकर संयुक्त कम्पनी के रूप में उत्तर रही हैं। जैसे बजाज एलियांज, बिरला सनलाइट, टाटा ए. आई. जी., अवीवा आदि।
नकारात्मक प्रभाव:
(i) कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों की उपेक्षा-बाहर एक कृषि प्रधान राज्य है। यहाँ बड़े पैमाने पर उद्योग-धंधे काफी कम हैं। राज्य में कृषि पर किया गया निवेश संतोषजनक नहीं है। यहाँ कृषि आधारित उद्योगों के विकास की संभावना काफी है। लेकिन इन उद्योगों में वैश्वीकरण के पश्चात् जितना निवेश होना चाहिए था उतना नहीं हुआ है।
(ii) कटीर एवं लघु उद्योग पर विपरीत प्रभाव-बिहार में बड़े पैमाने के उद्योग-धन्धे कम हैं। यहाँ कुटीर एवं लघु उद्योग ज्यादा हैं। वैश्वीकरण के कारण छोटे पैमाने के उद्योगों जैसे कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योग के लिए खतरा हो गया है, क्योंकि उनके द्वारा निर्मित वस्तुओं को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा निर्मित वस्तुओं का सामना करना पड़ता है जो क्वालिटी में इनसे अच्छी एवं सस्ती होती हैं। जैसे–चीन द्वारा निर्मित खिलौने से हमारा बाजार पट गया है। चीनी खिलौनों ने हमारे कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव डाला है।
(iii) रोजगार पर विपरीत प्रभाव-चूंकि बिहार में छोटे पैमाने के उद्योग-धंधे ज्यादा हैं । जैसे- कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योग आदि। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा निर्मित वस्तुओं के आने से इन उद्योगों की बहुत सारी इकाइयाँ बंद हो गयीं। जिसके चलते बहुत सारे श्रमिक बेरोजगार हो गये।
(iv) आधारभूत संरचना के कम विकास के कारण कम निवेश-बिहार में पूँजी निवेश उतना नहीं हुआ है जितना वैश्वीकरण के फलस्वरूप देश के अन्य राज्यों में हुआ है। इसका कारण है कि बिहार में आधारभूत संरचना की कमी है। यहाँ सड़क, बिजली विश्वस्तरीय होटल एवं हवाई अड्डा की कमी है।
      इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण के सकारात्मक अथवा लाभकारी प्रभाव इनके नकारात्मक प्रभाव की तुलना में अधिक वजन रखते हैं। वैश्वीकरण का जो भी प्रभाव पड़ा है उससे बिहार को लाभ ही हुआ है।
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Question 44 Marks
एक बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा किसी देश में अपनी उत्पादन इकाई लगाने के निर्णय पर किन बातों का प्रभाव पड़ता है ?
Answer
एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी द्वारा किसी क्षेत्र में अपनी उत्पादन इकाई लगाने के निर्माण पर निम्नलिखित बातों का प्रभाव पड़ता है सस्ते श्रम, सस्ता कच्चा माल, उपभोक्ता बाजार एवं अन्य संसाधन।

कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी लाभ कमाने की दृष्टि से ही किसी अन्य देश में अपनी उत्पादन इकाई लगाती है, अतः वह सर्वप्रथम यह देखती है कि अमुक देश में सस्ते दर पर श्रमिक उपलब्ध हैं या नहीं। जहाँ सस्ते श्रमिक उपलब्ध होंगे वहाँ की वह अपनी इकाई लगायेगी।

दूसरी बात जो बहुराष्ट्रीय कंपनी के निर्णय को प्रभावित करनी है, वह है सस्ता कच्चा माल। जिस देश के बहुराष्ट्रीय कंपनी की इकाई में प्रयुक्त होने वाले कच्चे माल की प्रचुरता होगी और सस्ते में उपलब्ध होंगे वहाँ की वह अपनी इकाई लगायेगी।

तीसरी चीज है बाजार। बहुराष्ट्रीय कंपनी यह देखती है कि जिस इकाई को वह लगाने जा रही है उसके उत्पाद के उपभोक्ता उस देश में काफी संख्या में हैं। अतः वहाँ ही वह अपनी इकाई लगाती है। यदि उपभोक्ता ही न मिले तो उत्पादन किसके लिए होगा।

