लै ब्योढ़ी ठाढ़े भये, श्री अनिरुद्ध सुजान।
बाणासुर की सैन को, हनन लगे भगवान् ॥
पाँच वर्ष की आयु में माता के वात्सल्य से तथा दस वर्ष की आयु में पिता के प्यार से वंचित होने टोले भारतेन्दु की आरम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। इन्होंने घर पर ही हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी तथा बँगला आदि भाषाओं का अध्ययन किया। 13 वर्ष की अल्पायु में मन्नो देवी नामक युवती के साथ इनका विवाह हो गया। भारतेन्दु जी यात्रा के बड़े शौकीन थे। इन्हें जब भी समय मिलता, ये यात्रा के लिए निकल जाते थे। ये बड़े उदार और दानी पुरुष थे। अपनी उदारता और दानशीलता के कारण इनकी आर्थिक दशा शोचनीय हो गयी और ये ऋणग्रस्त हो गये। परिणामस्वरूप श्रेष्ठि-परिवार में उत्पन्न हुआ यह महान् साहित्यकार ऋणग्रस्त होने के कारण, क्षयरोग से पीड़ित हो 35 वर्ष की अल्पायु में ही सन् 1885 ई० में दिवंगत हो गया।
साहित्यिक सेवाएँ-हिन्दी-साहित्य में भारतेन्दु का आविर्भाव एक ऐतिहासिक घटना है। उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध राजनीतिक और सामाजिक चेतनाओं के रूप में जागरण की अँगड़ाई लेने लगा था, यद्यपि मध्ययुगीन, नीति-मूल्यों और जीवन-मर्यादाओं के मोह से उसे अभी छुटकारा नहीं मिल पाया था। साहित्य के क्षेत्र में रीतिकाल की परम्परा का अनुकरण हो रहा था, किन्तु नवोत्थान की प्रेरणा से उसकी धमनियों में भी नवीन रक्त का संचार होने लगा था। इस संक्रान्ति-काल में भारतेन्दु का उदय हुआ। इनके साहित्य में जहाँ एक ओर हिन्दी के विगत युगों की अभिव्यक्ति संचित है, वहीं दूसरी ओर युग की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रबल स्पन्दन भी मिलता है। युग के नवोन्मेष में इन्होंने भारत की वीणा में नये स्वरों की प्रतिष्ठा की।
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