Question
आधुनिक नारी

Answer

नारी मात्र सौंदर्य और प्रेम की ही प्रतिमूर्ति नहीं रही है, आज उसका दबदबा इतना बढ़ गया है कि पुरुष उसके बढ़ते हुए अस्तित्व को देखकर स्वयं रसोई घर में केवल हाथ नहीं बँटाता है, अपितु रसोई घर का दायित्व भी संभालने लगा है। यही पुरुष पुरुषत्व के कारण रसोई के कार्य को अपने लिए हेय समझता था। दूसरी ओर नारी ने रसोई से ही नहीं, घर की चारदीवारी से बाहर निकल अपनी प्रतिभा को नए रूपों में प्रस्तुत किया है, जिसका परिणाम यह हुआ है कि पुरुष अब नारियों के स्थान रसोई के कार्य को सँभाल कर नारी के लिए चाय परोसते हुए गौरव का अनुभव करने लगा है। इसलिए तो डॉ. वीरेश ने कविता के माध्यम से इस प्रकार कहा है

नारी के बढ़ते हुए
तानाशाही घटा टोप में
विवश नर अब हेटा है
अरुणिम, क्रोधान्वित, रक्तिम
मुख के भय से नर
रसोई में जा बैठा है।

कभी अबला कही जाने वाली नारी अब सबला है। प्रत्येक क्षेत्र को अपने प्रभाव क्षेत्र में लेकर अपनी शक्ति, अपनी योग्यता, प्रखरता, अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है और निरंतर कर रही है। जमीन से लेकर आकाश तक अपना प्रभुत्व स्थापित किया है। हिमालय की चोटी को छूने वाली बछंद्री पाल, आकाश की ऊँचाई को छूने वाली कल्पना-चावला, देश के स्वाभिमान को बढ़ाने वाली राजनीति, कूटनीति और युद्धनीति के लिए सिंह वाहिनी के रूप में जानी जाने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी, प्रशासनिक क्षेत्र में अलग पहचान बनाने वाली आई.पी.एस. महिला किरण बेदी, खेल के क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित कर चुकी उड़न परी पी.टी. ऊषा और देश के सर्वोच्च पद पर आसीन रह चुकी श्रीमती प्रतिभा पाटिल आदि, से स्पष्ट है कि नारी अब प्रत्येक दायित्व को सँभालने में समर्थ है। वह अब शक्ति की पर्याय बन गई है। वह पुरुषों के लिए प्रेरणा बन गई है। इतिहास के पृष्ठों को पढ़कर देश-प्रेम में भी आगे रही है। इतिहास के पृष्ठों में रानी लक्ष्मी बाई, रानी सारंधा, होल्कर आदि वीरांगनाओं को पढ़कर देश के लिए कुर्बान होने के लिए तत्पर रहती है। वायुसेना और थल सेना में जाने के लिए मचलने लगी है। नारियों के उत्साह को देखकर अपने पुरुषत्व का डींग हाँकने वाले पुरुष दाँतों तले अंगुली दबाने लगा है।

पौराणिक और ऐतिहासिक विवरणों में नारी शक्ति पर अंकुश की चर्चाएँ की गई हैं। उन परंपराओं को नारियों ने एक ओर अप्रत्याशित सराहनीय कार्य कर झुठलाया है तो दूसरी ओर नारी की बढ़ती हुई उच्छृखलता ने जीवन जीने की कला से मनुष्य और अपनी पाश्विक प्रवृत्ति को प्रेरित किया है। जीवन जीने की नई-नई कलाओं के माध्यम से इसी उच्छृखल नारियों ने पशु प्रवृत्ति को अपनाने में कोई संकोच नहीं किया। इसी नारी ने सौंदर्य-प्रदर्शन की नई-नई परिभाषाएँ प्रस्तुत कर अपने सौंदर्य की कीमत वसूलती हुई कंपनियों के विज्ञापन में सर्वत्र दिखाई देती हैं। उनकी इस उच्छृखलता को देखकर ही शायद ‘उपकार’ फिल्म में विवश होकर फिल्माया गया होगा कि एक के पास तन ढकने के लिए वस्त्र नहीं है और एक को तन ढकने का शौक नहीं है। नारी की ऐसी बढ़ती हई उच्छृखलता नारी-जाति को कलंकित कर रही है-यह कहना शायद अनुचित नहीं है। नारी-जाति से इस उच्छृखलता को अलग करके देखा जाए तो नारी राष्ट्र की, सृष्टि की सम्माननीय, ईश्वर-निर्मित प्राणिजगत की सर्वश्रेष्ठ रचना है।

आधुनिक नारी को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि यह यदि अपनी ऐसी ही संघर्ष और उत्साह की प्रवृत्ति बनाए रहती है, तो शीघ्र ही पुरुष वर्ग को पीछे छोड़ देगी, किंतु तुरंत ही उसके दूसरे रूप उच्छंखलता की ओर विचार जाता है कि देश, समाज और अपने नारी समाज के पतन का कारण भी बन सकती है। नारी की प्रगति आधुनिकता के नाम पर कभी कानून का, कभी अपने सौंदर्य से उपजी सहानुभूति का अनुचित लाभ उठाते हुए अमर्यादित हेकड़ होती जा रही है, उससे संदेह होता है कि उसका भविष्य कितना उज्ज वल होगा। नारी प्रगति को देखकर सचमुच में प्रसन्नता होती है क्योंकि नारी के विविध रूप हैं, वह एक माता है, वह किसी की प्रिय पुत्री है तो किसी की बेटी है तो किसी की बहन है तो किसी की पत्नी। सर्वत्र अपनत्व है। अपने की प्रगति देख किसे प्रसन्नता नहीं होती है। यह प्रसन्नता तभी तक रहती है जब वह प्रगति के साथ मर्यादित रहती है।

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