इनके अतिरिक्त अन्य संसाधनों की उपलब्धता पर भी बहुराष्ट्रीय कंपनी ध्यान देती है जैसे यातायात, शक्ति उस देश के लोगों का जीवन स्तर पर्यावरण आदि।
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Question 54 Marks
उदारीकरण से आप क्या समझते हैं ? इस दृष्टि से भारत सरकार की वर्तमान नीति क्या है?
Answer
प्रायः, सरकारें विदेश व्यापार पर कई प्रकार क नियंत्रण या प्रतिबंध लगा देती हैं जिन्हें व्यापार अवरोधक कहते हैं। किसी भी देश की सरकार व्यापार अवरोधक का प्रयोग अपने विदेश व्यापार में कमी या वृद्धि तथा आयातित वस्तुओं की मात्रा या प्रकार को निर्धारित करने के लिए कर सकती है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात भारत सरकार ने भी विदेश व्यापार पर कई प्रकार के नियंत्रण और प्रतिबंध लगा दिए थे। घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए तथा उन्हें विदेशी प्रतिस्पर्धा से संरक्षण प्रदान करने के लिए यह आवश्यक माना गया था।

लेकिन, कुछ समय पूर्व सरकार ने यह अनुभव किया कि अब भारतीय उत्पादकों के लिए विदेशी प्रतिस्पर्धा का सामना करने का समय आ गया है। अतः, उसने अपनी नवीन आर्थिक नीति के अंतर्गत अर्थव्यवस्था को खोलने तथा अनावश्यक नियंत्रणों को समाप्त करने का एक व्यापक कार्यक्रम अपनाया है जिसे उदारीकरण की संज्ञा दी जाती है।

प्रायः, सरकारें विदेशी व्यापार पर कई प्रकार के नियंत्रण या अवरोध लगा देती है जिन्हें व्यापार अवरोधक (trade barrier) कहते हैं। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात भारत सरकार ने भी विदेश व्यापार एवं विदेशी निवेश पर कई प्रकार के नियंत्रण और प्रतिबंध लगा दिए थे। घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन देने तथा देश के उत्पादकों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से संरक्षण प्रदान करने के लिए यह आवश्यक माना गया था। 1950 एवं 1960 के दशक भारतीय उद्योगों के विकास के प्रारंभिक चरण थे।

इस अवस्था में विदेशी प्रतियोगिता इनके लिए घातक हो सकती थी। यही कारण है कि इस काल में सरकार ने मशीनरी, पेट्रोलियम, उर्वरक आदि जैसी कुछ अति आवश्यक वस्तुओं के आयात की ही अनुमति प्रदान की थी। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि विश्व के सभी विकसित देशों ने अपने विकास के प्रारंभिक काल में घरेलू उत्पादकों को विभिन्न प्रकार से संरक्षण प्रदान किया है।

लेकिन, कुछ समय पूर्व सरकार ने यह अनुभव किया कि अब भारतीय उद्योगों के लिए विश्व प्रतिस्पर्धा का सामना करने का समय आ गया है। अतएव, उसने 1991 में अपनी आर्थिक नीतियों में कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए जिन्हें नवीन आकि नीति (NewEconomic Policy, NEP) की संज्ञा दी गई है। इस नीति के लागू होने के बाद अर्थव्यवस्था को अधिक उदार बनाने के लिए सरकार ने विभिन्न नियंत्रणों को समाप्त करने का एक व्यापक कार्यक्रम अपनाया है। इसके अंतर्गत निर्यात एवं आयात की अधिकांश वस्तुओं को लाइसेंस-मुक्त कर दिया गया है तथा विदेश व्यापार एवं विदेशी निवेश पर लगाए गए अधिकांश नियंत्रण और प्रतिबंध हटा दिए गए हैं।
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Question 64 Marks
1991 के आर्थिक सुधारों से आप क्या समझते हैं ? भारत में इन सुधारों की आवश्यकता क्यों हुई?
Answer
आर्थिक सुधारों के अंतर्गत वे सभी तरीके शामिल है जो भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिए 1991 में अपनाए गए। इन सुधारों का मुख्य बल अर्थव्यवस्था की उत्पादकता और कुशलता में वृद्धि के लिए एक प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण का निर्माण करने पर है। हमारे देश में आर्थिक सुधारों का प्रारंभ विदेशी व्यापार की प्रतिकूलता तथा विभिन्न कारणों से देश में उत्पन्न विदेशी विनिमय के गंभीर संकट की पृष्ठभूमि में हुआ था। अतएव, आर्थिक सुधार की नीतियों में व्यापार एवं पूँजी प्रवाह संबंधी सुधारों को विशेष महत्व दिया गया है।

