जीवन-परिचयः कविवर भूषण का जन्म संवत् 1670 वि० (सन् 1813 ई०) में कानपुर जिले के तिकवाँपुर (त्रिविक्रमपुर) ग्राम में हुआ था। इनके पिता पं० रत्नाकर त्रिपाठी संस्कृत के महान् विद्वान् एवं ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे। ये कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। भूषण का वास्तविक नाम क्या था इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती। एक दोहे से विदित होता है कि चित्रकूट के सोलंकी राजा रुद्रदेव ने इन्हें 'भूषण की उपाधि दी थी। कदाचित् कालान्तर में ये भूषण नाम से इतने विख्यात हुए कि इनका वास्तविक नाम ही विलुप्त हो गया। इनके जीवन का प्रारम्भिक चरण अकर्मण्यता से ग्रसित था, परन्तु भाभी के एक कटु व्यंग्य ने इनका जीवन बदल डाला। ये मर्माहत हो घर से निकल गये। कहाँ गये, कैसे रहे, इसका कुछ पता नहीं चलता, पर जब ये दस वर्षों के बाद घर लौटे तो इनमें पाण्डित्य एवं कवित्व-शक्ति का पर्याप्त विकास हो चुका था, जिसका राज्याश्रयों में उत्तरोत्तर विकास होता रहा। ये कई राजदरबारों में रहे, परन्तु इन्हें सन्तुष्टि न मिली। अन्त में मनोवांछित आश्रयदाताओं के रूप में इन्हें वीर शिवाजी व छत्रसाल मिले। इन दोनों ने भूषण को पर्याप्त सम्मान दिया। संवत् 1772 वि० (सन् 1715 ई०) के लगभग इनकी मृत्यु हो गयी।
साहित्यिक सेवाएँ- भूषण मध्य युग के वीर रस के कवि हैं। विलासिता और परतन्त्रता के युग में स्वतन्त्रता, ओजस्विना, तेजस्विता एवं राष्ट्रीयता को स्वर हम भूषण के मुख से ही सर्वप्रथम सुनते हैं। अपने समकालीन कवियों की तरह भूषण ने विलासी आश्रयदाताओं के मनोरंजन के लिए श्रृंगारी काव्य की रचना न करके अपनी वीरोपासक मनोवृत्ति के अनुकूल अन्याय और संघर्ष के दमन में तत्पर, ऐतिहासिक महापुरुष शिवाजी एवं छत्रसाल जैसे वीरनायकों को अपनी ओजस्वी कविता द्वारा लोमहर्षक गुणगान किया। यद्यपि ये अपने युग की लक्षण-ग्रन्थ परम्परा तथा प्रवृत्तियों से सर्वथा मुक्त नहीं थे, तथापि जातीय, राष्ट्रीय भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति इनके काव्य की सबसे बड़ी विशेषता रही है। सच तो यह है कि भूषण हिन्दी साहित्य के प्रथम राष्ट्रीय कवि हैं। भारतमाता के अमर पुत्र छत्रपति शिवाजी एवं छत्रसाल बुन्देला जैसे लोकोपकारी महापुरुषों के चरित-गायन में ही इन्होंने अपने जीवन को सार्थक समझा। इन्हीं महापुरुषों की दानशीलता, युद्ध-वीरता, दयालुता एवं धर्मपरायणता का महाकवि भूषण के द्वारा उदात्त चित्रण किया गया है। इन्हीं चरितनायकों के शौर्य-वर्णन या वीर रसात्मक उद्गार विशाल भारतीय जनता की सम्पत्ति हैं।।