बिहारी रीति काल के श्रेष्ठ और प्रसिद्ध कवि थे। वे श्रृंगार रस के अद्वितीय चित्रकार माने जाते हैं। उनकी प्रसिद्ध रचना बिहारी सतसई है जिसमें 700 से अधिक दोहे हैं, जो अलंकार, अर्थ-गौरव और संक्षिप्तता के लिए प्रसिद्ध हैं।
बिहारी के काव्य में श्रृंगार के दोनों पक्ष – संयोग और वियोग – का सुंदर चित्रण मिलता है। वे भाव, भाषा और छंद के चमत्कारिक उपयोग में निपुण थे। उनके दोहों में गूढ़ भाव को अत्यंत कुशलता से थोड़े शब्दों में व्यक्त किया गया है।
उनकी भाषा ब्रज है जो काव्य के अनुरूप मधुर, अलंकारिक और चित्रात्मक है। बिहारी ने हिंदी दोहा काव्य परंपरा को चरमोत्कर्ष तक पहुँचाया।