विगत वर्षों के अंतर्गत एशिया के कई कम विकसित देशों के तीव्र विकास से यह स्पष्ट हो गया है कि प्रशुल्क एवं व्यापार अवरोधों में कमी होने से निर्यात के साथ ही घरेलू बाजार के लिए उत्पादन बढ़ता है। इससे निर्यातों में वृद्धि होती है और आर्थिक संवृद्धि की दर तीव्र होती है। यही कारण है कि जुलाई 1991 से सरकार ने व्यापार के क्षेत्र में ऐसे कई सुधार किए हैं जो हमारे देश को विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ने में सहायक हुए हैं। इनमें रुपये का अवमूल्यन, व्यापार मंद में और इसके पश्चात चालू मद में रुपये की पूर्ण परिवर्तनशीलता, आयात प्रणाली का उदारीकरण, प्रशुल्क-दरों में कटौती तथा निर्यात-वृद्धि के लिए अपनाए गए उपाय महत्वपूर्ण हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (direct foreign investment) द्वारा सरकार ने पूँजी प्रवाह के अवरोधों को दूर करने का प्रयास किया है।

इस प्रकार, भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की दृष्टि से 1991 में प्रारंभ किए गए आर्थिक सुधार अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात भारत सरकार ने आर्थिक विकास के लिए जो नीति अपनाई उसमें कई दोष थे। इस नीति के अंतर्गत देश के आर्थिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्र को आवश्यकता स अधिक महत्व दिया गया था, निजी निवेश एवं आयात-निर्यात पर कई प्रकार के नियंत्रण और प्रतिबंध लगाए गए थे तथा केंद्रीय नियोजन की नीति अपनाई गई थी। यह नीति लगभग 40 वर्षों तक लागू रही तथा बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया। इसका भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसी समय कुछ अन्य घटनाएँ भी हुई जिनसे हमारा आर्थिक संकट और बढ़ गया।

इनमें सोवियत संघ का विघटन, खाड़ी युद्ध, सरकार के बजट, राजकोषीय घाटे ने अत्यधिक वृद्धि आदि महत्वपूर्ण थे। इसके फलस्वरूप; हमारे विदेशी व्यापार की प्रतिकूलता बहुत बढ़ गई और देश के सामने विदेशी विनिमय का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। अतः, जुलाई 1991 में भारत सरकार द्वारा आर्थिक नीति में सुधार की रणनीति अपनाई गई। इस नीति को नवीन आर्थिक नीति की संज्ञा दी गई तथा उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण इसके प्रमुख अंग हैं। यही कारण है इस नीति को उदारीकरण, निजीकरण एव वैश्वीकरण(liberalisation, privatisation and globalisation, LPG) की नीति भी कहते हैं।
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Question 74 Marks
बहुराष्ट्रीय निगमों से आप क्या समझते हैं ? इन्होंने किस प्रकार विभिन्न देशों के उत्पादन को जोड़ने का कार्य किया है ?
Answer
बहुराष्ट्रीय कंपनी वह कंपनी है जिसका एक से अधिक देशों उत्पादन पर नियंत्रण एवं स्वामित्व होता है। ये कंपनियाँ विभिन्न देशों में पूँजी का निवेश करती है। जिनको प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश कहते हैं। कोका-कोला, सैमसंग, इंफोसिस इसी श्रेणी में आते हैं। इनके द्वारा किया गया निवेश अरबों रुपयों में होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने विभिन्न देशों के उत्पादन को जोड़ने का कार्य किया है।

इन निगमों का मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ अर्जित करना होता है। इसलिए ये कंपनियाँ या निगम उन देशों में अपने कारखाने और संयंत्र को स्थापित करते हैं जहाँ कम वेतन पर कुशल श्रमिक उपलब्ध हो, उत्पादन के कारकों की आपूर्ति सुनिश्चित हो तथा सड़क, बिजली पानी आदि जैसे आधारभूत संरचनात्मक सुविधाएँ वर्तमान हो। विदेशी उत्पादकों एवं निवेशकों के प्रति सरकार की नीति भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्थापित होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कई बार बहुराष्ट्रीय निगम अन्य देशों की स्थानीय कंपनियों के साथ संयुक्त रूप से उत्पादन करते हैं। बहुराष्ट्रीय निगमों के निवेश का सबसे सामान्य तरीका अन्य देशों की स्थानीय कंपनियों को खरीदना और उसके पश्चात् उत्पादन का विस्तार करना है।

इस प्रकार, बहुराष्ट्रीय निगम कई प्रकार से अपने उत्पादन-कार्य का विस्तार कर रहे हैं। इनकी उत्पादक गतिविधियों से सुदूर स्थानों का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है तथा एक-दूसरे से जुड़ता जा रहा है।
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Question 84 Marks
1991 के आर्थिक सुधारों का वर्णन करें।
Answer
1991 के आर्थिक सुधारों को भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। ये सुधार भारत सरकार द्वारा आर्थिक संकट से उबरने और देश की आर्थिक व्यवस्था को उदार बनाने के लिए किए गए थे। इन सुधारों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं -
मुख्य सुधार -
(i) उदारीकरण :
  • लाइसेंस राज को समाप्त कर दिया गया।
  • उद्योगों को लाइसेंस प्राप्ति की आवश्यकता से मुक्त किया गया।
  • विदेशी निवेश पर प्रतिबंधों को कम किया गया।
  • ब्याज दरों और विदेशी व्यापार को अधिक स्वतंत्र किया गया।
(ii) निजीकरण :
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) का निजीकरण किया गया।
  • कई सरकारी उपक्रमों में निजी क्षेत्र को भागीदारी की अनुमति दी गई।
  • सरकारी कंपनियों में विनिवेश किया गया।
(iii) वैश्वीकरण :
  • भारतीय बाजार को विदेशी निवेशकों और कंपनियों के लिए खोला गया।
  • आयात शुल्क में कमी की गई और व्यापार बाधाओं को हटाया गया।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाया गया।
    1991 के आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दी। इन नीतियों के कारण भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी एक मजबूत स्थिति बनाई। हालांकि, इन सुधारों के प्रभावों का संतुलन बनाए रखना आज भी एक बड़ी चुनौती है।
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Question 94 Marks
वैश्वीकरण के बिहार पर पड़े प्रभावों को बताएँ।
Answer
बिहार पर वैश्वीकरण के दो प्रकार के प्रभाव पड़े हैं - सकारात्मक तथा नकारात्मक ।
बिहार में वैश्वीकरण का सकारात्मक प्रभाव -
(ⅰ) कृषि उत्पादन में वृद्धि - कृषि उत्पादन में वृद्धि से किसानों में खुशहाली बढ़ी है। 1980-83 में बिहार प्रति हेक्टेयर औसत मूल्य जहाँ 3,680 था वहीं 1992-95 में 5,678 हो गया।
(ii) निर्यात में वृद्धि - वैश्वीकरण के कारण बिहार से किए गए निर्यात में वृद्धि हुई है। निर्यात की वस्तुओं में अधिकतर कृषिगत वस्तुएँ ही हैं।
(ii) निर्धनता में कमी - वैश्वीकरण के कारण राज्य में निर्धनता में कमी आई है। निर्धनता रेखा से नीचे आने वालों में काफी कमी आई है।
(iv) विश्व स्तरीय उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धता - वैश्वीकरण के कारण ही बिहार के बाजारों में विश्व स्तरीय उपभोक्ता वस्तुएँ उपलब्ध हो गई हैं।
बिहार में वैश्वीकरण का नकारात्मक प्रभाव -
(i) कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों की उपेक्षा - बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। यहाँ बड़े उद्योगों की काफी कमी है। कृषि पर भी जितना निवेश होना चाहिए, नहीं हो रहा है। कृषि पर आधारित उद्योगों की भारी कमी है। जो उद्योग थे, वे भी बंद हो चुके हैं।
(ii) रोजगार व विपरीत प्रभाव बिहार में छोटे पैमाने के कुटीर उद्योग के क्षेत्र में उद्योग - धंधे तो हैं, लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनी की भड़कीली वस्तुओं के सामने इनकी माँग बहुत कम हो गई है। कुटीर और लघु उद्योग पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ा है।
(iii) आधारभूत संरचना की कमी - बिहार सरकार के काफी प्रयास के बावजूद अभी तक बिहार में आधारभूत संरचना की काफी कमी है। सड़कों का अभी तक पूर्ण विकास नहीं हो पाया है तथा बिजली की भी किल्लत है।
(iv) निवेश की कमी - आधारभूत संरचना की कमी के कारण कोई उद्योगपति यहाँ निवेश के लिए मन से तैयार नहीं है। कहते तो सभी हैं और सर्वेक्षण आदि भी करते हैं, लेकिन बाद में नेताओं की परेशानियों के कारण दुबक जाते हैं।
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Question 104 Marks
वैश्वीकरण को संभव बनाने वाले कारकों का वर्णन करें।
Answer
वैश्वीकरण को संभव बनाने वाले प्रमुख कारक निम्न हैं-
(i) तकनीकी प्रगति में परिवर्तन वैश्वीकरण की प्रक्रिया को तीव्र करने में प्रौद्योगिकी का काफी महत्त्वपूर्ण स्थान है। आज तकनीकी प्रगति के विकास के कारण ही समय, स्थान एवं दूरियाँ नजदीकियों में बदल गयी है। विश्व एक वैश्विक गाँव-सा बनकर रह गया है। यातायात एवं दूरसंचार के क्षेत्र में तकनीकी प्रगति ने न सिर्फ यातायात के साधनों को सुगम बना दिया है, बल्कि दूरसंचार के माध्यम से समय की बचत हो गयी है, अनेक प्रकार के खर्चों में भी भारी बचत हुई है। टेलीफोन, मोबाइल, फोन, फैक्स आदि के द्वारा आज विश्व के किसी भी स्थान से अविलंब सम्पर्क स्थापित किया जा सकता है। मेल के द्वारा कम मूल्य पर कम समय में मेल से भेज सकते हैं। कम्प्यूटर का उपयोग काफी तेजी से हो रहा है। इसका प्रयोग आज घर-घर एवं हरेक कोने तक फैल गया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के विकास ने लोगों को नजदीक लाकर वैश्वीकरण की प्रक्रिया को काफी तेज कर दिया है।
(ii) प्रतिस्पर्द्धा - प्रतिस्पर्द्धा के कारण ही कंपनियों को, विदेशों में नये बाजार खोजने की आवश्यकता हुई तथा इसी के फलस्वरूप उत्पादन तथा विक्रय की नयी विधियों का विकास हुआ है।
(ii) उदारवादी नीतियाँ - वैश्वीकरण के विकास का मुख्य कारण विभिन्न देशों द्वारा अपनायी गयी उदारवादी नीतियाँ हैं। इनके फलस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक लेन-देन पर लगी रोकों को हटा दिया गया है। विश्व अर्थव्यवस्था में कई प्रकार की रुकावटें दूर होने से वैश्वीकरण की प्रक्रिया के लिए रास्ता साफ हो गया है।
(iv) विकासशील अर्थव्यवस्था के अनुभव - वैश्वीकरण की प्रक्रिया को अपनाने वाली विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ; जैसे- कोरिया, थाइलैंड, ताइवान, हांगकांग, सिंगापुर आदि आर्थिक दृष्टि से बहुत ज्यादा सफल रही हैं। चीन भी वैश्वीकरण की प्रक्रिया को अपनाकर आर्थिक विकास की ऊँची दर प्राप्त करने में अधिक सफल रहा है।
(v) अन्य कारक - अन्य कारकों में प्रमुख रूप से वितरण प्रणाली एवं विपणन दृष्टिकोण एक समान रूप वाले होते जा रहे हैं।
(a) पूँजी बाजारों का सार्वभौमिकीकरण होता जा रहा है।
(b) कम्प्यूटर एवं संबद्ध तकनीकी के विस्तार के परिणामस्वरूप सभी देशों में तकनीकी पुनर्रचना की प्रक्रिया लागू है। इस तरह वैश्वीकरण को प्रोत्साहित करने वाले उपर्युक्त कई कारक हैं।
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Question 114 Marks
भारत में वैश्वीकरण का वर्णन करें।
Answer
भारत में वैश्वीकरण की आवश्यकता आज के संदर्भ में अति आवश्यक है। विकास की जो स्थिति है, उसके लिए उद्योग एवं व्यापार को नई प्रौद्योगिकी और ज्ञान की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति में देश में आधुनिक तकनीकी ज्ञान एवं पूँजी को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए तथा विश्व बाजार में पूँजी और उत्पादित वस्तुओं को भेजने में वैश्वीकरण का महत्त्व काफी बढ़ गया है। भारत के लिए वैश्वीकरण कई कारणों से आवश्यक है।
(i) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहन - वैश्वीकरण के द्वारा विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिलता है। भारत जैसे विकासशील देश अपने विकास के लिए पूँजी प्राप्त कर सकेगा।
(ii) मानवीय पूँजी की क्षमता का विकास - वैश्वीकरण के लिए दो मुख्य घटकों का होना अनिवार्य होता है शिक्षा तथा कौशल। इन दोनों घटकों के द्वारा ही मानवीय विकास को बढ़ावा मिलता है।
(ii) प्रतियोगिता वैश्वीकरण के संसाधनों के आवंटन में कुशलता आएगी - 'पूँजी निपज अनुपात' घटेगा तथा श्रम की उत्पादकता में वृद्धि होगी। इससे देश में विदेशी पूँजी एवं आधुनिक तकनीक प्रवाहित हो सकेगी।
(iv) अच्छी उपभोक्ता वस्तुओं की प्राप्ति - भारत में वैश्वीकरण की आवश्यकता भारत जैसे विकासशील देशों को अच्छी गुणवत्ता वाली उपभोग की वस्तुओं की तुलना में कम कीमत पर प्राप्त करने के योग्य बनाता है।
(v) नये बाजार तक पहुँच - भारत जैसे विकासशील देश के लिए विश्व के बाजारों तक पहुँचने का एक आम रास्ता वैश्वीकरण ही है।
(vi) उत्पादन के स्तर को उन्नत करना - वैश्वीकरण के माध्यम से ही संभव हो पाता है क्योंकि वैश्वीकरण के द्वारा अच्छे किस्म के मशीन तथा उन्नत तकनीक के उपयोग से उत्पादन के स्तर को ऊपर उठाया जाता है।
(vii) बैंकिंग तथा वित्तीय क्षेत्रों में सुधार - देश में विदेशी बैंकों के आगमन से देश की बैंकिंग व वित्तीय व्यवस्था में सुधार होगा।
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Question 124 Marks
भारत में सामान्य व्यक्ति पर वैश्वीकरण का क्या प्रभाव पड़ा?
Answer
वैश्वीकरण के प्रभाव से भारत में बड़ी मात्रा में विदेशी पूँजी का आयात हुआ है। बाजार में आयतित एवं विदेशी ब्रांड की वस्तुओं का प्रसार बढ़ा है। विदेशी कम्पनियों ने कई जगह अपने कल-कारखाने एवं विक्रय केन्द्र स्थापित किए गए हैं। आम आदमी के लिए इसके निम्नांकित लाभ हैं-
(i) उपभोग के लिए आधुनिक वस्तुओं एवं सेवाओं की उपलब्धता - भारत के उपभोक्ता के लिए विश्व की आधुनिकतम वस्तुएँ बाजार में क्रय के लिए उपलब्ध हैं। इसमें लैपटॉप, कम्प्यूटर, टेलीविजन, मोबाइल शामिल हैं। मेट्रो रेल जैसी आधुनिक सेवा भी वैश्वीकरण की देन है।
(ii) रोजगार की बढ़ी हुई संभावना - वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। यह शिक्षित एवं कुशल श्रमिकों के लिए अधिक लाभप्रद सिद्ध हुआ है, खासकर सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लाभ उत्पादक को उत्कृष्ट उत्पाद के रूप में मिला है। प्रतियोगिता से वस्तुओं की गुणवत्ता बढ़ी है।
वैश्वीकरण के निम्नांकित कुछ दुष्प्रभाव हैं -
(a) छोटे उत्पादकों एवं श्रमिकों का संकट - बहुराष्ट्रीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा के प्रभाव से कई मध्यम एवं छोटी उत्पादक इकाइयों बंद हो गई हैं। कई श्रमिक इस कारण बेरोजगार हो गए हैं। लघु उद्योग में लगभग 2 करोड़ श्रमिक नियोजित हैं। अतः वैश्वीकरण ने इनके समक्ष रोजी-रोटी की चुनौती खड़ी कर दी है।
(b) कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र में संकट - कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्रों में विकास का संकट है। कम पूँजी निवेश के कारण पिछले 20 वर्षों में इस क्षेत्र की औसत आर्थिक वृद्धि दर बहुत कम रही है। किसान कर्ज के बोझ से आत्महत्या करने को मजबूर हैं।
वैश्वीकरण एक सच्चाई है, किंतु उपलब्ध प्रमाण यह दशति हैं कि आम आदमी को इसका मिश्रित लाभ मिला है। वैश्वीकरण से ज्यादातर धनी उपभोक्ता, कुशल एवं शिक्षित श्रमिक एवं बड़े उत्पादनकर्ताओं को ही लाभ पहुँचा है। बढ़ती स्पर्धा से छोटे उत्पादक एवं श्रमिक प्रभावित हुए हैं। कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र वैश्वीकरण के समुचित लाभ से अब भी वंचित है।
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